संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *
Man it does not mean this or that but humanity.
ऐसा क्यों हो रहा है । इसका एकमात्र कारण यही है कि हमारे विश्वविद्यालयोंका आमूल-चूल परिवर्तन नहीं हो पाता । सभी सुधार-योजनाओंपर भी अमल नहीं किया जाता और न घर और बाहर बालकोंकी शिक्षा-दीक्षापर ही समुचित ध्यान दिया जाता है । ऐसी दशामें तथाकथित आर्य-व्यक्तित्व बालकोंमें कैसे उत्पन्न हो सकता है ? इसी सत्यपर प्रकारान्तरसे राष्ट्रपति डा० राजेन्द्रप्रसादजीके ये शब्द पूर्णतः चरितार्थ होते हैं—
हम अपने सामने कितने भी महान् व उच्च आदर्शोंको लेकर जिस-किसी तरहकी राज-व्यवस्था क्यों न स्थापित कर लें, हमारी आर्थिक व सामाजिक विचारधारा कितनी भी समान व उदार क्यों न हो, पर जबतक हमारी अगली पीढ़ीका शारीरिक एवं मानसिक सौष्ठव व गठन शिशु-जीवनमें ही ठीक न होगा, तबतक देशमें हम सुख व शान्ति स्थापित करनेमें सफल नहीं हो सकते ।
यहाँ योगवासिष्ठ-सम्मत यह बात भी विचारणीय है कि ज्ञान-विकास और आत्म-ज्ञानप्राप्ति न केवल शास्त्र और गुरु-वचन-साध्य ही है प्रत्युत स्वानुभवका भी विषय है—
शास्त्रार्थे बुध्यते नात्मा गुरुवचनतो न च ।
बुध्यते स्वयमेवैष स्वबोधवशतस्ततः ॥
\hfill (यो० वा०)
इस समय हम देखते हैं हमारे विद्यार्थी आत्मनिर्भर नहीं हो पाते । वे केवल पुस्तक-कीट और परप्रत्ययनेय मति ही बने रहते हैं । वे यह भी नहीं समझते कि पेड़ भीतरसे बढ़ता है, माली और उपकरण तो उसके निमित्तमात्र होते हैं । वे प्रायः इस वैदिक सत्यसे भी अनभिज्ञ-से ही रहते हैं—
‘आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत् ।’
एतद्विषयक योगवासिष्ठकी तो यह सम्मति है कि आत्म-शान्ति और विश्व-शान्ति आत्म-विकास और आत्म-ज्ञानसे ही प्राप्त होती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं । अतएव सर्वदुःखहर्त्ता आत्मावलोकनमें ही भूति-विभूतिके इच्छुक व्यक्ति लगा रहे—
करोतु भुवने राज्यं विशत्वम्भोदमम्बुवत् ।
आत्मलाभादृते जन्तुर्विश्रान्तिमधिगच्छति ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ५ । २४)
आत्मावलोकने यत्नः कर्त्तव्यो भूतिमिच्छता ।
सर्वदुःखशिरश्छेद आत्मालोकेन जायते ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ७५ । ४६)
योगवासिष्ठसम्मत आत्मावलोकनसे न केवल आत्म-शान्ति प्राप्त होती है अपितु योगवासिष्ठके बार-बारके पाठ और अवलोकनसे विश्वबन्धुता—प्राणस्पृहणीय नागरिकता भी प्राप्त होती है, जो आजकी अत्यधिक वाञ्छनीय वस्तु है—
एतच्छास्त्राभ्यासात् पौनःपुन्येन वीक्षणात् ।
परा नागरतोदेति महत्त्वगुणशालिनी ॥
\hfill (यो० वा० २ । १८ । ३६, ८)
योगवासिष्ठकारके मतसे योगवासिष्ठ-ग्रन्थावलोकनका एकान्त फल यह भी है—
बोधस्यापि परं बोधं बुद्धिरिति न संशयः ।
जीवन्मुक्तत्वमस्मिंस्तु श्रुतिः समनुभूयते¹ ॥
\hfill (यो० वा० ३ । ८ । १३ । १५)
भगवान् वसिष्ठकी जय
(लेखक—पं० श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी (डाँगीजी))
योगवासिष्ठके प्रवक्ता भगवान् वसिष्ठका परिचय कराना अत्यन्त कठिन है, फिर भी उनके पारमार्थिक स्वरूपका मनन करना हो तो उनका भगवान्के अवतारोंके साथ क्या सम्बन्ध है ? उसे स्मरण किया जाना अनिवार्य आवश्यक है ।
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् रामके गुरु, भगवान् परशुरामके पिता महर्षि जमदग्नि और भगवान् दत्तात्रेयके मौसा, परम सिद्ध भगवान् कपिल और परमहंस नवयोगेश्वर तथा जड़-भरतके पिता भगवान् ऋषभदेवके दादा, राजर्षि आग्नीध्रके बहनोई, भगवान् मनुके पुत्र, आद्य नरेन्द्र प्रियव्रतकी बहन देवी देवहूतिके जामाता भगवान् वसिष्ठकी सदा काल जय हो, विजय हो, जिन्होंने संसार-चक्रको छेदन करनेके लिये पुण्य-कर्मका चक्र बताया और पुण्यकर्मके चक्रको भंग करनेके लिये धर्मचक्र चलाया और फिर गुरुचक्रका प्रवर्त्तन करके सिद्धचक्रमें प्रवेश करा दिया—अजातवादके परम रहस्यमय सिद्धान्तके आद्य प्रणेता भगवान् वसिष्ठ ही हैं ।
इस अद्वैत, तुरीय और अज तत्त्वमे भी परं तुरीयातीत, द्वैताद्वैतातीत और अवाच्यपदगांभीर्य परमतत्त्वके प्रणेता भगवान् वसिष्ठ सर्वत्र सर्वथा, सर्वदा सम्पूर्ण आराध्य बनें ।
१. इस ग्रन्थके श्रवणसे परम ज्ञान प्राप्त होता है, फिर जीवन्मुक्तिका अनुभव होने लगता है ।