भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

३६० ॐ अविच्छिन्नाचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् ॐ [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

(चर्वण) आदि त्रिचमत्पूर्व चित्र-विचित्र छः प्रकारके रसयुक्त पदार्थोंमें, इनके सिवा अन्यान्य फल, कन्द, मूल, शाक आदि भोज्य पदार्थोंमें—कहींपर भी वह परमात्माके आनन्दमें तृप्त, आसक्तिरहित ज्ञानी महात्मा पुरुष नहीं फँसता।

धर्मराज, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, सूर्य और वायुके लोकोंको; मेरु, मन्दराचल, कैलास, सह्याद्रि तथा दर्दुर पर्वतोंके शिखरोंको; चन्द्रमाकी चाँदनी को; मणियुक्तमय रत्न और सुवर्ण-निर्मित महलोंको; तिलोत्तमा, उर्वशी, रम्भा, मेनका आदिकी अङ्गलताओँको—किसीको भी वह आसक्ति-रहित ज्ञानी महात्मा देखना भी नहीं चाहता और वह विज्ञानानन्दघन परमात्मामें परिपूर्ण, मान न चाहनेवाला, मौनी महात्मा शत्रुओंके प्रतिकूल व्यवहारको देखकर भी विचलित नहीं होता। जो एक ब्रह्मदृष्टि रखनेवाला तथा विकाररहित समबुद्धि ज्ञानवान् पुरुष है, वह कनेर, मन्दार, कल्हार, कमल आदिमें; कुईं, नीलकमल, चम्पा, केतकी, अगर, जाति (मालती) आदि पुष्पोंमें; चन्दन, अगरु, कपूर एवं कस्तूरी आदिमें; केसर, लौंग-इलायची, कक्कोल (शीतलचीनीके वृक्षका भेद), तगर आदि अङ्गरागोंमेंसे किसीकी भी सुगन्धसे प्रेम नहीं करता। जो सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके ध्यानमें मग्न है, वह वज्रके भयावह शब्दसे, पर्वतके विस्फोटसे एवं ऐरावत आदि हाथियोंके चिग्घाड़नेसे कम्पित नहीं होता। तीक्ष्ण छुरेकी धारोंमें या नवीन कमलोंसे निर्मित शय्याओंमें, सूर्य-किरणोंसे प्रतप्त शिलाओंमें या कोमल ललनाओंमें, सम्पत्तियोंमें या उग्र विपत्तियोंमें एवं क्रीडाओं तथा उत्सवोंमें विहार करते हुए भी ज्ञानी महात्माको प्रतिकूल पदार्थोंसे तो उद्वेग नहीं होता और अनुकूलकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं होता। वह भीतरसे सदा अहंता-ममता एवं आसक्तिसे रहित होता है और बाहरसे निःस्वार्थभावसे कर्म करता रहता है। जीवनका विनाश करनेवाला तथा जीवनका दान देनेवाला—इन दोनों पुरुषोंको ज्ञानी पुरुष प्रसन्नता एवं मधुरतासे शोभित समदृष्टिसे देखता है। ज्ञानवान् पुरुष देवता और मनुष्य आदि शरीरोंसे तथा प्रिय और अप्रिय पदार्थोंसे न हर्षित होता है और न ग्लानिका अनुभव करता है अर्थात् अनुकूलमें हर्षित नहीं होता और प्रतिकूलमें ग्लानि और विषादके वशीभूत नहीं होता। श्रीराम! अपने चित्तमें आसक्तिका अभाव और परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे तत्त्वज्ञानी पुरुष जगत्‌को मिथ्या समझता है। इसलिये वह किसी भी समय इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंमें रमण नहीं करता; क्योंकि उसकी बुद्धि समस्त मानस पीडाओंसे मुक्त हो चुकी रहती है। किंतु जो तत्त्वज्ञानसे शून्य और शान्तिरहित है एवं परमात्माको प्राप्त नहीं हुआ है, उस वास्तविक स्थितिसे वञ्चित मनुष्य-को इन्द्रियाँ तत्काल उसी प्रकार निगल जाती हैं, जिस प्रकार हरिन हरे कोमल पत्तोंको निगल जाते हैं।

रघुनन्दन! जो विवेकपूर्वक विचारशील है एवं जिसकी एकमात्र सच्चिदानन्द ब्रह्मके स्वरूपमें ही स्थिति है और परमात्माके स्वरूपमें ही जिसको विश्राम प्राप्त हो गया है, उस ज्ञानी महात्माको संसारके संकल्प-विकल्प विचलित नहीं कर सकते—ठीक उसी प्रकार जैसे जलका प्रवाह अचल पहाड़को विचलित नहीं कर सकता। समस्त संकल्पोंकी सीमाके अन्तरूप पदमें जो महानुभाव विश्रामको प्राप्त हो गये हैं, उन परमात्माको प्राप्त हुए महात्माओंकी दृष्टिमें सुवर्णमय सुमेरु पर्वत भी तृणके सदृश है अर्थात् कुछ भी नहीं है। उन विशालहृदय महात्माओंकी दृष्टिमें सारा संसार और एक छोटा-सा तृण, अमृत और विष, कल्प और क्षण समान हैं। जिस जड दृश्य संसारका आदि और अन्तमें अस्तित्व नहीं है, उसकी यदि वर्तमान कालमें कुछ कालतक सत्ता प्रतीत हो रही है तो वह जीवात्माका भ्रम ही है। ज्ञानी शरीर, मन, बुद्धि तथा आसक्तिसे रहित इन्द्रियोंसे चाहे कर्म करे या न करे, असङ्ग होनेके कारण कर्मसे लिप्त नहीं होता। महाबाहु श्रीराम! जिस प्रकार कोई भी मनोराज्यकी सम्पत्तियोंके नष्ट होने या न होनेपर, उससे उत्पन्न सुख-दुःखोंसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी

उपशम-प्रकरण ] * विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति * ३६१


महात्मा पुरुष आसक्तिरहित मनसे कर्म करता हुआ भी उससे 'उत्पन्न सुख-दुःखरूप फलसे लिप्त नहीं होता तथा आसक्तिरहित मनवाला महात्मा पुरुष चक्षुसे विषयोंको देखता हुआ भी, उसका चित्त अन्यत्र—परमात्मामें स्थित होनेके कारण, कुछ नहीं देखता। जिसका चित्त दूसरी जगह तत्परतासे लगा रहता है, वह विषयको नहीं देखता—यह बात बालक भी जानता है। इसलिये आसक्तिरहित मनवाला ज्ञानी महात्मा पुरुष सुनता हुआ भी नहीं सुनता, स्पर्श करता हुआ भी स्पर्श नहीं करता, सूंघता हुआ भी नहीं सूंघता, नेत्रोंको खोलता और बंद करता हुआ भी न उन्हें खोलता और न बंद ही करता है। श्रीराम ! आसक्ति ही संसारका कारण है, आसक्ति ही समस्त पदार्थोंका हेतु है, आसक्ति हीं वासनाओंकी जड़ है और आसक्ति ही समस्त विपत्तियोंका मूल है। अतः आसक्तिके त्यागको ही मोक्ष समझा गया है और आसक्तिके त्यागसे ही मनुष्य जन्म-मरणसे छूट जाता है।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—अखिल संशयरूपी कुहरेका नाश करनेवाले शरत्कालके वायुरूप महामुने ! सङ्ग (आसक्ति) किसे कहते हैं—प्रभो ! यह मुझसे कहिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंकी उत्पत्ति और विनाशमें जो हर्ष और विषादरूप विकार उत्पन्न करनेवाली मलिन वासना है, वही सङ्ग (आसक्ति) है—ऐसा ज्ञानीजन कहते हैं। जीवन्मुक्त स्वरूपवाले तत्त्ववेत्ताओंके पुनर्जन्मका नाश करनेवाली, हर्ष एवं विषाद दोनोंसे रहित, शुद्ध वासना—आसक्तिरहित चित्तवृत्ति होती है। वह भूने हुए बीजके समान आकृतिमात्र है। उस शुद्ध वासनाका दूसरा नाम असङ्ग (आसक्तिका अभाव) जानो। वह तबतक रहती है, जबतक प्रारब्ध भोगोंका संस्काररूप देह रहता है। उस शुद्ध वासनासे जो कुछ किया जाता है, वह पुनः संसारमें जन्म-मरणरूप बन्धनका कारण नहीं होता। जो जीवन्मुक्त नहीं हैं, जो दीन एवं मूढ़चित्त हैं, उनकी वासना हर्ष तथा विषादसे युक्त रहती है। वह वासना जन्म-मरणरूप बन्धन देनेवाली होती है। इसी बन्धनकारक वासनाका दूसरा नाम सङ्ग है। यह पुनर्जन्मका कारण है। इस वासनासे जो कुछ किया जाता है, वह केवल बन्धनका ही हेतु होता है। रघुनन्दन ! यदि तुम दुःखोंसे घबराते नहीं, सुखोंसे हर्षित नहीं होते और सम्पूर्ण आशाओंसे रहित हो तो तुम असङ्ग ही हो। समस्त व्यवहारोंमें एवं सुख-दुःखकी अवस्थाओंमें समचित्त रहते हुए ही यदि विचरण करते हो तो तुम असङ्ग ही हो। सांसारिक पदार्थोंको तुम अपनी आत्मा ही समझते हो और जिस समय न्याययुक्त जैसा व्यवहार प्राप्त होता है, उसीके अनुसार शास्त्रानुकूल आचरण करते हो तो तुम असङ्ग ही हो। जीवन्मुक्तोंके ज्ञानसे सम्पन्न, इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला, परमात्माके स्वरूपका मनन करनेवाला श्रेष्ठ मुनि मान, मद, मात्सर्य और चिन्ताज्वरसे रहित होकर स्थित रहता है। श्रीराम ! प्रचुरतर पदार्थोंके सदा रहते हुए भी सबमें समानभाव रखनेवाला तथा बाहर एवं भीतर इच्छा एवं याचना आदि रूप दीनतासे शून्य अन्त करणवाला यह महात्मा एकमात्र अपने वर्णाश्रमोचित स्वाभाविक क्रम-प्राप्त न्याययुक्त व्यापारसे पृथक् दूसरा कुछ भी व्यापार नहीं करता। वर्णाश्रमानुसार परम्परा-प्राप्त अपना जो कुछ भी कर्तव्य है, उसका वह ज्ञानी संसर्ग-सम्बन्ध अर्थात् आसक्ति, अहंता-ममतासे रहित बुद्धिसे खेदशून्य हो अनुष्ठान करता हुआ परमात्मस्वरूप अपने आत्मामें रमण करता है। जिस प्रकार मन्दराचल पर्वतसे मथे जानेपर भी क्षीरसमुद्र अपना स्वाभाविक शुक्लपन नहीं छोड़ता, उसी प्रकार आपत्ति अथवा उत्तम सम्पत्तिके प्राप्त होनेपर वह महामति तत्त्वज्ञ अपना सहज स्वभाव नहीं छोड़ता।

(सर्ग ९३)

उपशम-प्रकरण सम्पूर्ण

निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध

श्रीवसिष्ठजीके कहनेपर श्रोताओंका सभासे उठकर दैनिक क्रिया करना तथा सुने गये विषयोंका चिन्तन करना

