भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीको सभामें लाना *


कोई आकाशकी ओर, कोई अरण्यकी ओर, कोई राज-मन्दिरकी ओर कमलसे उत्थित भ्रमरोंकी तरह चले गये । श्रीराम, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नने गुरुवर वसिष्ठजीके आश्रममें उनके साथ जाकर उनके चरणोंकी भक्तिपूर्वक पूजा की और फिर दशरथजीके भवनकी ओर चले गये । अपने-अपने स्थानमें आकर उन सब श्रोताओंने स्नान किया, देवता और पितरोंकी पूजा की तथा ब्राह्मणों और अतिथियोंका स्वागत-सत्कार किया । इन क्रियाओंसे निवृत्त होकर उन श्रोताओंने ब्राह्मण आदिसे लेकर नौकर-पर्यन्त अपने-अपने परिवारके साथ वर्ण-धर्मके क्रमानुसार भोज्यपदार्थोंका भोजन किया । दैनिक क्रियाओंके साथ सूर्यभगवान्‌के अस्ताचलकी ओर प्रस्थान करनेपर तथा रात्रि-कृत्योंके साथ निशाकरके उदित होनेपर आस्तरणोंसे युक्त शय्याओंपर तथा आसनोंपर भूमिपर विहार करनेवाले मुनि, राजा, राज-महर्षिलोग अत्यन्त आदरपूर्वक महर्षि वसिष्ठके कमलसे निर्गत संसार-तरणके उपायका एकाग्र यथावत् विचार करने लगे । तदनन्तर प्रहर-श्रोतागण सुन्दर स्वप्नसे युक्त निद्राको प्राप्त हुए लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न—इन तीनों भ्राताओंने तीन महर्षिके उपदेशका निरन्तर विचार किया । केवल आधे प्रहर ( दो घड़ी ) तक ही नयनोंमें उत्तम स्वप्नसे युक्त तथा क्षणभरमें श्रमका निव देनेवाली निद्रा प्राप्त की । (


श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीको सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वार उपदेशका आरम्भ; चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—रात्रिके क्षीण होनेपर श्रीराम, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न अपने-अपने अनुचरोंके साथ उठकर स्नान, संध्या आदि कर्मोंका अनुष्ठान करके महामुनि श्रीवसिष्ठजीके आश्रमपर चले गये । वहाँ उन्होंने संध्या करके आश्रमसे बाहर निकलते हुए महर्षि वसिष्ठजीके चरणोंमें अर्घ्य प्रदानकर प्रणाम किया । क्षणभरमें महर्षि वसिष्ठजीका आश्रम मुनियों, ब्राह्मणों और राजाओंसे तथा हाथी, घोड़े, रथ आदि अन्यान्य वाहनोंसे इतना भर गया कि वहाँ तनिक भी अवकाश नहीं रहा । तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ महाराज वसिष्ठजी उस सेनाके साथ ही श्रीराम आदिसे अनुगत होकर यथासमय दशरथजीके घरपर जा पहुँचे । वहाँपर शीघ्रतापूर्वक मिलनेके उत्साहसे संध्या-वन्दनसे निवृत्त हुए महाराज दशरथने आदरपूर्वक दूर मार्गमें ही जाकर महर्षिका पूजन किया । वे सब श्रोतागण पुष्पों, मोतियों तथा मणियोंके समूहोंसे पहलेकी अपेक्षा पुनः अधिक सजायी गयी सभामें प्रविष्ट होकर अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये । इसके अनन्तर उसी सा दिनके जो आकाशचर, भूचर आदि श्रोता थे, वे-सब आ गये । एक दूसरेका अभिवाद सभा बैठ गयी । तदनन्तर वाक्यरचनामें पटु वसिष्ठजी पूर्व प्रकरणके अनुसार ही वाक्यार्थके श्रीरघुनन्दनको कहने लगे ।

महाराज वसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सुन्दर पद्धतिसे जो अत्यन्त गहन अर्थवाला तत्त्व का बोधक वाक्य कहा था, उसका क्या तुमने है ? अब मैं तुम्हारे समझनेके लिये यह शाश्वत सिद्धिदायक उपदेश करता हूँ, इसे श्रीराम ! परमात्मतत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे अज्ञा तथा वासनाका विनाश हो जानेपर शोकशून्य प्राप्त हो जाता है । देश, काल और वस्तुसे र अद्वितीय परब्रह्म परमात्मा ही है । उस द्वित्वरूप जगत् तो अज्ञानसे प्रतीत होता है ।