संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धिका वर्णन * ३६७
निन्दनीय भोग्य पदार्थोंमें दोष-दर्शनके कारण निन्दाके सिवा स्तुतिबुद्धि उत्पन्न होती ही नहीं, वह पुरुष दुःखदायी देहमें किसलिये आत्मबुद्धि करेगा ? कभी नहीं करेगा। जैसे प्रकाश और अन्धकार एक दूसरेसे अत्यन्त भिन्न हैं, वैसे ही शरीर और आत्मा एक दूसरेसे अत्यन्त विलक्षण हैं; क्योंकि शरीर जड और मिथ्या है तथा आत्मा चेतन और सत्य है। इसीसे न आत्मा शरीरका सम्बन्धी है और न शरीर ही आत्माका सम्बन्धी, अर्थात् परस्पर विरुद्ध होनेके कारण इनका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। भगवन् ! समस्त भावविकारोंसे नित्यमुक्त एवं निर्लिप्त आत्मा न कभी उत्पन्न होता है और न कभी विनष्ट ही होता है, वरं वह सदा-सर्वदा एकरूपसे रहता है। पत्थरके समान जड, ज्ञानरहित, तुच्छ, कृतघ्न तथा विनाशशील इस शरीरका जो कुछ भी होनेवाला हो वह भले ही हो, इससे आत्माकी न तो हानि है और न इससे उसका कोई सम्बन्ध ही है।
विभिन्न दृष्टियोंसे देखनेपर भी सद्रूप ब्रह्म कभी असद्रूप नहीं हो सकता, इसी प्रकार सर्वव्यापक जीवात्माका शरीरके साथ तनिक भी सम्बन्ध सम्भव नहीं। जैसे जलमें स्थित कमलपत्रका जलसे किंचिन्मात्र सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देहमें स्थित जीवात्माका भी देहसत्ताके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। परमात्माका अच्छी प्रकार साक्षात्कार हो जानेपर परमार्थ सत्यरूप परमात्मामें ही स्थिति हो जाती है और देहात्मबुद्धिरूप अज्ञान-प्रयुक्त भ्रम नष्ट हो जाता है। देह और आत्माके यथार्थ ज्ञानसे देहकी असत्ता और आत्माकी सत्ता सिद्ध हो जाती है। सभी प्राणियोंमें अविनाशी चेतन रहता ही है, परंतु जीवात्माको इसका भली प्रकार ज्ञान न होनेके कारण उसमें कायरता आ गयी है। ऐसे अज्ञानी जीवोंके शरीरसे श्वास उसी प्रकार निकलते रहते हैं, जैसे लोहारकी धौंकनीसे हवा निकलती है; अतः उनका जीवन व्यर्थ है । अज्ञान ही आपत्तियोंका आश्रय-स्थान है। भला, बतलाइये तो सही कि कौन-सी आपत्तियाँ अज्ञानीको नहीं प्राप्त होतीं ? अज्ञानीको उग्र दुःख और सांसारिक क्षणिक सुख भी बार-बार आते और जाते रहते हैं। देह, धन, स्त्री आदिमें आसक्ति रखनेवाले अज्ञानीका यह दुष्ट दुःख कभी भी शान्त नहीं होता। इस अनात्मभूत जड देहमें आत्मभाव करनेवाले अज्ञानी पुरुषकी असत्य बोधमयी माया क्या किसी प्रकार भी नष्ट हो सकती है ? अर्थात् बिना ज्ञानके किसी प्रकार नष्ट नहीं हो सकती। उस अज्ञानी पुरुषका ही जन्म पुनः-पुनः बालपन प्राप्त करता रहता है, बालपन बार-बार यौवन प्राप्त करता रहता है, यौवन बार-बार वार्धक्य प्राप्त करता रहता है और वार्धक्य बार-बार मरण प्राप्त करता रहता है। अज्ञानी पुरुष ही इस जगतरूपी जीर्ण घटीयन्त्र (रहँट) में संसाररूपी रज्जुसे बँधा हुआ कलश-रूप होकर जलमें डूबता और निकलता रहता है। अर्थात् यह अज्ञानी जीव संसारमें बार-बार जन्मता-मरता रहता है। जिस प्रकार पक्षिणियाँ पिंजरेसे बाहर निकल नहीं पातीं, वैसे ही उदरभरणमें अति आसक्तिरूपी बन्धनसे बँधे ज्ञानदृष्टिसे हीन अज्ञानी पुरुषकी बुद्धियाँ अपारसंसार-समुद्रके पार नहीं जा सकतीं । श्रीराम ! विषयोंकी जो केवल ऊपर-ऊपरसे दिखायी पड़नेवाली मधुरता, परिणाममें अनर्यरूपता, आद्यन्तवत्ता, देशतः परिच्छिन्नता और समस्त अवस्थाओंमें नश्वरता प्रसिद्ध है, वे सब अज्ञानरूपी वृक्षके ही फल हैं।
(सर्ग ६)
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥
(कठ० १।३।५, ६)
'जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और अवशीभूत चञ्चल मनसे युक्त रहता है, उसकी इन्द्रियाँ असावधान सारथिके दुष्ट घोड़ोंकी भाँति वशमें नहीं रहतीं। परंतु जो सदा विवेकयुक्त बुद्धिवाला और वशमें किये हुए मनसे सम्पन्न रहता है, उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथिके अच्छे घोड़ोंकी भाँति वशमें रहती हैं।'