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं*—भरद्वाज ! उपशम-प्रकरणके अनन्तर अब इस निर्वाण-प्रकरणका श्रवण करो। उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह मोक्षरूप फल देता है। जिस समय महाराज वसिष्ठजी उस प्रकारके गम्भीर अर्थके प्रतिपादक वचन कह रहे थे, उनके श्रवणके ही आनन्दमें निमग्न श्रीराम मौन होकर स्थित थे; महामुनि वसिष्ठजीकी वाणी और उसके द्वारा प्रतिपादित अर्थोंको मनमें धारणकर राजालोग, जो बाह्य विषयोंके विज्ञान एवं शारीरिक चेष्टासे रहित थे, निश्चेष्ट होकर चित्रलिखित मूर्तिकी तरह अचल स्थित थे। एवं महामुनि वसिष्ठजी-द्वारा उपदिष्ट वाक्योंका बड़े आदरके साथ श्रोता मुनिगण विचार कर रहे थे, उस समय दिनके चतुर्थ भागमें भेरी और शङ्खकी ध्वनि हुई। उक्त ध्वनिसे मुनि वसिष्ठजीका उन्नत स्वर भी उसी प्रकार दब गया, जिस प्रकार मेघोंके नादसे मयूरोंका शब्द। धीरे-धीरे उस शङ्ख-ध्वनिके शान्त होनेपर मुनिश्रेष्ठ महाराज श्रीवसिष्ठजी सभामें श्रीरामचन्द्रजीसे यों मधुर वचन कहने लगे—'श्रीराम ! मेरी इस वाणीके अर्थको तुमने क्या उसी तरह ग्रहण किया, जिस तरह हंस जलका त्यागकर दूधको ग्रहण करता है ? तुमको इसे अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह बार-बार विचारकर उसीके अनुसार चलना चाहिये। समस्त शास्त्रोंके सिद्धान्तको समझकर तुम उदार चित्त-से मेरे द्वारा कथित प्रयोजनकी सिद्धिके लिये असङ्ग होकर समयानुसार प्राप्त व्यवहारका परिपालन करो।'

'सभासद्गण ! महाराज दशरथ ! श्रीराम ! लक्ष्मण ! तथा अन्यान्य नृपवर्ग ! आप सभी आज अपने-अपने नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करें; क्योंकि आजका दिन प्रायः समाप्त होने जा रहा है। अब जो विचार करना शेष है, उसका जब आपलोग प्रातःकाल सभामें आयेंगे, तब हमलोग विचार करेंगे।'

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! मुनिवर वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर वह सभा उठ खड़ी हुई। समस्त सभाका वदन कमलकी तरह था, अतएव वह विकासयुक्त कमलिनीके सदृश भली मालूम पड़ती थी। उस समय अन्यान्य राजाओने महाराज दशरथकी स्तुति की, श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार किया तथा महर्षि वसिष्ठजीकी विशेषरूपसे स्तुति की। तदनन्तर वे अपने-अपने आश्रममें चले गये। आकाशचारी देवताओंकी वन्दना करके महाराज वसिष्ठजी महर्षि विश्वामित्रके साथ आश्रममें जानेके लिये आसनसे उठे। दशरथ आदि राजा तथा मुनिश्रेष्ठ अपने अनुरूप उपदेष्टा मुनिवर वसिष्ठजीके पीछे-पीछे आश्रमपर्यन्त जाकर उनकी आज्ञा लेकर


* वैराग्य और मुमुक्षु-व्यवहार नामक प्रकरणोंके बाद जो उत्पत्ति, स्थिति और उपशम नामक तीन प्रकरण कहे गये हैं, उनमें यह बताया गया कि उत्पत्ति, स्थिति और लयके बोधक तथा 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे प्रपञ्चके निषेधक जो वेदान्त-वाक्य हैं, वे अध्यारोपापवाद-न्यायसे परमात्मतत्त्वका ही प्रतिपादन करनेवाले हैं। अतः वासनाक्षय और मनोनाशपूर्वक परमात्म-ज्ञानके द्वारा परमपुरुषार्थकी प्राप्ति करानेमें ही उनका तात्पर्य है। अब 'यत्र नान्यत् पश्यति' (छान्दोग्य० ७। २४। १)—'जहाँ परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखता', 'यतो वाचो निवर्तन्ते' (तैत्तिरीय० २।४।१)—'जहाँसे वाणी उसे न पाकर लौट आती है', 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन' (तैत्तिरीय० २।४।१)—'ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला कभी भयभीत नहीं होता।' 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वम्' (बृहदा० २।५।१९)—'वह यह ब्रह्म अपूर्व है' इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध तथा पहले बताये गये सम्पन्न साधनोंसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके फलरूप मोक्षके स्वरूपका बोध करानेके लिये महर्षि वाल्मीकि निर्वाण-नामक प्रकरणका आरम्भ करते हैं।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीको सभामें लाना *


कोई आकाशकी ओर, कोई अरण्यकी ओर, कोई राज-मन्दिरकी ओर कमलसे उत्थित भ्रमरोंकी तरह चले गये । श्रीराम, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नने गुरुवर वसिष्ठजीके आश्रममें उनके साथ जाकर उनके चरणोंकी भक्तिपूर्वक पूजा की और फिर दशरथजीके भवनकी ओर चले गये । अपने-अपने स्थानमें आकर उन सब श्रोताओंने स्नान किया, देवता और पितरोंकी पूजा की तथा ब्राह्मणों और अतिथियोंका स्वागत-सत्कार किया । इन क्रियाओंसे निवृत्त होकर उन श्रोताओंने ब्राह्मण आदिसे लेकर नौकर-पर्यन्त अपने-अपने परिवारके साथ वर्ण-धर्मके क्रमानुसार भोज्यपदार्थोंका भोजन किया । दैनिक क्रियाओंके साथ सूर्यभगवान्‌के अस्ताचलकी ओर प्रस्थान करनेपर तथा रात्रि-कृत्योंके साथ निशाकरके उदित होनेपर आस्तरणोंसे युक्त शय्याओंपर तथा आसनोंपर भूमिपर विहार करनेवाले मुनि, राजा, राज-महर्षिलोग अत्यन्त आदरपूर्वक महर्षि वसिष्ठके कमलसे निर्गत संसार-तरणके उपायका एकाग्र यथावत् विचार करने लगे । तदनन्तर प्रहर-श्रोतागण सुन्दर स्वप्नसे युक्त निद्राको प्राप्त हुए लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न—इन तीनों भ्राताओंने तीन महर्षिके उपदेशका निरन्तर विचार किया । केवल आधे प्रहर ( दो घड़ी ) तक ही नयनोंमें उत्तम स्वप्नसे युक्त तथा क्षणभरमें श्रमका निव देनेवाली निद्रा प्राप्त की । (


श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीको सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वार उपदेशका आरम्भ; चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—रात्रिके क्षीण होनेपर श्रीराम, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न अपने-अपने अनुचरोंके साथ उठकर स्नान, संध्या आदि कर्मोंका अनुष्ठान करके महामुनि श्रीवसिष्ठजीके आश्रमपर चले गये । वहाँ उन्होंने संध्या करके आश्रमसे बाहर निकलते हुए महर्षि वसिष्ठजीके चरणोंमें अर्घ्य प्रदानकर प्रणाम किया । क्षणभरमें महर्षि वसिष्ठजीका आश्रम मुनियों, ब्राह्मणों और राजाओंसे तथा हाथी, घोड़े, रथ आदि अन्यान्य वाहनोंसे इतना भर गया कि वहाँ तनिक भी अवकाश नहीं रहा । तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ महाराज वसिष्ठजी उस सेनाके साथ ही श्रीराम आदिसे अनुगत होकर यथासमय दशरथजीके घरपर जा पहुँचे । वहाँपर शीघ्रतापूर्वक मिलनेके उत्साहसे संध्या-वन्दनसे निवृत्त हुए महाराज दशरथने आदरपूर्वक दूर मार्गमें ही जाकर महर्षिका पूजन किया । वे सब श्रोतागण पुष्पों, मोतियों तथा मणियोंके समूहोंसे पहलेकी अपेक्षा पुनः अधिक सजायी गयी सभामें प्रविष्ट होकर अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये । इसके अनन्तर उसी सा दिनके जो आकाशचर, भूचर आदि श्रोता थे, वे-सब आ गये । एक दूसरेका अभिवाद सभा बैठ गयी । तदनन्तर वाक्यरचनामें पटु वसिष्ठजी पूर्व प्रकरणके अनुसार ही वाक्यार्थके श्रीरघुनन्दनको कहने लगे ।

महाराज वसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सुन्दर पद्धतिसे जो अत्यन्त गहन अर्थवाला तत्त्व का बोधक वाक्य कहा था, उसका क्या तुमने है ? अब मैं तुम्हारे समझनेके लिये यह शाश्वत सिद्धिदायक उपदेश करता हूँ, इसे श्रीराम ! परमात्मतत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे अज्ञा तथा वासनाका विनाश हो जानेपर शोकशून्य प्राप्त हो जाता है । देश, काल और वस्तुसे र अद्वितीय परब्रह्म परमात्मा ही है । उस द्वित्वरूप जगत् तो अज्ञानसे प्रतीत होता है ।

३६४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

परमात्माके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि जहाँ समस्त पदार्थोंसे रहित, परम शान्त, समानभावसे प्रकाशित एक सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है, वहाँ उस परमात्माके सिवा दूसरा पदार्थ कैसे रह सकता है। जो सम्पदाएँ हैं, जो दृश्य हैं, जो प्राणी हैं और जो उनकी इच्छाएँ हैं—इन सबके रूपमें आदि और अन्तसे रहित एक विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही है, जैसे समुद्रकी तरङ्गें समुद्र ही हैं। पातालमें, भूमिमें, स्वर्गमें, तृण आदि जड पदार्थोंमें, प्राणी एवं आकाशमें—सर्वत्र वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है, दूसरा कुछ नहीं। जैसे समुद्रकी नाना तरङ्गें समुद्र ही हैं, वैसे ही उपेक्ष्य, हेय, उपादेय, बन्धु-बान्धव, सम्पदाएँ, देह—इन सभी रूपोंमें आदि और अन्तसे रहित परब्रह्म ही प्रकाशित है। जबतक अज्ञानकी कल्पना, ब्रह्मसे अतिरिक्त पदार्थकी भावना और जगज्जालमें आस्था रहती है, तभीतक चित्त आदिकी कल्पना रहती है। जबतक देहमें अहम्भावना रहती है, जबतक इस दृश्यमें आत्मरूपता रहती है, जबतक यह मेरा है—इस प्रकारकी आस्था रहती है, तभीतक चित्तरूप भ्रम रहता है।

जबतक पूर्णताका उदय नहीं होता और जबतक सज्जनोंके संसर्गसे अज्ञानका विनाश नहीं होता, तभीतक चित्त आदि पतनकी ओर जाते रहते हैं । जबतक सच्चिदानन्द परमात्माके यथार्थ अनुभवके प्रभावसे यह जगल्लक्षी वासना शिथिल नहीं हो जाती, तभीतक चित्त आदि प्रतीत होते हैं। जबतक अज्ञानरूप मूर्खता रहती है, जबतक विषयाभिलाषासे विवशता रहती है एवं जबतक मूर्खतावश मोहका समुद्र बना रहता है, तबतक चित्त आदिकी कल्पना रहती है। किंतु जिसका अन्तःकरण भोगोंमें आस्था नहीं रखता, जिसको सुशील निर्मल निर्वाण परमपद प्राप्त हो चुका है एवं जिसके आशापाशके जाल छिन्न-भिन्न हो गये हैं, उसका चित्तरूप भ्रम नष्ट हो जाता है। मिथ्या भ्रमको उत्पन्न करनेवाले अनात्मदर्शन-का विनाश तथा परमार्थभूत सच्चिदानन्द परमात्मज्ञानरूप उत्तम सूर्यका उदय होनेपर चित्त विनष्ट होकर उसी प्रकार पुनः दिखायी नहीं देता, जिस प्रकार अग्निमें सूखा पत्ता या घीकी बूँद गिरनेपर पुनः दिखायी नहीं देती। परमात्माके सगुण-निर्गुण स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए जो जीवन्मुक्त महात्मा हैं, उनका पवित्र अन्तःकरण ही 'सत्त्व' नामसे कहा गया है। जो समरूप परमात्मपदमें नित्य स्थित, चित्तरहित तत्त्वज्ञानी महात्मा हैं, वे सत्त्वगुणमें स्थितिसे उत्पन्न उपेक्षासे ही लीलामात्र व्यवहार करते हैं। परमात्मामें स्थित, संयतेन्द्रिय, परम शान्त महात्मा पुरुष उस ब्रह्मरूप ज्योतिका सदा ही साक्षात्कार करते रहते हैं; अतः उनमें द्वैतभाव, एकभाव और वासना नहीं हो सकती। 'मैं सर्वात्मक हूँ' इस प्रकारकी परिपूर्ण आत्मभावनासे समस्त त्रिजगत्-रूपी तृणका सच्चिदानन्दरूप अग्निमें हवन करनेवाले महामुनिके चित्त आदि भ्रम निवृत्त हो जाते हैं। विवेक-से विशुद्ध हुआ चित्त सत्त्व कहा जाता है। वह फिर मोहरूपी फल उसी प्रकार उत्पन्न नहीं करता, जिस प्रकार दग्ध हुआ बीज नहीं उगता। मूढ मनुष्योंके भीतर पुनर्जन्मका विधायक वासनायुक्त चित्त होता है; किंतु तत्त्वज्ञान हो जानेपर वही वासनारहित सत्त्वरूप होकर पुनर्जन्मका बाधक हो जाता है। श्रीराम ! तुम प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर चुके हो। तुम्हें कुछ भी प्राप्त करना नहीं है, तुम्हारा चित्त शुद्ध है और ज्ञानरूप अग्निसे दग्ध हो चुका है; अतः वह भावी जन्मका कारण नहीं हो सकता अर्थात् तुम जन्म-मरणसे रहित हो। तुम वास्तवमें अवयव और सीमासे रहित, चेतनस्वरूप ही हो; अतः तुम अपने स्वरूप-का स्मरण करो, उसे कभी भूलो मत। तुम वही परिपूर्ण, परम शान्त, सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा हो। श्रीराम ! सारा चराचर चेतन-समूह तुम्हारे अंदर है और वास्तवमें वह नहीं है। तुम जो हो सो हो, तुम सत् भी हो, असत् भी हो। जो कुछ सत्-असत् प्रतीत होता

