भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


अज्ञानकी महिमा और विभूतियोंका सविस्तर वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मदरूपी चन्द्रके उदित होनेपर मोतियोंसे वेष्टित तथा रत्नोंसे सुशोभित स्त्रियों क्षुब्ध काम-क्षीरसागरकी तरङ्गके समान जो दिखायी पडती हैं, वह केवल अज्ञानकी ही विभूति है। वसन्तऋतुमें भूमिपर वनखण्डोंमें पुष्प कामके दास कामियोंको जो रमणीय दिखायी पड़ते हैं, उसमें भी अज्ञान ही कारण है। गीध, गीदड़, कुत्ते आदिके खाने योग्य मांस-पिण्डरूप स्त्रियोंके शरीरोंकी जो चन्द्रमा, चन्दन और कमलसे उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। लारसे आर्द्र ओष्ठनामक मांसके टुकड़ेकी जो रसायन, अमृत, मधु आदिके साथ उपमा दी जाती है, वह भी अज्ञान ही है। आरम्भमें अज्ञानी लोगोंको अत्यन्त मधुर लगनेवाली, मध्यमें राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे बाँधनेवाली एवं अन्तमें शीघ्र नष्ट हो जानेवाली धनराशिकी जो अभिलाषा की जाती है, वह भी अज्ञान ही है। जिसने अनन्त ब्रह्माण्डरूपी पके हुए फलोंको ग्रास बना लिया है और जो सदा खानेकी चेष्टा करनेवाली जठराग्निसे युक्त है, वह काल कल्पोंतक जो तृप्त नहीं होता, उसमें भी अज्ञानकी ही महिमा है। जीवोंकी जो यौवन-रात्रि चिन्तारूपी पिशाचोंसे उपहत तथा विवेकरूपी चन्द्रमाके उदयसे शून्य, अतएव अन्धकारकी तरह प्रकाशरहित बीत जाती है, वह अज्ञानका ही विलास है। आरम्भकालमें कानोंके संनिहित कपोल-प्रदेशको आक्रान्त कर चारो ओरसे निश्चयपूर्वक स्फुरणशील जरारूपी बूढ़ी बिल्ली, जो यौवनरूपी चूहोंका भक्षण करती रहती है, वह भी अज्ञानकी ही महिमा है। प्रतीतिरूपी पुष्पोंसे उज्ज्वल व्यावहारिक सत्तारूपी लता, जिसमें जगत्रूपी पल्लव हैं और जो धर्म-अर्थरूपी फल धारण करती है एवं विकसित होती है, इसका कारण भी माया ही है। जिसमें बड़े-बड़े पर्वत ही खंभे हैं, सूर्य-चन्द्र ही खिड़कियाँ हैं, आकाश ही आच्छादन (छत) है, ऐसा जगत्-त्रयरूपी महल जो खड़ा हो जाता है, वह भी मायाकी ही महिमा है। अपनी वासनारूपिणी शलाकाओंसे निर्मित शरीरके भीतर स्थित इन्द्रिय-समूहरूप पिंजरेमें जो जगत्के अन्तर्गत जीवरूपी पक्षी आशारूपी सूतसे बँधा हुआ है, उसमें भी उसका अज्ञान ही कारण है।

संसाररूपी स्वल्प जलाशयमें स्फुरित होनेवाली सृष्टिरूपी क्षुद्र मछलीको शठ कृतान्तरूपी वृद्ध गीध जो पकड़ लेता है, उसमें भी मायाकी ही महिमा है। परमपदरूप अचल ब्रह्ममें संकल्पसे उत्पन्न असंख्य जगत्रूप जंगलोंके जाल युगान्तरूपी अग्निसे जो दग्ध हो जाते हैं, उसमें भी अविद्या ही कारण है। निरन्तर उत्पत्ति और विनाशसे तथा दुःख और सुखकी सैकड़ों दशाओंसे, इस प्रकार जगत्स्थिति जो पुनः-पुनः बदलती रहती है, उसमें भी अविद्या ही कारण है। वासनारूपी जंजीरोंसे बँधी हुई अज्ञानियोंकी दृढ़ धारणा क्षुभित युगोंके आवागमन तथा कठोर वज्रोंके आघातोंसे भी जो विदीर्ण नहीं होती, इसमें उनकी अविद्या ही कारण है। राग-द्वेषसे होनेवाले उत्पत्ति-विनाशसे तथा जरा-मरणरूपी रोगसे समस्त जंगम जाति जीर्ण-शीर्ण हो गयी है, इसमें उनका अज्ञान ही कारण है। कभी लक्ष्यमें न आनेवाले बिलमें रहनेके कारण अदृश्य और अपरिमिति भोजन करनेवाला कालरूपी सर्प निर्भय होकर इस समस्त जगत्‌को जो क्षणभरमें ही निगल जाता है, यह सब मायाकी ही महिमा है। प्रत्येक कल्परूप क्षणमें क्षीण हो जानेवाले ब्रह्माण्डरूप प्रस्फुट बुद्बुद, जो भयंकर कालरूपी महासमुद्रमें उत्पन्न और विनष्ट हो जाते हैं, यह भी मायाकी महिमा है। उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जानेवाली प्रतप्त सृष्टिरूपी ये बिजलियाँ, जिन्हें चिन्मय परमात्माके सकाशसे प्रकाश-शक्ति प्राप्त हुई है, जो प्रकट होती हैं, वह भी मायाकी महिमा है। अनन्त संकल्पोंवाली समस्त विकल्पोंसे शून्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्मरूप पदमें