संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीराम ! जिसका त्रिकालमें अस्तित्व नहीं है, उसकी व्यावहारिक सत्ताका ज्ञान करानेके लिये 'माया' शब्दका प्रयोग किया गया है। वह माया उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे निस्संदेह विनष्ट हो जाती है।
निष्पाप श्रीराम ! मन, बुद्धि, अहंकार तथा इन्द्रिय आदि सब कुछ जड़तारहित एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। फिर जीवात्मा उस परमात्मासे अलग कैसे रह सकता है, अर्थात् वह भी परमात्माका स्वरूप ही है। जब भोग-तृष्णारूपी विषका आवेश विनष्ट हो जाता है—संसारके विषयभोगोंसे तीव्र वैराग्य हो जाता है, तब अज्ञान उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे गत रात्रिके अन्धकारके नष्ट हो जानेपर रतौंधी भाग जाती है, भली प्रकारसे आलोचित अध्यात्मशास्त्ररूपी विचारसे तृष्णाविषरूपी महामारी क्षीण हो जाती है। जैसे विस्तृत आकाशमें अव्यक्त वायु स्थिर है, वैसे ही मायाभावसे रहित हुए तुम उस अत्यन्त विस्तृत परम पदरूप अपने ब्रह्मस्वरूपमें स्थिर हो। श्रीराम ! जब साधारण मनुष्योंको भी अपने कुलगुरुके वचन लग जाते हैं, तब फिर तुम उदार (विशाल)-बुद्धिको मेरा उपदेश क्यों नहीं लगेगा? क्योंकि तुमने अपनी बुद्धिसे मेरे वचनोंको ग्रहण करने योग्य समझ लिया है, अतएव मेरे वचन तुम्हारे हृदयके अंदर प्रविष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ महानुभाव श्रीराम ! मैं रघुकुलको उन्नत करनेवाले तुमलोगोंका सदासे कुलगुरु हूँ, इसलिये तुम मेरे द्वारा कहे गये शुभ वचनोंको हृदयमें हारकी तरह धारण करो।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मैं केवल परम शान्तिका अनुभव कर रहा हूँ और परमानन्दमय स्वरूपमें सुखपूर्वक स्थित हूँ। मुने ! मुझे कुहरेसे शून्य दिङ्मण्डलकी भाँति भली प्रकार प्रसन्न यह समस्त जगत् वास्तविक सच्चिदानन्दस्वरूप दीख रहा है। भगवन् ! मैं संदेहसे, आशारूप मृगतृष्णासे, राग और वैराग्यसे रहित हूँ। नाथ ! मैं अपने आपसे ही अपने उस अविनाशी विज्ञानानन्दघन स्वरूपमें स्थित हूँ, जहाँपर अमृतका रसास्वाद भी तृणके सदृश नीरस होकर उपेक्षणीय हो जाता है। मैं अपने प्राकृत स्वरूपमें स्थित हूँ,—स्वस्थ हूँ, प्रसन्न हूँ। लोक जहाँ विश्राम करते हैं, उस सुखका केन्द्रस्वरूप मैं हूँ। अतएव मैं वास्तविक राम हूँ, मैं अपने परमार्थ स्वरूपको तथा आपको प्रणाम करता हूँ। शुद्ध आत्मामें अज्ञान आदि विकार कैसे आ सकते हैं। सदा शुद्ध आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है। सब कुछ आत्मा ही है। यह दूसरा है, यह दूसरा है—इत्यादि असत् कल्पनाएँ कैसे आ सकती हैं। (सर्ग ३–५)
देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धि और विषयोंमें सुख-बुद्धि करनेसे दुःखकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! तुम फिर भी मेरे परम रहस्यमय और प्रभावयुक्त वचन सुनो, जिन्हें मैं अतिशय प्रेम रखनेवाले तुम्हारे लिये हितकी इच्छासे कहता हूँ। श्रीराम ! जिस अज्ञानी पुरुषकी अज्ञानवश देहमें ही आत्मभावना उत्पन्न हो जाती है, उस पुरुषको इन्द्रियाँ रोषपूर्वक शत्रु बनकर पराजित कर देती हैं। किंतु जिस विवेकी पुरुषकी ज्ञानपूर्वक एकमात्र नित्य परमात्माके स्वरूपमें ही स्थिति रहती है, उस निर्दोष पुरुषकी इन्द्रियाँ संतोषपूर्वक मित्र बनकर रहती हैं, उसका पतन नहीं कर सकतीं।* व्यवहार करते हुए जिस ज्ञानी पुरुषको
* कठोपनिषद्में भी बताया गया है—
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