निर्वाण-प्रकरण पू०] * ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाका विनाश * ३६५

है, वह तुम्हारा संकल्प होनेसे तुम ही हो और तुम स्वयं प्रकाशरूप हो । वास्तवमें जड़-पदार्थविशेष तुम नहीं हो और न वह सब तुममें है । तुम्हारा संकल्प होनेसे वह तुम्हारा स्वरूप भी है और वस्तुसे असत् होनेके कारण वह नहीं है, तुम अपने सच्चिदानन्द-स्वरूपमें नित्य स्थित हो । तुम्हें नमस्कार है । तुम आदि और अन्तसे रहित, शिलाके समान चेतनघन हो—जिस प्रकार शिलामें पत्थरके सिवा कोई वस्तु नहीं उसी तरह तुममें एक चेतनके सिवा और कुछ नहीं है । तुम आकाशकी तरह निर्मल और स्वस्थ हो । तुम लीलासे ही सम्पूर्ण जगत्‌को अपने एक अंशमें धारण किये हुए हो । ऐसे ब्रह्मस्वरूप तुम्हें नमस्कार है । (सर्ग २)


ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाके विनाशका तथा श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामकी महिमा एवं श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा अपने परमार्थ-स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप श्रीराम ! जिस प्रकार समुद्रमें उठनेवाली असंख्य तरङ्गोंका मूल कारण जल ही है, उसी प्रकार जो नाना प्रकारके असंख्य ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति और धारण करनेवाला चेतन है, वह तुम हो । समरूप, आकाशकी तरह सौम्य, बड़ी-बड़ी सृष्टिरूपी जल-तरङ्गोंसे घन प्रकाशमय परमात्म-चैतन्यरूप समुद्र तुम ही हो ।* जिस प्रकार अग्निसे उष्णत्व भिन्न नहीं है, कमलसे सौगन्ध्य भिन्न नहीं है, कज्जलसे कृष्ण रूप भिन्न नहीं है, बर्फ-से शुक्ल रूप भिन्न नहीं है, ईखसे माधुर्य भिन्न नहीं है, तेजसे प्रकाश भिन्न नहीं है, चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है, जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ब्रह्मसे चराचर जगत् भिन्न नहीं है; क्योंकि ब्रह्म ही सबका कारण है । इसलिये चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है । अनुभवसे 'अहम्' भिन्न नहीं है, 'अहम्'से जीव भिन्न नहीं है, जीवसे मन भिन्न नहीं है, मनसे इन्द्रिय भिन्न नहीं है, इन्द्रियोंसे देह भिन्न नहीं है, देहसे यह जड़ दृश्य जगत् भिन्न नहीं है, जगत्से भिन्न अन्य कोई पदार्थ नहीं है ।

* रमन्ते योगिनो यस्मिन् नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
'जिस नित्यानन्द चिदात्मामें योगीलोग निरन्तर रमण करते हैं, वह परब्रह्म 'राम' पदसे कहा जाता है'—ऐसी व्युत्पत्तिवाले 'राम' शब्दके वाच्य भी तुम ही हो ।

श्रीराम ! यह दृश्यमान जगतरूपी चक्र चिन्मय परमात्माने ही अनादि कालसे अपने संकल्पद्वारा प्रवृत्त किया है । वास्तवमें तो कुछ भी प्रवृत्त नहीं किया है । यथार्थमें तो यह सब कुछ विभागरहित अनन्त सच्चिदानन्दरूप आकाश ही अपने आपमें स्थित है । उसके सिवा दूसरा और कुछ भी नहीं है । ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों और मनके व्यापारोंको करता हुआ भी कुछ भी नहीं करता; क्योंकि उसमें कर्तृत्व है ही नहीं । श्रीराम ! तुम भीतरसे आकाशकी तरह निर्मल हो, बाहरसे अपने वर्णाश्रमानुकूल आचरण करते हो एवं हर्ष और ईर्ष्या आदि विकारोंमें काष्ठ और लोष्टके समान निर्विकार हो । जो तत्क्षण मारनेके लिये उद्यत अत्यन्त ही कठोर शत्रु है, उसे स्वाभाविक प्रियतम मित्रके रूपमें जो देखता है, वही यथार्थ देखनेवाला ज्ञानी महात्मा है । जिस प्रकार तटवर्ती वृक्षको नदी वेगसे मूलोच्छेदपूर्वक उखाड़कर फेंक देती है, उसी प्रकार जो महात्मा सौहार्द और ईर्ष्याको वेगसे समूल उखाड़ फेंक देता है, वही हर्ष और ईर्ष्यारूपी दोषोंका विनाश कर सकता है । जिस पुरुषके अन्तःकरणमें 'मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है ।

३६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

श्रीराम ! जिसका त्रिकालमें अस्तित्व नहीं है, उसकी व्यावहारिक सत्ताका ज्ञान करानेके लिये 'माया' शब्दका प्रयोग किया गया है। वह माया उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे निस्संदेह विनष्ट हो जाती है।

निष्पाप श्रीराम ! मन, बुद्धि, अहंकार तथा इन्द्रिय आदि सब कुछ जड़तारहित एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। फिर जीवात्मा उस परमात्मासे अलग कैसे रह सकता है, अर्थात् वह भी परमात्माका स्वरूप ही है। जब भोग-तृष्णारूपी विषका आवेश विनष्ट हो जाता है—संसारके विषयभोगोंसे तीव्र वैराग्य हो जाता है, तब अज्ञान उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे गत रात्रिके अन्धकारके नष्ट हो जानेपर रतौंधी भाग जाती है, भली प्रकारसे आलोचित अध्यात्मशास्त्ररूपी विचारसे तृष्णाविषरूपी महामारी क्षीण हो जाती है। जैसे विस्तृत आकाशमें अव्यक्त वायु स्थिर है, वैसे ही मायाभावसे रहित हुए तुम उस अत्यन्त विस्तृत परम पदरूप अपने ब्रह्मस्वरूपमें स्थिर हो। श्रीराम ! जब साधारण मनुष्योंको भी अपने कुलगुरुके वचन लग जाते हैं, तब फिर तुम उदार (विशाल)-बुद्धिको मेरा उपदेश क्यों नहीं लगेगा? क्योंकि तुमने अपनी बुद्धिसे मेरे वचनोंको ग्रहण करने योग्य समझ लिया है, अतएव मेरे वचन तुम्हारे हृदयके अंदर प्रविष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ महानुभाव श्रीराम ! मैं रघुकुलको उन्नत करनेवाले तुमलोगोंका सदासे कुलगुरु हूँ, इसलिये तुम मेरे द्वारा कहे गये शुभ वचनोंको हृदयमें हारकी तरह धारण करो।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मैं केवल परम शान्तिका अनुभव कर रहा हूँ और परमानन्दमय स्वरूपमें सुखपूर्वक स्थित हूँ। मुने ! मुझे कुहरेसे शून्य दिङ्मण्डलकी भाँति भली प्रकार प्रसन्न यह समस्त जगत् वास्तविक सच्चिदानन्दस्वरूप दीख रहा है। भगवन् ! मैं संदेहसे, आशारूप मृगतृष्णासे, राग और वैराग्यसे रहित हूँ। नाथ ! मैं अपने आपसे ही अपने उस अविनाशी विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें स्थित हूँ, जहाँपर अमृतका रसास्वाद भी तृणके सदृश नीरस होकर उपेक्षणीय हो जाता है। मैं अपने प्राकृत स्वरूपमें स्थित हूँ,—स्वस्थ हूँ, प्रसन्न हूँ। लोक जहाँ विश्राम करते हैं, उस सुखका केन्द्रस्वरूप मैं हूँ। अतएव मैं वास्तविक राम हूँ, मैं अपने परमार्थ स्वरूपको तथा आपको प्रणाम करता हूँ। शुद्ध आत्मामें अज्ञान आदि विकार कैसे आ सकते हैं। सदा शुद्ध आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है। सब कुछ आत्मा ही है। यह दूसरा है, यह दूसरा है—इत्यादि असत् कल्पनाएँ कैसे आ सकती हैं। (सर्ग ३–५)


देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धि और विषयोंमें सुख-बुद्धि करनेसे दुःखकी प्राप्तिका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! तुम फिर भी मेरे परम रहस्यमय और प्रभावयुक्त वचन सुनो, जिन्हें मैं अतिशय प्रेम रखनेवाले तुम्हारे लिये हितकी इच्छासे कहता हूँ। श्रीराम ! जिस अज्ञानी पुरुषकी अज्ञानवश देहमें ही आत्मभावना उत्पन्न हो जाती है, उस पुरुषको इन्द्रियाँ रोषपूर्वक शत्रु बनकर पराजित कर देती हैं। किंतु जिस विवेकी पुरुषकी ज्ञानपूर्वक एकमात्र नित्य परमात्माके स्वरूपमें ही स्थिति रहती है, उस निर्दोष पुरुषकी इन्द्रियाँ संतोषपूर्वक मित्र बनकर रहती हैं, उसका पतन नहीं कर सकतीं।* व्यवहार करते हुए जिस ज्ञानी पुरुषको


* कठोपनिषद्‌में भी बताया गया है—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धिका वर्णन * ३६७


निन्दनीय भोग्य पदार्थोंमें दोष-दर्शनके कारण निन्दाके सिवा स्तुतिबुद्धि उत्पन्न होती ही नहीं, वह पुरुष दुःखदायी देहमें किसलिये आत्मबुद्धि करेगा ? कभी नहीं करेगा। जैसे प्रकाश और अन्धकार एक दूसरेसे अत्यन्त भिन्न हैं, वैसे ही शरीर और आत्मा एक दूसरेसे अत्यन्त विलक्षण हैं; क्योंकि शरीर जड और मिथ्या है तथा आत्मा चेतन और सत्य है। इसीसे न आत्मा शरीरका सम्बन्धी है और न शरीर ही आत्माका सम्बन्धी, अर्थात् परस्पर विरुद्ध होनेके कारण इनका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। भगवन् ! समस्त भावविकारोंसे नित्यमुक्त एवं निर्लिप्त आत्मा न कभी उत्पन्न होता है और न कभी विनष्ट ही होता है, वरं वह सदा-सर्वदा एकरूपसे रहता है। पत्थरके समान जड, ज्ञानरहित, तुच्छ, कृतघ्न तथा विनाशशील इस शरीरका जो कुछ भी होनेवाला हो वह भले ही हो, इससे आत्माकी न तो हानि है और न इससे उसका कोई सम्बन्ध ही है।

