भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

* योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता * ७


चतुर्वेदोऽपि यो विप्रः सूक्ष्मं ब्रह्म न विन्दति ।
वेदभारभराक्रान्तः स वै ब्राह्मणगर्दभः ॥
वे पुनः इसी ग्रन्थके इसी अध्यायके ३१ वें श्लोकके भाष्यमें लिखते हैं—तथा चाह भगवान् वसिष्ठः —
यत्र सन्तं न चासन्तं नाश‍्रुतं न बहुश्रुतम् ।
न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित् स ब्राह्मणः ॥
यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये ग्रन्थ शंकराचार्यकृत नहीं हैं, क्योंकि 'शंकरदिग्विजयकार' ने भी लिखा है—
समत्सृजातीयमसत्सु दूरं ततो नृसिंहस्य च तापनीयम् ।
स्वामी भूमानन्दजीने Influence of the Yoga-vasistha on Shankaracharya नामकी पुस्तिकामें तुलनात्मक अध्ययनद्वारा यह भी दिखलाया है कि शंकराचार्यकी विवेकचूड़ामणि, सारतत्त्वोपदेश, लघुवाक्यवृत्ति, प्रबोधानुभूति, प्रबोधसुधाकर आदि वृत्तियोंपर योगवासिष्ठके किन-किन श्लोकोंकी छाप या प्रभाव है । उदाहरणार्थ—'प्राणस्पन्दविरोधाद् सत्सङ्गाद् वासनात्यागात् । हरिचरणभक्तियोगान्मनः स्ववेगं जहाति शनैः ॥' इस प्रबोधसुधाकर ( ७७ ) के श्लोक पर 'अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगम एव च । वासनासम्परित्यागः प्राणस्पन्दनिरोधनम् ॥ एतास्ता युक्तयः पुष्टाः सन्ति चित्तजये किल ।' योगवासिष्ठ ( ५ । ९२ । ३५ ) इस श्लोककी छाप है । इससे सिद्ध है कि योगवासिष्ठ शंकराचार्यके समय इस समयसे कही अधिक निर्भ्रान्त तथा समादरणीय ग्रन्थ था । यह स्मरर्णाई है कि शंकराचार्यका समय आजसे २३ सौ वर्ष पूर्व है । देखिये 'कल्याण' वर्ष ११, अङ्क ८, 'सिद्धान्त' ७ । २७ ।

श्रीरामका तिरस्कार नहीं

कुछ वैष्णवजनोंको यह आपत्ति है कि श्रीरामका इसमें शोकाकुल होना—शोकसे पीला पड़ना बतलाया गया है, परमात्मा शोकयुक्त या शिष्य नहीं बनता । इसके उत्तरमें नम्र निवेदन है कि श्रीरामका शोक जैसा वाल्मीकि आदि रामायणोंमें सीताहरण या लक्ष्मणमूर्च्छा आदिके बाद है, वैसी तो योगवासिष्ठमें कोई बात भी नहीं है । योगवासिष्ठमें राम संसारसे खिन्न होकर खाना-पीना छोड़ रहे हैं, एकान्तवास करते हैं । यह भोगोंसे वैराग्य उत्तम अधिकारीका लक्षण है । भोजन छोड़नेसे उनका पीला हो जाना स्वाभाविक है । बाल्यावस्थामें विद्याग्रहणार्थ उनके द्वारा भगवान् वसिष्ठका शिष्यत्व स्वीकार करना सभी रामायणोंमें वर्णित है, उसी बाल्यावस्थामें विश्वामित्रके यागसंरक्षणके पूर्व ही इनका योगवासिष्ठका ग्रहण, तदुचित अधिकारसम्पादन, सम्पूर्ण विश्वको एकदम चकित कर देनेवाले प्रश्न-भाषण योगवासिष्ठद्वारा मन्त्रविद्या रामके माहात्म्याधिक्यके प्रतिपादक तथा साधक ही हैं, बाधक नहीं ।

योगवासिष्ठमें श्रीरामका महाविष्णुत्व-निरूपण

योगवासिष्ठमें महर्षि वाल्मीकिने बार-बार श्रीरामको महाविष्णु बतलाया है । कुछ थोड़े प्रसङ्ग यहाँ उदाहरणस्वरूप उपस्थित किये जा रहे हैं—

चिदानन्दस्वरूपे हि रामे चैतन्यविग्रहे ।
( १ । १ । ५६ )
शापव्याजवशादेव राजवेशधरो हरिः ।
( १ । १ । ५५ )
वृन्दया शापितो विष्णुस्तेन मानुषतां गतः ।
( १ । १ । ६५ )
अहं वेद्मि महात्मानं रामं राजीवलोचनम् ।
वसिष्ठश्च महातेजा ये चान्ये दीर्घदर्शिनः ॥
( १ । ७ । २१ )

बालक रामके ज्ञानपूर्ण भाषण सुनकर सभी मुनि अनेकानेक लोकोंसे दौड़ पड़ते हैं और आश्चर्यचकित होकर कहने लग जाते हैं—

न रामेण समोऽस्तीह दृष्टो लोकेषु कश्चन ।
विवेकानुदारात्मा न भावी चेति नो मतिः ॥
( योग० १ । ३३ । ४५ )

अर्थात् तीनों लोकोंमें आजतक श्रीरामके समान ज्ञानी एवं उदार व्यक्ति न तो कोई हुआ और न भविष्यमें होनेवाला है ऐसी हमलोगोंकी बुद्धि कहती है,—हमारा निश्चय है ।

इतना ही नहीं, श्रीरामके अमृतमय प्रवचनको सुनकर घोड़े घास खाना छोड़ देते हैं, रानियाँ गवाक्षमे देखती हुई चित्रलिखित-सी खड़ी रह जाती हैं, देरतक लगातार पुष्पवृष्टि होती रहती है, सभी मन्त्री, सामन्त, नागरिक, राजकुमार एकटक देखते रह जाते हैं । पिंजरेके पक्षी, रानमहलके क्रीडामृग भी कान खड़े करके ध्यानसे सुनते रह जाते हैं । सिद्धमुनियोंकी परम्परा सभाभवनमें सुदूरसे दौड़ पड़ती है—

सामन्तैः राजपुत्रैश्च ग्राहगणैर्गृहवादिभिः ।
तथा भृत्यैरमात्यैश्च पञ्जरस्थैश्च पक्षिभिः ॥
क्रीडामृगैर्गतस्पन्दैस्तुरङ्गैस्त्यक्तचर्वणैः ।
कौसल्याप्रमुखैश्चैव निजवातायनस्थितैः ॥
संशान्तभूषणारावैरस्पन्दैर्वनितागणैः ।