संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
परमात्माके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि जहाँ समस्त पदार्थोंसे रहित, परम शान्त, समानभावसे प्रकाशित एक सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है, वहाँ उस परमात्माके सिवा दूसरा पदार्थ कैसे रह सकता है। जो सम्पदाएँ हैं, जो दृश्य हैं, जो प्राणी हैं और जो उनकी इच्छाएँ हैं—इन सबके रूपमें आदि और अन्तसे रहित एक विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही है, जैसे समुद्रकी तरङ्गें समुद्र ही हैं। पातालमें, भूमिमें, स्वर्गमें, तृण आदि जड पदार्थोंमें, प्राणी एवं आकाशमें—सर्वत्र वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है, दूसरा कुछ नहीं। जैसे समुद्रकी नाना तरङ्गें समुद्र ही हैं, वैसे ही उपेक्ष्य, हेय, उपादेय, बन्धु-बान्धव, सम्पदाएँ, देह—इन सभी रूपोंमें आदि और अन्तसे रहित परब्रह्म ही प्रकाशित है। जबतक अज्ञानकी कल्पना, ब्रह्मसे अतिरिक्त पदार्थकी भावना और जगज्जालमें आस्था रहती है, तभीतक चित्त आदिकी कल्पना रहती है। जबतक देहमें अहम्भावना रहती है, जबतक इस दृश्यमें आत्मरूपता रहती है, जबतक यह मेरा है—इस प्रकारकी आस्था रहती है, तभीतक चित्तरूप भ्रम रहता है।
जबतक पूर्णताका उदय नहीं होता और जबतक सज्जनोंके संसर्गसे अज्ञानका विनाश नहीं होता, तभीतक चित्त आदि पतनकी ओर जाते रहते हैं । जबतक सच्चिदानन्द परमात्माके यथार्थ अनुभवके प्रभावसे यह जगल्लक्षी वासना शिथिल नहीं हो जाती, तभीतक चित्त आदि प्रतीत होते हैं। जबतक अज्ञानरूप मूर्खता रहती है, जबतक विषयाभिलाषासे विवशता रहती है एवं जबतक मूर्खतावश मोहका समुद्र बना रहता है, तबतक चित्त आदिकी कल्पना रहती है। किंतु जिसका अन्तःकरण भोगोंमें आस्था नहीं रखता, जिसको सुशील निर्मल निर्वाण परमपद प्राप्त हो चुका है एवं जिसके आशापाशके जाल छिन्न-भिन्न हो गये हैं, उसका चित्तरूप भ्रम नष्ट हो जाता है। मिथ्या भ्रमको उत्पन्न करनेवाले अनात्मदर्शन-का विनाश तथा परमार्थभूत सच्चिदानन्द परमात्मज्ञानरूप उत्तम सूर्यका उदय होनेपर चित्त विनष्ट होकर उसी प्रकार पुनः दिखायी नहीं देता, जिस प्रकार अग्निमें सूखा पत्ता या घीकी बूँद गिरनेपर पुनः दिखायी नहीं देती। परमात्माके सगुण-निर्गुण स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए जो जीवन्मुक्त महात्मा हैं, उनका पवित्र अन्तःकरण ही 'सत्त्व' नामसे कहा गया है। जो समरूप परमात्मपदमें नित्य स्थित, चित्तरहित तत्त्वज्ञानी महात्मा हैं, वे सत्त्वगुणमें स्थितिसे उत्पन्न उपेक्षासे ही लीलामात्र व्यवहार करते हैं। परमात्मामें स्थित, संयतेन्द्रिय, परम शान्त महात्मा पुरुष उस ब्रह्मरूप ज्योतिका सदा ही साक्षात्कार करते रहते हैं; अतः उनमें द्वैतभाव, एकभाव और वासना नहीं हो सकती। 'मैं सर्वात्मक हूँ' इस प्रकारकी परिपूर्ण आत्मभावनासे समस्त त्रिजगत्-रूपी तृणका सच्चिदानन्दरूप अग्निमें हवन करनेवाले महामुनिके चित्त आदि भ्रम निवृत्त हो जाते हैं। विवेक-से विशुद्ध हुआ चित्त सत्त्व कहा जाता है। वह फिर मोहरूपी फल उसी प्रकार उत्पन्न नहीं करता, जिस प्रकार दग्ध हुआ बीज नहीं उगता। मूढ मनुष्योंके भीतर पुनर्जन्मका विधायक वासनायुक्त चित्त होता है; किंतु तत्त्वज्ञान हो जानेपर वही वासनारहित सत्त्वरूप होकर पुनर्जन्मका बाधक हो जाता है। श्रीराम ! तुम प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर चुके हो। तुम्हें कुछ भी प्राप्त करना नहीं है, तुम्हारा चित्त शुद्ध है और ज्ञानरूप अग्निसे दग्ध हो चुका है; अतः वह भावी जन्मका कारण नहीं हो सकता अर्थात् तुम जन्म-मरणसे रहित हो। तुम वास्तवमें अवयव और सीमासे रहित, चेतनस्वरूप ही हो; अतः तुम अपने स्वरूप-का स्मरण करो, उसे कभी भूलो मत। तुम वही परिपूर्ण, परम शान्त, सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा हो। श्रीराम ! सारा चराचर चेतन-समूह तुम्हारे अंदर है और वास्तवमें वह नहीं है। तुम जो हो सो हो, तुम सत् भी हो, असत् भी हो। जो कुछ सत्-असत् प्रतीत होता