विभिन्न दृष्टियोंसे देखनेपर भी सद्रूप ब्रह्म कभी असद्रूप नहीं हो सकता, इसी प्रकार सर्वव्यापक जीवात्माका शरीरके साथ तनिक भी सम्बन्ध सम्भव नहीं। जैसे जलमें स्थित कमलपत्रका जलसे किंचिन्मात्र सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देहमें स्थित जीवात्माका भी देहसत्ताके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। परमात्माका अच्छी प्रकार साक्षात्कार हो जानेपर परमार्थ सत्यरूप परमात्मामें ही स्थिति हो जाती है और देहात्मबुद्धिरूप अज्ञान-प्रयुक्त भ्रम नष्ट हो जाता है। देह और आत्माके यथार्थ ज्ञानसे देहकी असत्ता और आत्माकी सत्ता सिद्ध हो जाती है। सभी प्राणियोंमें अविनाशी चेतन रहता ही है, परंतु जीवात्माको इसका भली प्रकार ज्ञान न होनेके कारण उसमें कायरता आ गयी है। ऐसे अज्ञानी जीवोंके शरीरसे श्वास उसी प्रकार निकलते रहते हैं, जैसे लोहारकी धौंकनीसे हवा निकलती है; अतः उनका जीवन व्यर्थ है । अज्ञान ही आपत्तियोंका आश्रय-स्थान है। भला, बतलाइये तो सही कि कौन-सी आपत्तियाँ अज्ञानीको नहीं प्राप्त होतीं ? अज्ञानीको उग्र दुःख और सांसारिक क्षणिक सुख भी बार-बार आते और जाते रहते हैं। देह, धन, स्त्री आदिमें आसक्ति रखनेवाले अज्ञानीका यह दुष्ट दुःख कभी भी शान्त नहीं होता। इस अनात्मभूत जड देहमें आत्मभाव करनेवाले अज्ञानी पुरुषकी असत्य बोधमयी माया क्या किसी प्रकार भी नष्ट हो सकती है ? अर्थात् बिना ज्ञानके किसी प्रकार नष्ट नहीं हो सकती। उस अज्ञानी पुरुषका ही जन्म पुनः-पुनः बालपन प्राप्त करता रहता है, बालपन बार-बार यौवन प्राप्त करता रहता है, यौवन बार-बार वार्धक्य प्राप्त करता रहता है और वार्धक्य बार-बार मरण प्राप्त करता रहता है। अज्ञानी पुरुष ही इस जगतरूपी जीर्ण घटीयन्त्र (रहँट) में संसाररूपी रज्जुसे बँधा हुआ कलश-रूप होकर जलमें डूबता और निकलता रहता है। अर्थात् यह अज्ञानी जीव संसारमें बार-बार जन्मता-मरता रहता है। जिस प्रकार पक्षिणियाँ पिंजरेसे बाहर निकल नहीं पातीं, वैसे ही उदरभरणमें अति आसक्तिरूपी बन्धनसे बँधे ज्ञानदृष्टिसे हीन अज्ञानी पुरुषकी बुद्धियाँ अपारसंसार-समुद्रके पार नहीं जा सकतीं । श्रीराम ! विषयोंकी जो केवल ऊपर-ऊपरसे दिखायी पड़नेवाली मधुरता, परिणाममें अनर्यरूपता, आद्यन्तवत्ता, देशतः परिच्छिन्नता और समस्त अवस्थाओंमें नश्वरता प्रसिद्ध है, वे सब अज्ञानरूपी वृक्षके ही फल हैं।

(सर्ग ६)


यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥
(कठ० १।३।५, ६)

'जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और अवशीभूत चञ्चल मनसे युक्त रहता है, उसकी इन्द्रियाँ असावधान सारथिके दुष्ट घोड़ोंकी भाँति वशमें नहीं रहतीं। परंतु जो सदा विवेकयुक्त बुद्धिवाला और वशमें किये हुए मनसे सम्पन्न रहता है, उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथिके अच्छे घोड़ोंकी भाँति वशमें रहती हैं।'

३६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


अज्ञानकी महिमा और विभूतियोंका सविस्तर वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मदरूपी चन्द्रके उदित होनेपर मोतियोंसे वेष्टित तथा रत्नोंसे सुशोभित स्त्रियों क्षुब्ध काम-क्षीरसागरकी तरङ्गके समान जो दिखायी पडती हैं, वह केवल अज्ञानकी ही विभूति है। वसन्तऋतुमें भूमिपर वनखण्डोंमें पुष्प कामके दास कामियोंको जो रमणीय दिखायी पड़ते हैं, उसमें भी अज्ञान ही कारण है। गीध, गीदड़, कुत्ते आदिके खाने योग्य मांस-पिण्डरूप स्त्रियोंके शरीरोंकी जो चन्द्रमा, चन्दन और कमलसे उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। लारसे आर्द्र ओष्ठनामक मांसके टुकड़ेकी जो रसायन, अमृत, मधु आदिके साथ उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञान ही है। आरम्भमें अज्ञानी लोगोंको अत्यन्त मधुर लगनेवाली, मध्यमें राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे बाँधनेवाली एवं अन्तमें शीघ्र नष्ट हो जानेवाली धनराशिकी जो अभिलाषा की जाती है, वह भी अज्ञान ही है। जिसने अनन्त ब्रह्माण्डरूपी पके हुए फलोंको ग्रास बना लिया है और जो सदा खानेकी चेष्टा करनेवाली जठराग्निसे युक्त है, वह काल कल्पोंतक जो तृप्त नहीं होता, उसमें भी अज्ञानकी ही महिमा है। जीवोंकी जो यौवन-रात्रि चिन्तारूपी पिशाचोंसे उपहत तथा विवेकरूपी चन्द्रमाके उदयसे शून्य, अतएव अन्धकारकी तरह प्रकाशरहित बीत जाती है, वह अज्ञानका ही विलास है। आरम्भकालमें कानोंके संनिहित कपोल-प्रदेशको आक्रान्त कर चारो ओरसे निश्चयपूर्वक स्फुरणशील जरारूपी बूढ़ी बिल्ली, जो यौवनरूपी चूहोंका भक्षण करती रहती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। प्रतीतिरूपी पुष्पोंसे उज्ज्वल व्यावहारिक सत्तारूपी लता, जिसमें जगत्रूपी पल्लव हैं और जो धर्म-अर्थरूपी फल धारण करती है एवं विकसित होती है, इसका कारण भी माया ही है। जिसमें बड़े-बड़े पर्वत ही खंभे हैं, सूर्य-चन्द्र ही खिड़कियाँ हैं, आकाश ही आच्छादन (छत) है, ऐसा जगत्-त्रयरूपी महल जो खड़ा हो जाता है, वह भी मायाकी ही महिमा है। अपनी वासनारूपिणी शलाकाओंसे निर्मित शरीरके भीतर स्थित इन्द्रिय-समूहरूप पिंजरेमें जो जगत्के अन्तर्गत जीवरूपी पक्षी आशारूपी सूतसे बँधा हुआ है, उसमें भी उसका अज्ञान ही कारण है।

संसाररूपी स्वल्प जलाशयमें स्फुरित होनेवाली सृष्टिरूपी क्षुद्र मछलीको शठ कृतान्तरूपी वृद्ध गीध जो पकड़ लेता है, उसमें भी मायाकी ही महिमा है। परमपदरूप अचल ब्रह्ममें संकल्पसे उत्पन्न असंख्य जगत्रूप जंगलोंके जाल युगान्तरूपी अग्निसे जो दग्ध हो जाते हैं, उसमें भी अविद्या ही कारण है। निरन्तर उत्पत्ति और विनाशसे तथा दुःख और सुखकी सैकड़ों दशाओंसे, इस प्रकार जगत्स्थिति जो पुनः-पुनः बदलती रहती है, उसमें भी अविद्या ही कारण है। वासनारूपी जंजीरोंसे बँधी हुई अज्ञानियोंकी दृढ़ धारणा क्षुभित युगोंके आवागमन तथा कठोर वज्रोंके आघातोंसे भी जो विदीर्ण नहीं होती, इसमें उनकी अविद्या ही कारण है। राग-द्वेषसे होनेवाले उत्पत्ति-विनाशसे तथा जरा-मरणरूपी रोगसे समस्त जंगम जाति जीर्ण-शीर्ण हो गयी है, इसमें उनका अज्ञान ही कारण है। कभी लक्ष्यमें न आनेवाले बिलमें रहनेके कारण अदृश्य और अपरिमिति भोजन करनेवाला कालरूपी सर्प निर्भय होकर इस समस्त जगत्‌को जो क्षणभरमें ही निगल जाता है, यह सब मायाकी ही महिमा है। प्रत्येक कल्परूप क्षणमें क्षीण हो जानेवाले ब्रह्माण्डरूप प्रस्फुट बुद्बुद, जो भयंकर कालरूपी महासमुद्रमें उत्पन्न और विनष्ट हो जाते हैं, यह भी मायाकी महिमा है। उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जानेवाली प्रतप्त सृष्टिरूपी ये बिजलियाँ, जिन्हें चिन्मय परमात्माके सकाशसे प्रकाश-शक्ति प्राप्त हुई है, जो प्रकट होती हैं, वह भी मायाकी महिमा है। अनन्त संकल्पोंवाली समस्त विकल्पोंसे शून्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्मरूप पदमें

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * अविद्याके कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्याके स्वरूपका वर्णन ३६९

आश्चर्योंकी पूर्ति करनेवाली ऐसी कौन-सी शक्तियाँ नहीं हैं ? अर्थात् सभी शक्तियाँ उसमें विद्यमान हैं। उस प्रकार सुदृढ़ संकल्पोंसे प्राप्त अर्थसमूहसे देदीप्यमान जगत्की ब्रह्ममें जो यह कल्पना है, उसमें भी अज्ञान ही हेतु है। इसलिये श्रीराम ! जो कुछ बारंबार प्राप्त होनेवाली सम्पत्तियाँ या आपत्तियाँ हैं, जो बाल्य-यौवन-जरा-मरणरूपी महान् संताप हैं, जो सुख-दुःखकी परम्परारूप संसार-सागरमें गोता लगाना है, वह सब अज्ञानरूपी गाढ़ अन्धकारकी विभूतियाँ हैं।

(सर्ग ७)


