संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपनी ज्ञानप्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना * ३८१
असल भगवती अलम्बुसासे प्रार्थना करें, जिससे तुमलोग ज्ञानमें पारंगत हो जाओगे।
कौओंने कहा—पिताजी ! ब्राह्मीदेवीकी कृपासे हमलोगोंको ज्ञेय तत्त्वका पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो चुका है; किंतु अब हमें एकान्तवासके लिये किसी उत्तम स्थानकी अभिलाषा है।
चण्डने कहा—पुत्रो ! मेरु नामक एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत है, जो रत्नसमूहोंका आधार और देवताओंका आश्रय-स्थान है। उसके पृष्ठभागमें एक महान् कल्पवृक्ष है, जो नाना प्रकारके प्राणियोंसे समावृत है। उसके दाहिने तनेपर एक शाखा है, जिसमें सुवर्ण-सदृश पीले रंगके चमकीले पल्लव लगे हैं और वह रत्न-तुल्य घने पुष्प-गुच्छोंसे तथा चन्द्रबिम्बकी तरह प्रकाशमान फलोंसे सुशोभित है। पुत्रो ! पूर्वकालमें मैंने उसी शाखापर चमकीली मणियोंसे युक्त घोंसला बनाया था और उसीमें क्रीडा की थी। उस घोंसलेके बाहरी दरवाजोंकी रचना चिन्तामणिकी शलाकाओंसे की गयी है। वह रत्न-सदृश चमकीले पुष्पदलोंसे आच्छादित, स्वादु रसयुक्त फलोंसे युक्त और विचारपूर्वक व्यवहार करनेवाले कौओंके बच्चोंसे परिपूर्ण है। अतः प्यारे बच्चो ! तुमलोग उसी घोंसलेपर जाओ। वहाँ रहते हुए तुमलोगोंको पर्याप्त मात्रामें भोग और निर्विघ्न मोक्ष दोनों प्राप्त होंगे।
मुनिवर ! यों कहकर हमारे पिताने हमलोगोंका चुम्बन तथा आलिङ्गन किया। तब हमलोग भगवती अलम्बुसा और पिताजीके चरणोंमें अभिवादन करके अलम्बुसाके वासस्थान उस विन्ध्यप्रदेशसे उड़ चले। फिर तो क्रमशः आकाशको लाँघकर और मेघोंके कोटरोंसे निकलकर पवनलोकमें जा पहुँचे। वहाँ हमलोगोंने आकाशचारी देवोंको प्रणाम किया। मुनीश्वर ! फिर सूर्यमण्डलका अतिक्रमण करके हमलोग स्वर्गकी अमरावतीपुरीमें गये और फिर स्वर्गको लाँघकर ब्रह्मलोकमें पहुँच गये। वहाँ हमलोगोंने माता भगवती ब्राह्मीदेवीको प्रणाम किया और तुरंत ही पिताद्वारा कहा हुआ वह सारा वृत्तान्त उन्हें ज्यों-का-त्यों कह सुनाया। तब उन्होंने स्नेहपूर्वक हमलोगोंका आलिङ्गन किया और 'जाओ' यों आज्ञा प्रदान करके हमें उत्साहित किया। तत्पश्चात् हमलोग उन्हें नमस्कार करके ब्रह्मलोकसे चल पड़े। आकाशमार्गसे चलनेमें हमलोग चपल तो थे ही; अतः पवनलोकमें विचरते हुए लोकपालोंकी पुरियोंको, जो सूर्यके समान देदीप्यमान हैं, लाँघकर इस कल्पतरुपर आ पहुँचे और अपने घोंसलेमें प्रविष्ट हो गये। मुने ! यहाँ सारी बाधाएँ हमलोगोसे दूर रहती हैं और हमलोग सदा समाधिमें ही स्थित रहते हैं। महानुभाव ! आपके पूर्व प्रश्नके उत्तरमें हमलोग जैसे उत्पन्न हुए, जिस प्रकार यथार्थ ज्ञान प्राप्त करनेसे हमलोगोंकी बुद्धि शान्त हुई एवं जिस तरह हमलोग इस घोंसलेमें आये—वह सारा वृत्तान्त आपको अविकलरूपसे भलीभाँति कह सुनाया।
( सर्ग १८-१९ )