संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू०] * ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाका विनाश * ३६५
है, वह तुम्हारा संकल्प होनेसे तुम ही हो और तुम स्वयं प्रकाशरूप हो । वास्तवमें जड़-पदार्थविशेष तुम नहीं हो और न वह सब तुममें है । तुम्हारा संकल्प होनेसे वह तुम्हारा स्वरूप भी है और वस्तुसे असत् होनेके कारण वह नहीं है, तुम अपने सच्चिदानन्द-स्वरूपमें नित्य स्थित हो । तुम्हें नमस्कार है । तुम आदि और अन्तसे रहित, शिलाके समान चेतनघन हो—जिस प्रकार शिलामें पत्थरके सिवा कोई वस्तु नहीं उसी तरह तुममें एक चेतनके सिवा और कुछ नहीं है । तुम आकाशकी तरह निर्मल और स्वस्थ हो । तुम लीलासे ही सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें धारण किये हुए हो । ऐसे ब्रह्मस्वरूप तुम्हें नमस्कार है । (सर्ग २)
ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाके विनाशका तथा श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामकी महिमा एवं श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा अपने परमार्थ-स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप श्रीराम ! जिस प्रकार समुद्रमें उठनेवाली असंख्य तरङ्गोंका मूल कारण जल ही है, उसी प्रकार जो नाना प्रकारके असंख्य ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति और धारण करनेवाला चेतन है, वह तुम हो । समरूप, आकाशकी तरह सौम्य, बड़ी-बड़ी सृष्टिरूपी जल-तरङ्गोंसे घन प्रकाशमय परमात्म-चैतन्यरूप समुद्र तुम ही हो ।* जिस प्रकार अग्निसे उष्णत्व भिन्न नहीं है, कमलसे सौगन्ध्य भिन्न नहीं है, कज्जलसे कृष्ण रूप भिन्न नहीं है, बर्फ-से शुक्ल रूप भिन्न नहीं है, ईखसे माधुर्य भिन्न नहीं है, तेजसे प्रकाश भिन्न नहीं है, चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है, जलसे तरङ्ग भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ब्रह्मसे चराचर जगत् भिन्न नहीं है; क्योंकि ब्रह्म ही सबका कारण है । इसलिये चेतनसे उसका अनुभव भिन्न नहीं है । अनुभवसे 'अहम्' भिन्न नहीं है, 'अहम्'से जीव भिन्न नहीं है, जीवसे मन भिन्न नहीं है, मनसे इन्द्रिय भिन्न नहीं है, इन्द्रियोंसे देह भिन्न नहीं है, देहसे यह जड़ दृश्य जगत् भिन्न नहीं है, जगत्से भिन्न अन्य कोई पदार्थ नहीं है ।
* रमन्ते योगिनो यस्मिन् नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
'जिस नित्यानन्द चिदात्मामें योगीलोग निरन्तर रमण करते हैं, वह परब्रह्म 'राम' पदसे कहा जाता है'—ऐसी व्युत्पत्तिवाले 'राम' शब्दके वाच्य भी तुम ही हो ।
श्रीराम ! यह दृश्यमान जगतरूपी चक्र चिन्मय परमात्माने ही अनादि कालसे अपने संकल्पद्वारा प्रवृत्त किया है । वास्तवमें तो कुछ भी प्रवृत्त नहीं किया है । यथार्थमें तो यह सब कुछ विभागरहित अनन्त सच्चिदानन्दरूप आकाश ही अपने आपमें स्थित है । उसके सिवा दूसरा और कुछ भी नहीं है । ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों और मनके व्यापारोंको करता हुआ भी कुछ भी नहीं करता; क्योंकि उसमें कर्तृत्व है ही नहीं । श्रीराम ! तुम भीतरसे आकाशकी तरह निर्मल हो, बाहरसे अपने वर्णाश्रमानुकूल आचरण करते हो एवं हर्ष और ईर्ष्या आदि विकारोंमें काष्ठ और लोष्टके समान निर्विकार हो । जो तत्क्षण मारनेके लिये उद्यत अत्यन्त ही कठोर शत्रु है, उसे स्वाभाविक प्रियतम मित्रके रूपमें जो देखता है, वही यथार्थ देखनेवाला ज्ञानी महात्मा है । जिस प्रकार तटवर्ती वृक्षको नदी वेगसे मूलोच्छेदपूर्वक उखाड़कर फेंक देती है, उसी प्रकार जो महात्मा सौहार्द और ईर्ष्याको वेगसे समूल उखाड़ फेंक देता है, वही हर्ष और ईर्ष्यारूपी दोषोंका विनाश कर सकता है । जिस पुरुषके अन्तःकरणमें 'मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है ।