अविद्याके कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्याके स्वरूप तथा उन दोनोंसे रहित परमार्थ-वस्तुका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह अविद्याका कार्य संसार-लता कब और किस प्रकार विकसित हुई, इसका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ! यह अविद्याका कार्य संसार-लता बड़े-बड़े मेरु आदि पर्वतरूप पर्वोंसे युक्त, ब्रह्माण्ड-रूपी त्वचासे आवृत और जनरूपी पत्र, अङ्कुर आदि विकासोंसे युक्त है। ये तीनों लोक इसकी देह हैं। इस अविद्यारूपी लतामें प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करनेवाले सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु और ज्ञान तो फल हैं और अज्ञान इसका मूल है। जन्मसे ही अविद्या उत्पन्न होती है और वह बादमें जन्मान्तररूप फल प्रदान करती है। जन्मसे ही वह संसारके रूपमें अपना अस्तित्व प्राप्त करती है और बादमें स्थितिरूप फल प्रदान करती है। वह अविद्या अज्ञानसे वृद्धि प्राप्त करती है और बादमें अज्ञान-रूप फल देती है। ज्ञानसे आत्माका अनुभव प्राप्त करती और अन्तमें आत्माका अनुभवरूप फल देती है। प्रतिदिन आकाशमें चारों ओरसे विकसित होनेवाली चन्द्र, सूर्य आदिके सहित ग्रहरूप ज्योतियोंकी जो पंक्तियाँ हैं, वे ही इस सृष्टिरूपा लताके पुष्प हैं। रघुनन्दन ! आकाश-मण्डलको व्याप्तकर स्थित इस लताके ऊपर प्रस्फुरित नक्षत्र और तारे ही पुष्पोंकी कलियाँ हैं। चन्द्र, सूर्य तथा अग्निके प्रकाश इस लताके पराग हैं। इसी परागसे यह शुभाङ्गी स्त्रीके समान लोगोंके मनका आकर्षण करती है। यह लता चित्तरूप हाथीद्वारा प्रकम्पित, संकल्परूप मधुर कलनाद करनेवाली कोकिलसे युक्त, इन्द्रियरूपी साँपोंसे वेष्टित और तृष्णारूपी त्वचासे आच्छादित, चतुर्दश भुवनरूपी वनोंसे शोभित, सात समुद्ररूपी सुन्दर खाइयोंसे आवृत्त एवं स्त्रीरूप पुष्पसमूहोंसे शोभित, मनके स्पन्दरूप वायुसे कम्पित, शास्त्रनिषिद्ध कर्मरूपी अजगरसे व्याप्त, स्वर्गकी शोभारूपी पुण्यमण्डलसे शोभित तथा जीवोंकी जीविकासे पूर्ण एवं अनेक प्रकारके विषयभोगोंकी वासनारूप गन्धोंसे अज्ञोंको उन्मत्त करने-वाली है। वह अविद्यारूपा लता अनेक बार उत्पन्न हो चुकी है और उत्पन्न हो रही है, अनेक बार मर चुकी है और मर भी रही है। वह अतीत कालमें थी और वर्तमान कालमें भी है। वह सर्वदा असत्यपदार्थके सदृश होती हुई भी सत्य पदार्थके सदृश बार-बार प्रतीत होती है तथा नित्य विनष्ट भी होती है। यह अविद्याका कार्य संसार निश्चय ही महती विषमयी लता है; क्योंकि अविचारसे इसका सम्बन्ध होनेपर यह तत्क्षण संसाररूपी विषसे उत्पन्न होनेवाली मूर्च्छा लाती है और विवेकपूर्वक सद्-असत्‌के विचारसे तत्क्षण नष्ट हो जाती है। इसलिये यह विवेकीके लिये तो नष्ट हो जानी है और अविवेकीके लिये स्थित रहती है। यह सृष्टिरूपा लता जलके रूपमें, पर्वतोंके रूपमें, नागोंके रूपमें, देवताओंके रूपमें, पृथिवीके रूपमें, द्युलोकके रूपमें, चन्द्र, सूर्य और तारोंके रूपमें विस्तृत हो रही है। श्रीराम ! इन समस्त भुवनोंमें उत्कृष्ट प्रभाव-से चारों ओर व्याप्त अथवा जीर्णताको प्राप्त हुए क्षुद्र तिनकेके रूपमें जो कुछ यह दृश्य प्रतीत हो रहा है उस सबको

३७०* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अविद्याका कार्य होनेसे विनाशशील अविद्या ही समझना चाहिये । उसका विवेक-वैराग्यपूर्वक यथार्थ ज्ञानद्वारा विनाश हो जानेपर सच्चिदानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।

श्रीराम ! यहाँ दृश्यरूप जगत्‌के सम्बन्धसे और कल्पनाओंसे रहित, परम शान्त, सबका आत्मस्वरूप केवल एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही है। जिस प्रकार जलसे तरङ्गें प्रकट होती हैं, वैसे ही उस परमात्माके संकल्पसे कलारूप प्रकृति प्रकट होती है। यह प्रकृति सत्त्व, रज, तम—त्रिगुणमयी है। सत्त्व आदि तीन गुणस्वरूप धर्मोंसे युक्त प्रकृति ही अविद्या (माया) है। यही प्राणियोंका संसार है। इस प्रकृतिसे पार हो जाना ही परमपदकी प्राप्ति है। जो कुछ भी यह दृश्य-प्रपञ्च दिखायी पड़ता है, वह सब इसी अविद्याका कार्य होनेसे उसीके आश्रित है। श्रीराम ! ऋषि, मुनि, सिद्ध, दिव्य नाग, विद्याधर, देवता—इनको प्रकृतिके सात्त्विक, अंशस्वरूप जानो। प्रकृतिका जो शुद्ध सत्त्व-अंश है, वह विद्या है; उस विद्यासे अविद्या उसी प्रकार उत्पन्न होती है, जिस प्रकार जलसे बुद्बुद उत्पन्न होते हैं। और जिस प्रकार बुद्बुद जलमें लीन हो जाते हैं, उसी प्रकार उस विद्यामें ही यह अविद्या विलीन भी हो जाती है। जैसे जल और तरङ्गकी द्वित्वभावनासे ही भिन्नता है, वैसे ही विद्या और अविद्या-दृष्टियोंकी भेदभावनासे ही भिन्नता है, वस्तुतः नहीं। जिस प्रकार परमार्थतः जल और तरङ्गकी एक-रूपता ही है उसी प्रकार विद्या और अविद्या भी एक-रूप ही हैं, पृथक् नहीं। वास्तवमें एक परमात्मासे भिन्न विद्या और अविद्या नामकी कोई वस्तु ही नहीं है; अतः विद्या और अविद्या-दृष्टिका परित्याग करनेपर यहाँ जो कुछ अवशिष्ट रहता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही वास्तवमें विद्यमान है, दूसरा नहीं; क्योंकि न अविद्या नामका पदार्थ है और न विद्या नामका ही पदार्थ है, इसलिये यह कल्पना व्यर्थ है। वास्तवमें परमात्माको छोड़कर बच रहनेवाला कुछ भी नहीं है; यदि कुछ है तो वह एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। जब परमात्मा-के स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं रहता, तब वह अज्ञान ही अविद्या कहलाता है और जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब वह ज्ञान ही अविद्याक्षय—इस नामसे कहा जाता है। आतप और छायाकी तरह परस्पर-विरुद्ध विद्या और अविद्या दोनोंमेंसे विद्याका अभाव होनेपर अविद्या नामक मिथ्या कल्पना प्रकट होती है, जैसे सूर्यके अस्त हो जानेपर छाया-ही-छाया रह जाती है। श्रीराम ! अविद्याका विनाश हो जानेपर विद्या और अविद्या दोनों ही कल्पनाओंका विनाश हो जाता है। इन दोनोंका अभाव हो जानेपर एक प्राप्तव्य सच्चिदानन्द परब्रह्म ही बच रहता है। जैसे समुद्र तरङ्गोंका और निर्मल मणि रश्मियोंका खजाना है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही अनन्त चराचर प्राणियोंका खजाना है। जैसे अनन्त घड़ोंमें एक ही आकाश बाहर-भीतर परिपूर्ण है, उसी प्रकार समस्त जड़-चेतन वस्तुओंमें बाहर और भीतर भी एक अविनाशी सत् वस्तुस्वरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। जिस प्रकार अयस्कान्तमणि (चुम्बक) के सकाशमात्रसे जड लोह क्रियाशील हो जाता है, वैसे ही एकमात्र चिन्मय परमात्माके सकाशसे जड देहादि पदार्थ क्रियाशील होते हैं। जगत्‌के एकमात्र कारण उस चिन्मय परमात्मामें उसकी कल्पनासे ही यह कल्पित दृश्य जगत् स्थित है—ठीक उसी प्रकार, जैसे चित्र-विचित्र चञ्चल तरङ्ग-समूह जलमें स्थित है। वास्तवमें अनन्त आकाशकी तरह निराकार चिन्मय परमात्मामें यह कुछ भी नहीं है।

(सर्ग ८-९)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा अविद्याके नाशका प्रतिपादन * ३७१

अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याके नाशका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! परमात्माके सिवा जो यह स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् प्रतीत होता है, यथार्थमें वह कुछ भी नहीं है; क्योंकि विवेकपूर्वक विचार करने-पर जैसे रज्जुमें होनेवाले सर्पभ्रमसे किसी भी सर्पकी उपलब्धि नहीं होती, उसी प्रकार हृदयके भीतर जो यह देहमें अहंता और बाह्य विषयोंमें ममतारूपी सम्बन्ध भी होता है, विवेकपूर्वक विचार करनेपर उसकी किसी तरह भी उपलब्धि. नहीं होती । जाने बिना ही भ्रमसे ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें प्रतीत होता है, ब्रह्मका अच्छी प्रकार ज्ञान हो जानेपर सम्पूर्ण जड़-चेतनकी अन्तिम सीमारूप ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। अज्ञानी बालककी तरह यह जीवात्मा अज्ञानके कारण चित्तस्वरूपको प्राप्त हुआ है, इसलिये चित्तके चलनेपर अपने आपको चलता हुआ देखता है, चित्तके स्थिर होनेपर अपनेको भी स्थिर देखता है। यह आत्मा इस तरह अज्ञानसे इस उपद्रवयुक्त चित्तको ही अपना स्वरूप समझता है। यह चित्त बालक यानी विवेकशून्य है, इसलिये वह चित्तप्राय मनुष्य रेशमके कीड़ेकी तरह अपनेको चित्तगत वासनारूप दीर्घतन्तुओं-से भीतर बाँधता हुआ भी नहीं जानता।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—प्रभो ! अत्यन्त घनीभावको प्राप्त हुआ अविवेक (अज्ञान) वृक्ष-पहाड़ आदि स्थावर योनियोंको प्राप्त होता हुआ किस प्रकार स्थित रहता है ? यह कृपा करके कहिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अमनस्त्व अर्थात् सुषुप्तिकी भाँति मनके लयको प्राप्त न हुआ और मनस्त्व अर्थात् मननशीलतासे च्युत हुआ जीवात्मा स्थावर योनिमें साक्षी (उदासीन)-की भाँति स्थित रहता है। तात्पर्य यह कि स्थावर योनियोंमें जीवात्माका चित्त न तो सुषुप्तिकी तरह विलीन ही होता है और न जंगम प्राणियोंकी तरह चञ्चल ही रहता है; बल्कि मूढ़ मनुष्यकी तरह वह बीचकी-सी स्थितिमें रहता है। ज्ञातव्य ब्रह्मको जाननेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! उन स्थावर योनियोंमें जीवात्मा विवेकशून्य और दुःखका प्रतीकार करनेमें असमर्थ रहता है; अतः उन स्थावर शरीरोंमें मोक्ष अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसा मैं मानता हूँ; क्योंकि वहाँ जीवात्मा कर्मेन्द्रियोंसे, ज्ञानेन्द्रियोंके व्यापारोंसे तथा मानस व्यापारोंसे शून्य हुआ केवल सत्तामात्रसे स्थित रहता है।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! जिन स्थावर शरीरोंमें जीवात्मा एकमात्र सत्तारूपसे ही स्थित रहता है, वहाँ मुक्ति दुर्लभ है—ऐसा ही मैं भी मानता हूँ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! बुद्धिपूर्वक विचारने-पर यथार्थ वस्तुरूप परमात्माके साक्षात्कारसे चिन्मय सत्ताका जो सबमें समान भावसे अनुभव होता है, वही अविनाशी मोक्षपद है। परमात्मतत्त्वको यथार्थतः जान लेने-पर वासनाओंका जो उत्तम यानी अशेषरूपसे अभाव है, उसे ही सबमें समभावसे सत्तारूप मोक्षपद कहा गया है। ज्ञानी महात्मा पुरुषोंके साथ विचार करके और अध्यात्मभावनासे शास्त्रोंको समझकर सत्ता-सामान्यमें जो निष्ठा होती है, उसी निष्ठाको मुनिलोग परब्रह्म कहते हैं। यही परब्रह्मकी प्राप्ति है। जिसके भीतर मानस व्यापाररूप मनन भलीभाँति लीन हो गया है। तथा चारों ओरसे जिसमें वासनाएँ तिरोहित हो गयी हैं, वह जड़ वर्गवाली स्थावर जीवोंकी सुषुप्ति सैंकड़ों जन्म-रूपी दुःखोंको देती है। जड़ स्वभाववाले ये सभी वृक्ष-पहाड़ आदि स्थावर योनिके जीव सुषुप्ति अवस्थाको प्राप्त हुए-से पुनः-पुनः जन्मके भागी होते हैं। श्रेष्ठ श्रीराम ! जिस तरह बीजोंमें अङ्कुरसे लेकर पुष्पतक पदार्थ स्थित हैं एवं जिस तरह मिट्टीमें घट स्थित है, उसी तरह स्थावरोंके भीतर भी अपनी वासना स्थित है । वासना,

