भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३८० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

आकाशप्रदेशमें एकत्र होकर नृत्य करने लगे। इस प्रकार साथ-साथ नाचनेके कारण वह वायस सात कुलहंसियोंका वल्लभ हो गया। फिर तो उसने क्रमशः प्रत्येक हंसीके साथ रमण किया, जिससे वे ब्राह्मी शक्तिके रथकी हंसियाँ गर्भवती हो गयीं। मुनीश्वर ! तब उन हंसियोंने ब्राह्मी-देवीसे अपना वृत्तान्त यथार्थ रूपसे कह सुनाया।

इसपर ब्राह्मीदेवीने कहा—पुत्रियो ! इस समय तुमलोग गर्भवती हो गयी हो, इसलिये मेरा रथ वहन करनेमें समर्थ नहीं हो; अतः अब तुमलोग स्वेच्छानुसार विचरण करो। इस प्रकार ब्राह्मीदेवी दयापरवश हो गर्भके कारण अलसाई हुई उन हंसियोंसे ऐसा कहकर सुखपूर्वक निर्विकल्प समाधिमें स्थित हो गयीं। तदनन्तर समय आनेपर उन हंसियोंने इक्कीस अंडे दिये। मुने ! इस प्रकार उन अंडोंसे ये हमलोग इक्कीस भाई चण्डके पुत्ररूपमें कौएकी योनिमें उत्पन्न हुए। धीरे-धीरे हम बड़े हुए। हमारे पर निकल आये और हम आकाशमें उड़ने योग्य भी हो गये। जब भगवती ब्राह्मी समाधिसे विरत हुईं, तब हमलोगोंने अपनी माता हंसियोंके साथ उन देवीकी चिरकालतक भलीभाँति आराधना की। तदनन्तर उपयुक्त समय आनेपर कृपापरवश हुई भगवती ब्राह्मीने हमलोगोंपर ऐसा अनुग्रह किया, जिसके फलस्वरूप हमलोग जीवन्मुक्त होकर स्थित हैं। जब- हमलोगोंका मन पूर्णतया शान्त हो गया, तब ऐसी धारणा हुई कि अब एकान्त प्रदेशमें चलकर ध्यान-समाधिमें स्थित रहना चाहिये। ऐसा निश्चय करके हमलोग अपने पिताजीके पास विन्ध्यप्रदेशमें गये। वहाँ पहुँचनेपर पिताजीने हमलोगोंका आलिङ्गन किया। तत्पश्चात् हमलोगोंने अलम्बुसा देवीका पूजन किया, जिससे उन देवीने हमलोगोंको कृपादृष्टिसे देखा। फिर तो हमलोग समाहित-चित्त होकर वहीं रहने लगे।

तब पिता चण्डने पूछा—पुत्रो ! क्या तुमलोग इस जगज्जालसे, जो अनन्त वासनारूपी तन्तुओंसे गुँथा हुआ है, मुक्त हो चुके हो ? यदि नहीं तो हम इन मृत्य-

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