संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध
श्रीवसिष्ठजीके कहनेपर श्रोताओंका सभासे उठकर दैनिक क्रिया करना तथा सुने गये विषयोंका चिन्तन करना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं*—भरद्वाज ! उपशम-प्रकरणके अनन्तर अब इस निर्वाण-प्रकरणका श्रवण करो। उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह मोक्षरूप फल देता है। जिस समय महाराज वसिष्ठजी उस प्रकारके गम्भीर अर्थके प्रतिपादक वचन कह रहे थे, उनके श्रवणके ही आनन्दमें निमग्न श्रीराम मौन होकर स्थित थे; महामुनि वसिष्ठजीकी वाणी और उसके द्वारा प्रतिपादित अर्थोंको मनमें धारणकर राजालोग, जो बाह्य विषयोंके विज्ञान एवं शारीरिक चेष्टासे रहित थे, निश्चेष्ट होकर चित्रलिखित मूर्तिकी तरह अचल स्थित थे। एवं महामुनि वसिष्ठजी-द्वारा उपदिष्ट वाक्योंका बड़े आदरके साथ श्रोता मुनिगण विचार कर रहे थे, उस समय दिनके चतुर्थ भागमें भेरी और शङ्खकी ध्वनि हुई। उक्त ध्वनिसे मुनि वसिष्ठजीका उन्नत स्वर भी उसी प्रकार दब गया, जिस प्रकार मेघोंके नादसे मयूरोंका शब्द। धीरे-धीरे उस शङ्ख-ध्वनिके शान्त होनेपर मुनिश्रेष्ठ महाराज श्रीवसिष्ठजी सभामें श्रीरामचन्द्रजीसे यों मधुर वचन कहने लगे—'श्रीराम ! मेरी इस वाणीके अर्थको तुमने क्या उसी तरह ग्रहण किया, जिस तरह हंस जलका त्यागकर दूधको ग्रहण करता है ? तुमको इसे अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह बार-बार विचारकर उसीके अनुसार चलना चाहिये। समस्त शास्त्रोंके सिद्धान्तको समझकर तुम उदार चित्त-से मेरे द्वारा कथित प्रयोजनकी सिद्धिके लिये असङ्ग होकर समयानुसार प्राप्त व्यवहारका परिपालन करो।'
'सभासद्गण ! महाराज दशरथ ! श्रीराम ! लक्ष्मण ! तथा अन्यान्य नृपवर्ग ! आप सभी आज अपने-अपने नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करें; क्योंकि आजका दिन प्रायः समाप्त होने जा रहा है। अब जो विचार करना शेष है, उसका जब आपलोग प्रातःकाल सभामें आयेंगे, तब हमलोग विचार करेंगे।'
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! मुनिवर वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर वह सभा उठ खड़ी हुई। समस्त सभाका वदन कमलकी तरह था, अतएव वह विकासयुक्त कमलिनीके सदृश भली मालूम पड़ती थी। उस समय अन्यान्य राजाओने महाराज दशरथकी स्तुति की, श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार किया तथा महर्षि वसिष्ठजीकी विशेषरूपसे स्तुति की। तदनन्तर वे अपने-अपने आश्रममें चले गये। आकाशचारी देवताओंकी वन्दना करके महाराज वसिष्ठजी महर्षि विश्वामित्रके साथ आश्रममें जानेके लिये आसनसे उठे। दशरथ आदि राजा तथा मुनिश्रेष्ठ अपने अनुरूप उपदेष्टा मुनिवर वसिष्ठजीके पीछे-पीछे आश्रमपर्यन्त जाकर उनकी आज्ञा लेकर
* वैराग्य और मुमुक्षु-व्यवहार नामक प्रकरणोंके बाद जो उत्पत्ति, स्थिति और उपशम नामक तीन प्रकरण कहे गये हैं, उनमें यह बताया गया कि उत्पत्ति, स्थिति और लयके बोधक तथा 'नेति-नेति' इत्यादि रूपसे प्रपञ्चके निषेधक जो वेदान्त-वाक्य हैं, वे अध्यारोपापवाद-न्यायसे परमात्मतत्त्वका ही प्रतिपादन करनेवाले हैं। अतः वासनाक्षय और मनोनाशपूर्वक परमात्म-ज्ञानके द्वारा परमपुरुषार्थकी प्राप्ति करानेमें ही उनका तात्पर्य है। अब 'यत्र नान्यत् पश्यति' (छान्दोग्य० ७। २४। १)—'जहाँ परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुको नहीं देखता', 'यतो वाचो निवर्तन्ते' (तैत्तिरीय० २।४।१)—'जहाँसे वाणी उसे न पाकर लौट आती है', 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कदाचन' (तैत्तिरीय० २।४।१)—'ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला कभी भयभीत नहीं होता।' 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वम्' (बृहदा० २।५।१९)—'वह यह ब्रह्म अपूर्व है' इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध तथा पहले बताये गये सम्पन्न साधनोंसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके फलरूप मोक्षके स्वरूपका बोध करानेके लिये महर्षि वाल्मीकि निर्वाण-नामक प्रकरणका आरम्भ करते हैं।