३७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अग्नि, ऋण, व्याधि, शत्रु, स्नेह, विरोध एवं विष—ये थोड़े-से भी शेष रहनेपर हानि पहुँचाते हैं । जिसका वासना-बीज ज्ञानाग्निसे दग्ध हो गया है और जिसने सत्त्वमें समान सत्तारूप परमात्माको प्राप्त कर लिया है, वह महात्मा पुरुष, चाहे सदेह हो या देहसे रहित पुनः कभी दुःखका भागी नहीं होता ।

श्रीराम ! आत्मदर्शनके विरोधी अज्ञानसे आवृत हुई यह चेतनशक्ति संसाररूप भ्रमको जन्म देती है और अज्ञानसे मुक्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश कर देती है । इस आत्मदृष्टिका जो अभाव है, उसीको विद्वान्लोग अविद्या कहते हैं । अविद्या जगत्‌की कारणभूत है, अतः उसीसे सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है । रूपरहित इस अविद्याका जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब तुरंत यह उसी प्रकार विनष्ट हो जाती है, जैसे घाममें तुषारके परमाणु गल जाते हैं । दीपकको प्रज्वलित करनेपर जिस प्रकार अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी तरह अच्छी प्रकार विचार करनेपर यह अविद्या नष्ट हो जाती है । वास्तवमें यह अविद्या कोई वस्तु न होनेसे असत्‌ है और विचार न करनेसे ही दीख पड़ती है । रक्त, मांस तथा अस्थिमय इस देह-यन्त्रमें 'मैं स्वयं कौन हूँ ?' इस प्रकार जब विवेकपूर्वक विचार किया जाता है, तब देहके किसी भी पदार्थमें मैं-पन सिद्ध नहीं होता, वरं शरीरका अभाव हो जाता है । अपने अन्तःकरणके विवेक-विचारसे आदि-अन्तमें असद्रूप इस शरीर और संसारका परिहार कर देनेपर अविद्याका क्षय हो जाता है; फिर शेषमें एक परमात्मा ही रह जाता है । वही वास्तवमें शाश्वत ब्रह्म है । वही वास्तविक पदार्थ और उपादेय है; क्योंकि उसीसे अविद्या निवृत्त हो जाती है । 'अविद्या' इस अपने नामसे ही इसके अभावरूपका ज्ञान हो जाता है । वास्तवमें अविद्या नामकी कोई वस्तु कहीं भी नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् अखण्ड ब्रह्मस्वरूप ही है, जिस ब्रह्मने कार्य-कारणरूप इस सम्पूर्ण जगत्‌का निर्माण किया है । 'यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप नहीं है' इस प्रकारका निश्चय ही अविद्याका स्वरूप है और 'यह जगत् ब्रह्मरूप है' यह निश्चय ही उसका विनाश है । (सर्ग १०)

परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन एवं महात्मा पुरुषोंके लक्षण तथा आत्मकल्याणके लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण-निरोधरूप योगका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यह अज्ञान अत्यन्त बलवान् है । इसीका दूसरा नाम 'अविद्या' है । वह अन्य असंख्य जन्मोंसे चला आ रहा है, अतएव वह दृढ़ हो गया है । देहकी उत्पत्ति और विनाशमें, बाहर-भीतर—सर्वत्र समस्त इन्द्रियाँ उस अविद्याका ही निरन्तर अनुभव करती हैं, इसलिये वह अविद्या दृढ़ हो गयी है; क्योंकि परमात्माके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान तो किसी भी इन्द्रियका विषय नहीं है । मनसहित छहों इन्द्रियोंका विनाश हो जानेपर वह सत्स्वरूप परमात्माका यथार्थ ज्ञान ही कायम रहता है । इन्द्रिय-वृत्तियोंसे अतीत होनेके कारण वह परमात्माका स्वरूप प्राणियोंको प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है; क्योंकि प्राणी तो पदार्थोंका अनुभव मन-इन्द्रियोंके द्वारा ही करते हैं । रघुनन्दन ! जिस प्रकार परमात्मज्ञानके अभ्यासमें निरत राजा जनक परमात्मतत्त्वको यथार्थरूपमें जानकर भूमण्डलमें विचरण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी विचरण करो । भगवान् नारायण जीवोंके कल्याणके लिये विभिन्न लीलाएँ करनेके जिस निश्चयसे पृथ्वी-पर नाना योनियोंमें अवतार लेते हैं, वही निश्चय वास्तविक यथार्थज्ञान है । रघुनन्दन ! जगदम्बा पार्वतीके साथ रहनेवाले त्रिनेत्र महादेवजीका या रागरहित ब्रह्माका जो

[निर्वाण-प्रकरण पू०] * परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन * ३७३

श्चय है, वही निश्चय वास्तविक है। तुम्हारा भी वही निश्चय होना चाहिये। देवगुरु बृहस्पति, शुक्राचार्य, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, महामुनि नारद, महर्षि अगस्त्य, अङ्गिरा, प्रचेता, भृगु, क्रतु, अत्रि, शुकदेव तथा अन्यान्य जीवन्मुक्त ब्रह्मर्षि और राजर्षि महात्माओंका तथा मेरा भी परमात्माके स्वरूपके विषयमें जो निश्चय है, वही निश्चय तुम्हारा होना चाहिये।

श्रीरामजी बोले—भगवन् ! ब्रह्मन् ! जिस निश्चयके कारण ये पूर्वोक्त महाबुद्धिमान् एवं धीर बृहस्पति आदि शोकरहित हुए स्थित हैं, उसका मुझसे तात्त्विक रूपसे वर्णन कीजिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—समस्त जाननेयोग्य पदार्थोंको यथार्थतः जाननेवाले महाबाहु श्रीराम ! जो तुमने पूछा है, उसका उत्तर स्पष्टरूपसे सुनो। उनका यही निश्चय है, जो मैं बतला रहा हूँ। श्रीराम ! जो कुछ भी यह भोगरूप संसार-जाल स्थित दिखायी पड़ता है, वह सब निर्मल ब्रह्म ही है। ब्रह्म ही जीवात्मा है, चौदह भुवन ब्रह्म ही हैं, आकाशादि भूत भी ब्रह्म ही हैं, मैं भी ब्रह्मस्वरूप हूँ, मेरा शत्रु भी ब्रह्मस्वरूप है; सन्मित्र, बन्धु-बान्धव आदि भी ब्रह्म-स्वरूप हैं। तीनों काल भी ब्रह्मस्वरूप हैं, क्योंकि वे ब्रह्ममें ही अवस्थित हैं। जैसे समुद्र अपने आपमें तरङ्गोंके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही यह सच्चिदानन्द ब्रह्म अपने आपमें सांसारिक पदार्थ-सम्पत्तिके रूपमें प्रकट होता है। नेत्र-दोषके कारण आकाशमें बिना हुए ही भ्रान्तिसे वृक्षकी प्रतीति होती है, किंतु वास्तवमें वृक्ष नहीं है; इसी तरह ब्रह्ममें जो राग-द्वेष आदि दोष भ्रमसे प्रतीत होते हैं, वे वास्तवमें हैं ही नहीं; क्योंकि ये सब कल्पनामात्र हैं, इसलिये संकल्पके अभावसे इनका अत्यन्त अभाव हो जाता है। गमनागमन आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ भी ब्रह्ममें ही होती हैं; क्योंकि ब्रह्म ही अपने संकल्पसे अद्वितीय सुखरूपमें स्फुरित होता है, तब उसमें दुःख और सुख कैसे ? ब्रह्म ही स्वयं ब्रह्ममें तृप्त है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्थित है, ब्रह्म ही ब्रह्ममें स्फुरित होता

है; अतः मैं भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हूँ। क्योंकि घट भी ब्रह्म है, पट भी ब्रह्म है, मैं भी ब्रह्म हूँ, यह विस्तृत जगत् भी ब्रह्मस्वरूप ही है, इसलिये यहाँ ब्रह्मके अतिरिक्त मिथ्या राग-वैराग्य आदिकी कल्पना ही नहीं हो सकती।

जिस प्रकार सुवर्णसे आभूषण और जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं हैं, वैसे ही प्रकृति ब्रह्ममें बिना हुए ही प्रतीत होती है, किंतु ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। यह जीवात्मा चेतन है और यह पदार्थ जड़ है—इस प्रकारका मोह अज्ञानियोंको ही होता है, ज्ञानीको कभी नहीं होता। जिस प्रकार अंधे मनुष्यको जगत् अन्धकाररूप और सुदृष्टिवालेको प्रकाशरूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार अज्ञानीको यह जगत् दुःखमय और ज्ञानीको सच्चिदानन्दमय प्रतीत होता है। सदा-सर्वदा सब ओर एकरस स्थित विज्ञानानन्दघन ब्रह्ममें न कोई मरता है और न कोई जीता है। जिस प्रकार महान् सागरके उल्लसित होनेपर भी उसमें तरङ्ग आदि न जन्मते हैं और न मरते हैं, उसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्ममें प्राणी न जन्मते हैं और न मरते हैं। जैसे जलमें तरङ्गोंके रूपमें प्रचुर जल ही स्थित है, वैसे ही अपने आपमें जगत्‌की शक्तिके रूपमें ब्रह्म ही स्थित है। जैसे जलमें जो कण, कणिका, वीचि, तरङ्ग, फेन और लहरी हैं, वे सब जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही ब्रह्ममें जो देह, मनका व्यापार, दृश्य, क्षय, क्षयका अभाव, भाव-रचना और अर्थ हैं, वे सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जिस प्रकार सुवर्णसे बनी आभूषणकी विभिन्न आकृति-रचनाएँ सुवर्णसे पृथक् नहीं होतीं, उसी प्रकार ब्रह्मसे उत्पन्न हुई चित्र-विचित्र देहादिकी आकृति-रचनाएँ भी ब्रह्मसे भिन्न नहीं हो सकतीं। अज्ञानियोंको वृथा ही उसमें द्वित्वभावना होती है। मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ आदि सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं; अतः ब्रह्मसे भिन्न सुख और दुःखकी भी सत्ता नहीं है। ब्रह्मको ब्रह्म न जाननेसे अज्ञानीके लिये वह प्राप्त होते हुए भी अप्राप्त है, जिस तरह, सुवर्णका ज्ञान हुए बिना सुवर्ण प्राप्त हुआ

३७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भी अप्राप्त ही है। ब्रह्मको ब्रह्म जान लेनेपर तत्क्षण ही ब्रह्म प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार सुवर्णको सुवर्ण जान लेनेपर तत्क्षण ही सुवर्ण प्राप्त हो जाता है। कर्म, कर्त्ता, करण, कारण और विकारोंसे रहित स्वयं समर्थ महान् आत्मा ही ब्रह्म है, यों ब्रह्मज्ञानीलोग कहते हैं।

