भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * शरीरका कारण मन है तथा मनके कारण प्राण-स्पन्द और वासना :- ३५५

तत्काल बाह्य विषयोंकी ओर रागवश चला जाता है और उन विषयोंके भोगके अनुभवसे चित्तमें अनन्त दुःख उत्पन्न होते हैं। जब जीवात्मा बाह्य विषयोंसे उदासीन होकर परमात्माके ज्ञानके लिये प्रयत्नशील होता है, तब वह प्राप्त करने योग्य निर्मल परमपदरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है। श्रीराम ! जीवात्माके संकल्पको ही तुम चित्त जानो। उसी चित्तने इस अनर्थ-जालका विस्तार किया है।

योगीलोग चित्तकी शान्तिके लिये योगशास्त्रमें बतलाये गये प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यानरूप योगकी युक्तियोंके द्वारा प्राणका निरोध करते हैं। विद्वान्-लोग प्राण-निरोधको ही चित्तशान्तिरुप फलका दाता, उत्तम समताका हेतु और जीवात्माकी अपने वास्तविक स्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मामें सुन्दर स्थिति कहते हैं। महाबाहु श्रीराम ! तीव्र संवेगसे आत्माके द्वारा जिस पदार्थकी भावना की जाती है, तत्काल ही वह जीवात्मा अन्य स्मृतियोंको छोड़कर तद्रूप ही हो जाता है। वासनाके अत्यन्त वशीभूत और तद्रूप हुआ वह जीवात्मा जिस किसीको देख लेता है, उस सबको अज्ञानसे सत्-वस्तु मान लेता है और वासनाके वेगवश अपने स्वरूपको भूल जाता है। फिर वह वास्तविक आत्मज्ञानसे रहित जीवात्मा भीतरी वासनाओंके अभिभूत होकर, विषसे अभिभूत पुरुषकी तरह अनेक मानसिक आपत्तियोंसे व्याकुल रहता है। श्रीराम ! जिससे देहादि अनात्मामें आत्मभावनारूप और अवस्तु संसारमें वस्तुभावनारूप अयथार्थ ज्ञान होता है, उसको तुम चित्त जानो। दृढ़ अभ्यासके कारण देह आदि पदार्थोंमें 'अहम्' 'मम' आदि वासनासे ही जन्म, जरा और मरणका कारण अति चञ्चल चित्त उत्पन्न होता है। जब निरन्तर वासनाका अभाव होनेसे मन मनसे रहित हो जाता है, तब मनका अभाव हो जाता है, जो परम उपरतिस्वरूप है। जब जगद्रूप वस्तुमें किसी पदार्थकी भावना नहीं होती, तब शून्य

सं० यो० व० अं० १३—

हृदयाकाशमें चित्त कैसे उत्पन्न हो सकता है। श्रीराम ! मैं तो यही मानता हूँ कि आसक्तिसे विनाशशील जगत्-रूपी वस्तुमें वस्तुत्वकी भावना करनामात्र ही चित्तका स्वरूप है। बाह्य वस्तुओंके अस्मरणरूप साधनका अवलम्बन करनेसे जो समस्त दृश्य-जगत्के अभावकी भावना और परमार्थ वस्तु परमात्माका अनुभव होता है, यह अचित्त कहा जाता है। अत जिस महामति पुरुषको संस्कारसे उत्पन्न विषय-रसास्वादके स्मरणसे विषयोंमें आसक्ति उत्पन्न नहीं होती, उस पुरुषका चित्त अचित्त-रूपताको तथा विशुद्ध सत्त्वको प्राप्त कहा जाता है। जिस महापुरुषमें पुनर्जन्मकी कारणभूता अहंता-ममतारूप वासनाका अभाव हो गया है, वह चक्रके भ्रमण-सदृश जगत्के व्यवहारमें लगा हुआ भी जीवन्मुक्त और परमात्मा-में स्थित है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार कुम्भ-कारके व्यापारके अभावमें भी चक्रका भ्रमण तबतक होता रहता है, जबतक उसमें वेग रहता है, उसी प्रकार अविद्याके नाश होनेपर भी प्रारब्ध संस्कारके अवशिष्ट रहनेसे अहंकारके बिना ही जीवन्मुक्तका शरीर और उसका व्यवहार—दोनों प्रारब्ध-भोगपर्यन्त विद्यमान रहते हैं। जिनका चित्त भुने हुए बीजके सदृश पुनर्जन्म-से शून्य और विषयानुरक्तिसे रहित है, वे महानुभाव जीवन्मुक्त हुए स्थित रहते हैं। जिनका चित्त विशुद्ध सत्त्वरूपता प्राप्त कर चुका है, ऐसे ज्ञानके पारगत महात्मा चित्तसे रहित कहे जाते हैं। प्रारब्धका क्षय हो जानेपर वे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें विलीन हो जाते हैं।

वासनाका ऊर्ध्वगति स्वभाव होनेसे वह जीवात्माके क्षोभकारक कर्मसे प्राण-स्पन्दनका उद्बोधन करती है और उससे चित्त उत्पन्न होता है। एवं स्पन्दन-धर्मवाला होनेसे हृदयगत राग आदि गुणोंका स्पर्श करके प्राण जीवात्माका उद्बोधन करता है और क्रमसे चित्तरूपी बालक उत्पन्न होता है। श्रीराम ! वासना और प्राणस्पन्द—दोनों चित्तके कारण हैं। उनमेंसे किसी एकका लय

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