संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८
* अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् *
सिद्धैर्नभश्चरैश्चैव तथा गन्धर्वकिन्नरैः।
रामस्य ता विचित्रार्था महोदारा गिरः श्रुताः ॥
( १ । ३० । ७–११ )
श्रीरामके शिष्यत्वका भी उत्तर है। योग्य अधिकारी श्रीरामसे दूसरा कौन मिलता ? अतः स्वयं प्रश्न करके वसिष्ठके हृदयमें प्रविष्ट होकर उन्होंने यह ज्ञान प्रकट किया। देखिये वासिष्ठमहारामायण-तात्पर्यटीकाका उपोद्घात, श्लोक ११—
आविश्यान्तर्वसिष्ठं बहिरपि कलयन् शिष्यभावं वितेने।
यः संवादेन शास्त्रामृतजलधिममुं रामचन्द्रं प्रपद्ये ॥
योगवासिष्ठके अन्तमें भी 'नारायण' कहकर श्रीरामको नमस्कार किया गया है।
योगवासिष्ठमें भक्ति
योगवासिष्ठमें भक्तिकी बात भी बहुत है । यों तो उपरिनिर्दिष्ट प्रकरण भी, जिसकी छाया सम्भवतः भागवतकारके वेणुगीतपर पड़ती है और जिसमें कहा गया है कि 'श्रीकृष्णके वेणुगीतको श्रवणकर बछड़े दूध पीना भूल जाते हैं, नदियोंका वेग भग्न हो जाता है, गौएँ कवल नहीं लेतीं, कम भक्ति-रससे ओतप्रोत नहीं है। तथापि इस तरहके अन्य भी कई प्रसङ्ग योगवासिष्ठमें हैं। उपशम-प्रकरणके ३३ वें अध्यायकी प्रह्लादकृत विष्णुस्तुति संस्कृतसाहित्यकी अद्भुत निधि है। वह सब स्तुतियोंको एक बार मात कर देती है। श्रीवसिष्ठकी भगवान् शङ्करसे मिलनेके वादकी प्रार्थना भी अत्यद्भुत भक्ति-रससे परिपूर्ण है। कई स्थानोंपर भगवत्स्मरणकी बडी महिमा है। ध्यानकी प्रशंसा तो सर्वत्र है ही।
भक्तशिरोमणि तुलसीदासजीको भी योगवासिष्ठ मान्य था। उनके उत्तरकाण्डके भुशुण्डिचरित्रपर भुशुण्डोपाख्यान (योग-वासिष्ठ-निर्वाणप्रकरण पूर्वार्द्ध १४ से २८ अध्याय) की छाया है। भुशुण्डके दीर्घजीवित्वका क्रम, कारणादि यहाँ बड़े विस्तारसे निरूपित है। विनयपत्रिकाके २०५ वें पदमें वे लिखते हैं—
जौ मन भज्यो चहै हरि सुरतरु ।
सम, संतोष, विचार, विमल अति सतसंगति, ये चारि दृढ़ करि धरू
इसपर योगवासिष्ठके 'शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधु-संगमः ।' ( २ । ११ । ६० ) 'तथा संतोषः साधुसङ्गमश्च विचारोऽथ शमस्तथा ।' ( २ । १६ । १८) आदि मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरणके १२ से १६ वें अध्यायतकतके उपदेशोका ही प्रभाव है। 'वेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥' आदिसे भी इसका समर्थन-सा होता है।
योगवासिष्ठ किसकी रचना ?
यों योगवासिष्ठको वाल्मीकिकी रचना बतलाया गया है । कई लोग इसमें 'उवाच' आदि अलङ्कारोंकी भरमार देखकर अन्यकी कृति समझते हैं । पर जो हो, यह तो उन्हे भी मानना पड़ेगा कि पदमाधुर्य, भावगाम्भीर्य, निरूपणशैली, तत्त्वप्रदर्शन, सूक्ष्मेक्षिका, प्रखरविचार, सर्वत्र नवीनता तथा अमृतोपम पवित्रतम साधु उपदेशोंकी शृङ्खला देखते हुए यह वाल्मीकि-रामायण या विश्वके किसी भी ग्रन्थसे निम्नकोटिका नहीं है। अतः इसका रचयिता जो भी हो, साक्षात् ईश्वर है या ईश्वरप्राप्त है। ग्रन्थ सर्वथा निर्दोष है। कई प्रकरण तो वाल्मीकिसे मिलते भी हैं। विश्वामित्र-दशरथ-संवादमें प्रायः वाल्मीकिके ही श्लोक हैं। जो अधिक हैं, वे रम्यतर हैं। 'उवाच' आदि लिखना—भिन्न शैली अपनाना भी एक लेखकद्वारा सम्भव है ही। अतः वाल्मीकिरचित मानना युक्तिसंगत ही है।
उपसंहार
ध्यानसे देखा जाय तो भागवत, वाल्मीकिरामायण तथा अन्य पुराणोंसे योगवासिष्ठका वर्णन अधिक ही मिलता है। वस्तुतः भाषा, छन्दरचना तथा विचार-प्रवणताकी दृष्टिसे योग-वासिष्ठ सर्वोत्तम ग्रन्थ प्रतीत होता है। इसलिये श्रेष्ठ साधक इसके कालनिर्णयके चक्करमें न पड़कर इससे वास्तविक लाभ उठानेके प्रयत्नमें लग जाते हैं। यही होना भी चाहिये। किंतु साधारण व्यक्ति इससे वञ्चित न रह जायँ तथा व्यापक भ्रान्त धारणा शान्त हो जाय, इसीलिये यह यत्किंचित् प्रयास किया गया है।
वस्तुतः योगवासिष्ठ भारतीय ज्ञानरविकों एक अनुपम रश्मि है। इसमें ससार, उसके तरनेके उपाय, दैव, पुरुषार्थ, तत्त्वज्ञान एव उसके साधनोंके प्रत्येक अङ्गपर इतना क्रम-क्रमसे विचार किया गया है कि देखते हुए आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। कल्याणकामी मनुष्योंको इससे अवश्य लाभ उठाना चाहिये यही प्रार्थना है।