'यह देह मै नहीं हूँ' इस प्रकार जब ज्ञान हो जाता है, तब ब्रह्मभावना उत्पन्न होती है। इसीसे देहमें अहं-भाव मिथ्या सिद्ध हो जाता है। उस समय पुरुष देहसे विरक्त हो जाता है। 'मै एकमात्र ब्रह्मस्वरूप हूँ' इस प्रकार यथार्थ ज्ञान होनेपर ब्रह्मभावना प्रकट होती है। उस अपने वास्तविक रूपका यथार्थ ज्ञान होनेपर अज्ञान विलीन हो जाता है। मुझे न दुःख है न कर्म हैं, न मोह है न कुछ अभिलषित है। मै एकरूप, अपने स्वरूपमें स्थित, शोकशन्य तथा ब्रह्मस्वरूप हूँ—यह ध्रुव सत्य है। मैं कल्पनाओंसे शून्य हूँ, मैं सर्वविध विकारोंसे रहित और सर्वात्मक हूँ; मै न त्याग करता हूँ और न कुछ चाहता हूँ; मै परब्रह्मस्वरूप परमात्मा हूँ, यह ध्रुव सत्य है। जिसमें सब कुछ स्थित है, जिससे यह सब उत्पन्न हुआ है, जो यह सब है, जो सब ओर विद्यमान है एवं जो सबका अद्वितीय आत्मा है, वही परब्रह्म परमात्मा है। यह निश्चय है, वही चेतन आत्मा—वह व्यापक, दृश्यरहित सच्चिदानन्दघन ब्रह्मतत्त्व ही ब्रह्म, सत्, सत्य, ऋत, ज्ञ इत्यादि नामोंसे सर्वत्र कहा जाता है। विषय-संसर्गरहित, चेतनमात्रस्वरूप, विशुद्ध, समस्त भूत-प्राणियोंको जाननेवाला, सर्वव्यापक, परम शान्त, सच्चिदानन्द ब्रह्मका ब्रह्मज्ञानी अनुभव करते हैं। सुषुप्तिके सदृश समस्त विकल्पोंसे रहित, परम शान्तरूप, विशुद्ध प्रकाशस्वरूप, सांसारिक विषय-सुखोंसे अत्युत्तम तथा वासनाओंसे रहित सच्चिदानन्द ब्रह्म ही मै हूँ। सुख-दुःख आदि कल्पनाओसे रहित, निर्मल, सत्य अनुभवरूप जो शाश्वत सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूप है, वही मै हूँ। पर्वत आदि पदार्थ-समुदायके बाहर एवं भीतर सर्वदा समान सत्तारूपसे व्यापक निर्लेप विज्ञानानन्दघन जो परमात्मा है, वही मै हूँ। जो सम्पूर्ण संकल्पोंका फल देनेवाला, अग्नि-सूर्य-चन्द्र आदि सम्पूर्ण तेजोंका प्रकाशक और प्राप्त करनेयोग्य सम्पूर्ण पदार्थोंकी अन्तिम सीमा है, उस सच्चिदानन्दघन परमात्माकी हम उपासना करते हैं। वह चिन्मय परमात्मा बाहर-भीतर—सर्वत्र प्रकाशस्वरूपसे विद्यमान और अपने आपमें स्थित है; सबके हृदयमें स्थित होते हुए भी उसका अज्ञानके कारण अनुभव नहीं होता; अतः वह दूर न होते हुए भी दूर कहा गया है। उस परमात्माकी हम उपासना करते हैं। जो समस्त संकल्पों, कामनाओं तथा रोष आदिसे रहित है, उस चिन्मय परमात्माकी हम उपासना करते हैं। उस परमात्मामें यह सारा जगत् प्रतीत होता है, किंतु वास्तवमें इस जगत्का उसमें अत्यन्ताभाव है तथा वास्तवमें वह है, इसीलिये वह सद्रूप है; किंतु वह मन-इन्द्रियोंका विषय नहीं है, इसलिये असद्रूप है। ऐसे उस एक अद्वितीय निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्द परमात्माको मै प्राप्त हूँ। जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि सारे विषय-पदार्थोंका प्रकाशक है और वास्तवमें जो उन सब विषय-पदार्थोंसे रहित है, उस परम शान्त चिन्मय परमात्माको मै प्राप्त हूँ। जो समस्त विभूतियों और महिमाओंसे युक्त प्रतीत होता है, किंतु जो वास्तवमें समस्त विभूतियों एवं महिमाओंसे रहित है तथा जो मायाके सम्बन्धसे जगत्का कर्ता-सा प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें अकर्ता है, उस विज्ञानानन्दघन परमात्माको मै प्राप्त हूँ।

रघुनन्दन! पूर्वोक्त निश्चयवाले वे सद्रूप जीवन्मुक्त महात्मा सत्यस्वरूप परम शान्त परमपदमें स्थित हो गये थे। वे फूलोंसे पूर्ण, झूलेके-से आन्दोलनोंसे चञ्चल चित्र-विचित्र वनोंकी पंक्तियोंमें एवं मेरु पर्वतकी चोटियो-के ऊपर विचरण करते थे। वे अनेक प्रकारके सदाचारोंके रूपमें इन सभी धर्मोंका स्वयं अनुष्ठान

**२—श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीकी सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वारा उपदेशका आरम्भ, चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण** \dots **३६३**

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर वसिष्ठजीका मेरुगिरिपर जाना * ३७२

करते थे । इसी प्रकार श्रुति-स्मृतिविहित कर्मोंका भी वे कर्त्तव्य-बुद्धिसे आचरण करते थे । उन तत्त्ववेत्ता महापुरुषोंका मन अत्यन्त कमनीय कञ्चन और कामिनीके प्राप्त होनेपर हर्ष और चञ्चलता आदि विकारोंको नहीं प्राप्त होता था । वे सुखकी प्राप्ति होनेपर हर्षित और दुःखकी प्राप्ति होनेपर खिन्न नहीं होते थे ।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! अब कृपाकर मुझे यह बतलाइये कि प्राणवायुकी गतिके अवरोधसे वासनाका विनाश हो जानेपर जीवन्मुक्त-पदमें परम शान्ति कैसे मिलती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! संसार-सागरसे पार उतरनेके साधनका नाम ही 'योग' है । उस चित्तको शान्त करनेवाले साधनको तुम दो प्रकारका समझो । इसका प्रथम प्रकार परमात्माका यथार्थ ज्ञान है, जो संसारमें प्रसिद्ध है और द्वितीय प्रकार प्राण-निरोध है, जिसे मैं आगे बता रहा हूँ; सुनो ।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुवर ! योगके इन दोनों प्रकारके साधनोंमें कौन-सा सरल और कष्टरहित उत्तम साधन है, जिसके जाननेसे विक्षेप फिर बाधा नहीं पहुँचाता ?

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! यद्यपि शास्त्रोंमें 'योग' शब्दसे उपर्युक्त दोनों ही प्रकार (परमात्म-विषयक ज्ञान और प्राणनिरोध) कहे गये हैं, तथापि इस 'योग' शब्दकी प्राणनिरोधके अर्थमें ही अधिक प्रसिद्धि है । संसार-सागरसे पार उतरनेकी पद्धतिमें एक योग (प्राण-निरोध) और दूसरा ज्ञान—ये दोनों एक फल देनेवाले समान उपाय शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं । किसीके लिये योगका साधन असाध्य-सा है और किसीके लिये परमात्मविषयक ज्ञानका साधन असाध्य-सा है; परंतु मैं तो परमात्मविषयक ज्ञानके साधनको ही सुसाध्य मानता हूँ । यह प्राणनिरोधरूप योग देश, काल, आसन, प्राणायाम, धारणा, ध्यान आदि उपायोंसे सिद्ध होता है; अतः वह सुसाध्य नहीं है । किंतु साधकको सुसाध्यता और दुःसाध्यताका विचार नहीं करना चाहिये । रघुकुलतिलक ! ज्ञान और योग—ये दोनों ही उपाय शास्त्रोक्त हैं । इन दोनोंमेंसे सब ज्ञानोंसे परे जाननेयोग्य विशुद्ध ज्ञान तुम्हें पहले बतलाया जा चुका है । अब तुम यह योग सुनो, जो प्राण और अपानके निरोधके नामसे प्रसिद्ध है, तथा देहरूपी गुहाका दृढ़ आश्रय करनेवाला, अणिमादि अनन्त सिद्धियोंको देनेवाला और परमार्थ-ज्ञान प्रदान करनेवाला है ।

(सर्ग ११-१३)


देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर महर्षि वसिष्ठका उसे देखनेके लिये मेरुगिरिपर जाना, मेरु-शिखर तथा 'चूत' नामक कल्पतरुका वर्णन, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे मिलना, भुशुण्डद्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे उनका वृत्तान्त पूछना और उनके गुणोंका वर्णन करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! पूर्ववर्णित उस अनन्त परमात्माके किसी एक अंशमें मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाली मृगतृष्णाकी भाँति यह ब्रह्माण्ड वर्तमान है । उस ब्रह्माण्डमें सृष्टिकी उत्पत्तिके कारण तथा पूर्वकृत कर्मानुसार प्राणिसमूहकी रचनामें संलग्न कमलयोनि ब्रह्मा पितामहरूपसे स्थित हैं उन्हीं ब्रह्मदेवका मैं एक सदाचारसम्पन्न मानसपुत्र हूँ । मेरा नाम वसिष्ठ है । मैं ध्रुवद्वारा धारण किये गये सप्तर्षिमण्डलमें वैवस्वत मन्वन्तर-पर्यन्त निवास करता हूँ । एक समयकी बात है, मैं स्वर्गलोकमें देवराज इन्द्रकी सभामें बैठा हुआ था । वहाँ देवर्षि नारद आदि भी विराजमान थे । वे चिरजीवियोंकी कथा सुना रहे थे । मैंने भी यह कथा

३७६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सुनी थी। उस समय किसी कथा-प्रसङ्गके अवसरपर मुनिवर शातातप, जो मितभाषी, मानी और अगाध बुद्धिसम्पन्न थे, कहने लगे—"मेरुगिरिके ईशानकोणमें पद्मरागमणिसे युक्त एक बहुत ऊँचा शिखर है। उसकी चोटीपर एक अत्यन्त शोभाशाली कल्पतरु है, जो 'चूत' नामसे विख्यात है। उस कल्पतरुके उपरी भागकी दाहिनी शाखामें एक कोटर है, जो चाँदीके समान श्वेतवर्णकी लताओंसे आच्छादित है। उस कोटरमें एक घोंसला विद्यमान है। उस घोंसलेमें एक परम ऐश्वर्यशाली कौआ निवास करता है। उस वीतराग वायसका नाम भुशुण्ड है। देवगण ! वह वायसराज भुशुण्ड इस जगत्में जिस प्रकार चिरकालसे जी रहा है, वैसा चिरजीवी तो स्वर्गलोकमें न कोई हुआ है और न होगा ही। वह दीर्घायु तो है ही, साथ ही रागरहित, ऐश्वर्ययुक्त, शान्त और सुन्दर रूपवाला भी है। उसकी बुद्धि अगाध और स्थिर है। वह कालकी गतिका पूर्ण ज्ञाता है।"

राघव ! इस प्रकार जब कथाका समय समाप्त हुआ और सभी देवता अपने-अपने वासस्थानको चले गये, तब मैं कुतूहलवश उस भुशुण्ड पक्षीको देखनेके लिये चल पड़ा। फिर तो तुरंत ही मैं मेरुगिरिके उत्तम शिखरपर जा पहुँचा, जहाँ वह भुशुण्ड नामक कौआ रहता था। वह विशाल शिखर पद्मरागमणिसे निर्मित था। वहाँ झरते हुए गङ्गाजीके झरनोंके शब्द गूँज रहे थे। उसके लताकुञ्जोंमें देवता विराजित थे। गन्धर्वोंकी गीत-ध्वनिसे वह अत्यन्त रमणीय लग रहा था और वहाँ शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु बह रही थी। उसी शिखरपर मैंने 'चूत' नामक कल्पवृक्षको देखा। वह देवता, किन्नर, गन्धर्व एवं विद्याधरोंसे युक्त, ब्रह्माण्डकी तरह विस्तृत, असीम तथा दसों दिशाओं और आकाशको व्याप्त किये हुए था। वह सब ओरसे पुष्पों, फलों और कोमल पल्लवोंसे आच्छादित था। उसके पुष्पोंसे सबको आह्लाद प्रदान करनेवाले पराग झड़ रहे थे, जिनसे उसकी अत्यन्त विचित्र शोभा हो रही थी। वहाँ मैंने देखा, अनेक जातिके पक्षी उस वृक्षके तने और शाखाओंकी संधियोंमें, लताओंसे आवृत्त शाखाग्रभागोंमें, लता-पत्रोंमें, गाँठोंमें और पुष्पोंमें घोंसले बनाकर उनमें छिपे हुए बैठे थे। वहाँ मैंने ॐकार और वेदके मित्रभूत ब्रह्माके वाहन हंसोंके बच्चोंको भी देखा, जिन्हें ब्रह्मविद्याकी विधिवत् शिक्षा प्राप्त हो चुकी थी एवं जो सामवेदका गान करनेवाले थे। तत्पश्चात् मैंने अग्निदेवके वाहन शुकोंको देखा। उनके शरीरका रंग शङ्ख, विद्युत्पुञ्ज और नील मेघके समान था तथा कोई-कोई यज्ञवेदियोंपर बिछाये गये हरित वर्णके कुश-लताओंके दलोंकी भाँति हरे रंगके भी थे। देवगण सदा उनका दर्शन करते थे। वे मन्त्रोंका उच्चारण कर रहे थे। उनकी बोली स्वाहाकारकी-सी जान पड़ती थी। वहाँ मयूरोंके बच्चे भी थे, जिनकी शिखाएँ अग्नि-शिखा-सी उद्दीप्त थीं, जिनके पर जगज्जननी पार्वती (अपने जूड़ेमें

