संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * विचारकी प्रौढ़ता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति * ३६१
महात्मा पुरुष आसक्तिरहित मनसे कर्म करता हुआ भी उससे 'उत्पन्न सुख-दुःखरूप फलसे लिप्त नहीं होता तथा आसक्तिरहित मनवाला महात्मा पुरुष चक्षुसे विषयोंको देखता हुआ भी, उसका चित्त अन्यत्र—परमात्मामें स्थित होनेके कारण, कुछ नहीं देखता। जिसका चित्त दूसरी जगह तत्परतासे लगा रहता है, वह विषयको नहीं देखता—यह बात बालक भी जानता है। इसलिये आसक्तिरहित मनवाला ज्ञानी महात्मा पुरुष सुनता हुआ भी नहीं सुनता, स्पर्श करता हुआ भी स्पर्श नहीं करता, सूंघता हुआ भी नहीं सूंघता, नेत्रोंको खोलता और बंद करता हुआ भी न उन्हें खोलता और न बंद ही करता है। श्रीराम ! आसक्ति ही संसारका कारण है, आसक्ति ही समस्त पदार्थोंका हेतु है, आसक्ति हीं वासनाओंकी जड़ है और आसक्ति ही समस्त विपत्तियोंका मूल है। अतः आसक्तिके त्यागको ही मोक्ष समझा गया है और आसक्तिके त्यागसे ही मनुष्य जन्म-मरणसे छूट जाता है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—अखिल संशयरूपी कुहरेका नाश करनेवाले शरत्कालके वायुरूप महामुने ! सङ्ग (आसक्ति) किसे कहते हैं—प्रभो ! यह मुझसे कहिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंकी उत्पत्ति और विनाशमें जो हर्ष और विषादरूप विकार उत्पन्न करनेवाली मलिन वासना है, वही सङ्ग (आसक्ति) है—ऐसा ज्ञानीजन कहते हैं। जीवन्मुक्त स्वरूपवाले तत्त्ववेत्ताओंके पुनर्जन्मका नाश करनेवाली, हर्ष एवं विषाद दोनोंसे रहित, शुद्ध वासना—आसक्तिरहित चित्तवृत्ति होती है। वह भूने हुए बीजके समान आकृतिमात्र है। उस शुद्ध वासनाका दूसरा नाम असङ्ग (आसक्तिका अभाव) जानो। वह तबतक रहती है, जबतक प्रारब्ध भोगोंका संस्काररूप देह रहता है। उस शुद्ध वासनासे जो कुछ किया जाता है, वह पुनः संसारमें जन्म-मरणरूप बन्धनका कारण नहीं होता। जो जीवन्मुक्त नहीं हैं, जो दीन एवं मूढ़चित्त हैं, उनकी वासना हर्ष तथा विषादसे युक्त रहती है। वह वासना जन्म-मरणरूप बन्धन देनेवाली होती है। इसी बन्धनकारक वासनाका दूसरा नाम सङ्ग है। यह पुनर्जन्मका कारण है। इस वासनासे जो कुछ किया जाता है, वह केवल बन्धनका ही हेतु होता है। रघुनन्दन ! यदि तुम दुःखोंसे घबराते नहीं, सुखोंसे हर्षित नहीं होते और सम्पूर्ण आशाओंसे रहित हो तो तुम असङ्ग ही हो। समस्त व्यवहारोंमें एवं सुख-दुःखकी अवस्थाओंमें समचित्त रहते हुए ही यदि विचरण करते हो तो तुम असङ्ग ही हो। सांसारिक पदार्थोंको तुम अपनी आत्मा ही समझते हो और जिस समय न्याययुक्त जैसा व्यवहार प्राप्त होता है, उसीके अनुसार शास्त्रानुकूल आचरण करते हो तो तुम असङ्ग ही हो। जीवन्मुक्तोंके ज्ञानसे सम्पन्न, इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला, परमात्माके स्वरूपका मनन करनेवाला श्रेष्ठ मुनि मान, मद, मात्सर्य और चिन्ताज्वरसे रहित होकर स्थित रहता है। श्रीराम ! प्रचुरतर पदार्थोंके सदा रहते हुए भी सबमें समानभाव रखनेवाला तथा बाहर एवं भीतर इच्छा एवं याचना आदि रूप दीनतासे शून्य अन्त करणवाला यह महात्मा एकमात्र अपने वर्णाश्रमोचित स्वाभाविक क्रम-प्राप्त न्याययुक्त व्यापारसे पृथक् दूसरा कुछ भी व्यापार नहीं करता। वर्णाश्रमानुसार परम्परा-प्राप्त अपना जो कुछ भी कर्तव्य है, उसका वह ज्ञानी संसर्ग-सम्बन्ध अर्थात् आसक्ति, अहंता-ममतासे रहित बुद्धिसे खेदशून्य हो अनुष्ठान करता हुआ परमात्मस्वरूप अपने आत्मामें रमण करता है। जिस प्रकार मन्दराचल पर्वतसे मथे जानेपर भी क्षीरसमुद्र अपना स्वाभाविक शुक्लपन नहीं छोड़ता, उसी प्रकार आपत्ति अथवा उत्तम सम्पत्तिके प्राप्त होनेपर वह महामति तत्त्वज्ञ अपना सहज स्वभाव नहीं छोड़ता।
(सर्ग ९३)
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