निर्वाण-प्रकरण पू०]* देवसभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर वसिष्ठजीका मेरुगिरिपर जाना * ३७१


बाँधनेके लिये) सँभालकर रखती थीं तथा जो स्कन्दद्वारा विस्तारित शिव-सम्बन्धी सम्पूर्ण विज्ञानोंके विशेष जानकार थे।

इस प्रकार ज्यों ही मेरी दृष्टि उस वृक्षकी दाहिनी शाखाके एकान्त कोटरपर पड़ी, त्यों ही मैने देखा कि वहाँ बहुत-से कौए बैठे हुए हैं और उनके बीचमें ऐश्वर्यशाली एवं अत्यन्त उन्नत शरीरवाला वायसराज भुशुण्ड विराजमान है। उसका मन आत्मज्ञानसे परिपूर्ण है। वह दूसरोंको मान देनेवाला, समदर्शी और सर्वाङ्गसुन्दर है। प्राण-क्रियाके निरोधसे वह सदा अन्तर्मुख वृत्तिवाला और सुखी है तथा चिरजीवी होनेके कारण वह 'चिरजीवी' नामसे विख्यात है। वह भूतकालीन सुर, असुर और महीपालोंके इतिहासका ज्ञाता, प्रसन्न एवं गम्भीर मनसे युक्त, चतुर तथा कोमल एवं मधुर वाणी बोलनेवाला है। वह परमात्माके सूक्ष्मतत्त्वका वक्ता तथा विज्ञाता है। वह ममता और अहंकारसे रहित, बुद्धिमें बृहस्पतिसे भी बढ़कर, प्राणीमात्रका हितैषी, बन्धु एवं मित्र है। वह एक मनोरम सरोवरकी भाँति सौम्य, प्रसन्न, मधुर, ब्रह्म-रससे युक्त, महान् आनन्दरससे सम्पन्न और आन्तरिक अखण्ड शान्ति-समन्वित है। गम्भीरताका परित्याग न करनेके कारण उसके अन्तः-करणकी शोभा प्रकटित हो रही थी।

रघुनन्दन ! तदनन्तर मैं उस भुशुण्ड पक्षीके सामने उतर पड़ा, मानो पर्वतपर आकाशसे कोई नक्षत्र आ गिरा हो। मेरा शरीर कान्तिमान् तो था ही, अतः मेरे आनेसे वह सभा कुछ चञ्चल हो उठी। यद्यपि वहाँ मेरे जानेकी कोई सम्भावना नहीं थी, तथापि मुझे देखते ही भुशुण्डने पहचान लिया कि ये तो वसिष्ठजी पधारे हैं। फिर तो वह पर्वतसे उठे हुए छोटे-से मेघ-खण्डके समान अपने पत्र-पुञ्जके आसनसे उठ खड़ा हुआ और मधुर वाणीमें बोला—'मुनिवर ! आपका स्वागत है।' तत्पश्चात् उसने आसन, अर्घ्य और पाद्य आदि देकर मेरा सत्कार किया। उस समय उस महान् तेजस्वी भुशुण्डका मन परम प्रसन्न था। उसने सौहार्दवश मधुर वाणीमें मुझसे कहना आरम्भ किया।

भुशुण्ड बोला—मुने ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि चिरकालके पश्चात् आज आपने हमलोगोंपर महान् अनुग्रह किया है; क्योंकि आपके दर्शनामृतके सिञ्चनसे सिक्त होकर आज हमलोग पुण्यवृक्ष-सरीखे परम पवित्र हो गये। मुनिवर ! आप तो माननीयोंके भी मान्य हैं। इस समय जो आपने मुझे दर्शन दिया है, इसमें चिरकालसे सञ्चित मेरी पुण्यराशिकी प्रेरणा ही कारण जान पड़ती है। अच्छा, अब यह बताइये कि कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है तथा किसलिये आज आपने यहाँ पधारनेका कष्ट उठाया है। हमलोग सदा आपके आदेशपूर्ण वचन सुननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं, अतः आप हमें आज्ञा देनेकी कृपा कीजिये। मुनिराज ! आपके चरणोंके दर्शनसे ही मुझे सारी बातें ज्ञात हो गयी हैं। आपने अपने शुभागमनके पुण्यसे

३७८ * अविच्छिन्नचिन्मात्रैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हमलोगोंको संयुक्त कर दिया । ( बात यह है कि इन्द्रसभामें चिरजीवियोंके विषयमें चर्चा हो रही थी, उसी प्रसङ्गमें आपको हमारा स्मरण हो आया । इसी कारण आपने अपने चरणोंसे इस स्थानको तथा मुझे भी पवित्र बनाया है । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार यद्यपि आपके आगमनका प्रयोजन मुझे ज्ञात हो गया है, फिर भी जो मैं आपसे पूछ रहा हूँ, इसका कारण यह है कि आपके वचनामृतके रसास्वादकी वाञ्छा उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है। श्रीराम ! तीनो कालोंका निर्मल ज्ञान रखनेवाले उस चिरजीवी पक्षी भुशुण्डने जब इस प्रकार पूछा, तब मैंने उसे यों उत्तर दिया ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—पक्षियोंके सरदार ! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह बिल्कुल सत्य है । आज मैं तुम चिरजीवीको देखनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। सौभाग्य-की बात है कि तुम्हारा अन्तःकरण पूर्णतया शान्त है, तुम सकुशल हो और परमात्मज्ञान-सम्पन्न होनेके कारण इस भीषण जगज्जालमें भी नहीं फँसे हो । परंतु ऐश्वर्यशाली वायसराज ! मेरे मनमें एक संदेह है, उसे तुम अपने यथार्थ वचनोंद्वारा दूर करो । (वह संशय यह है कि) तुम किस कुलमें उत्पन्न हुए हो ? किस प्रकार तुम्हें ज्ञेय-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हुआ ? तुम्हारी आयु कितनी है ? तुम्हें अपना कौन-सा वृत्तान्त अर्थात् किस कल्पका चरित्र याद है ? किस महानुभावने तुम-जैसे दीर्घदर्शीके लिये यह निवासस्थान निश्चित किया है ?

श्रीराम ! वह भुशुण्ड न तो अभीष्ट-लाभसे प्रसन्न ही होता था, न तो उसकी बुद्धि ही क्रूर थी । उसके सभी अङ्ग सुन्दर थे तथा शरीरका वर्ण वर्षाकालीन मेघके सदृश श्याम था । उसके वचन स्नेहपूर्ण और गम्भीर होते थे । वह मुस्कुराकर ही बोलता था । तीनों लोकों-की इयत्ता उसके लिये हस्तामलकवत् थी । वह सम्पूर्ण भोगोंको तृण-सरीखे तुच्छ समझता था । वह परावर ब्रह्मका ज्ञाता था । उसकी बुद्धि पूर्णतया शान्त थी तथा वह शान्त और परमानन्दसे परिपूर्ण था । उसके वाक्य प्रिय और मधुर, अतएव सुनने योग्य तथा वीणाके गानकी भाँति मनोहर थे । उसका शरीर तो ऐसा लगता था मानो सम्पूर्ण भयोंका अपहरण करनेवाले स्वयं ब्रह्मने ही नवीन भुशुण्ड-शरीर धारण किया हो । वह स्वाभाविक प्रसन्नतासे युक्त था तथा प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये उत्सुक होनेके कारण उसके मुखकी अद्भुत शोभा हो रही थी । इस प्रकार उस वायसराज भुशुण्डने शुद्ध, अमृतमय तथा क्रमबद्ध रूपसे निर्मल वाणीद्वारा अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मुझसे कहना आरम्भ किया ।

(सर्ग १४-१७)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डके द्वारा अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन * ३७९


भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन करते हुए अपनी उत्पत्ति, ज्ञान-प्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना

भुशुण्ड बोला—मुनिवर वसिष्ठजी ! इस जगत्‌में देवाधिदेव महादेव समस्त स्वर्गवासी देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्मादि देवता भी उनकी अभिवन्दना करते हैं। उनके शरीरके वामार्धमें सौन्दर्यशालिनी भगवती पार्वती विराजमान रहती हैं। उन महादेवजीके मस्तकपर गङ्गारूपी पुष्पमाला सुशोभित है, जो हिमके हारकी भाँति धवल तथा लहरीरूपी पुष्प-गुच्छोंसे गुँथी हुई है। उस मालाने ही उनके जटा-जूटको आवेष्टित कर रखा है। क्षीरसागरसे जिसकी उत्पत्ति हुई है तथा जिससे अमृतके झरने झरते रहते हैं, वह शोभाशाली चन्द्रमा उनके ललाटमें स्थित है। उस चन्द्रमाके अनवरत अमृत-प्रवाहसे अभिषिक्त होनेके कारण जिसकी विषैली शक्ति शान्त होकर अमृत-स्वरूपिणी हो गयी है तथा जिसका वर्ण इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है, वह कालकूट विष उनके कण्ठमें आभूषणके समान सुशोभित है। निर्मल अग्निसे जिसकी उत्पत्ति हुई है, वह अत्यन्त शुभ्र भस्म उन महादेवजीका भूषण है। आकाश ही उनका वस्त्र है, जो चन्द्रमाकी सुधाधारासे प्रक्षालित, नील मेघके समान सुशोभित और तारारूपी बिन्दुओंसे समन्वित है। हिलनेके कारण जिनके मस्तककी मणियाँ चमक रही हैं तथा जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है, ऐसे चिकने अङ्गवाले सर्प ही उनके हाथके कङ्कण हैं। उनका मुख तीन नेत्रोंसे देदीप्यमान है। जैसे प्रमथगण उनके परिवाररूप हैं, उसी प्रकार निर्मल कान्तिवाली मातृकाएँ भी उनके परिवारमें ही हैं। ये मातृकाएँ पर्वतशिखरोंपर, आकाशमें, विभिन्न लोकोंमें, गड्डोंमें, श्मशानोंमें तथा प्राणियोंके शरीरोंमें निवास करती हैं। उन सभी मातृकाओंमें जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, सिद्धा, रक्ता, अलम्बुषा और उत्पला—ये आठ मातृदेवियाँ प्रधान हैं। शेष माताएँ इन्हीं आठोंका अनुगमन करती हैं।

दूसरोंको मान देनेवाले मुनीश्वर ! उन महामहिमा-शालिनी मातृकाओंमें माता अलम्बुषा अत्यन्त निष्णात हैं। उनका वाहन कौआ है। उस कौएका नाम चण्ड है। वह इन्द्रनील-पर्वतके समान नीला है तथा उसके ठोरकी हड्डी वज्रके समान कठोर है। एक समयकी बात है, भयंकर चेष्टावाली तथा अष्ट सिद्धियोंसे सम्पन्न वे सभी मातृकाएँ किसी कारणवश आकाशमें इकट्ठी हुईं। वहाँ उन सबका एक महोत्सव हुआ, जो नाच-गान आदिसे अत्यन्त मनोहर था। उस उत्सवमें ब्राह्मी देवीके रथमें जुतनेवाली उनकी ज्ञानी हंसियों और अलम्बुषा देवीका वाहन चण्डनामक काक—ये सभी