भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४०६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

देशभूत सुन्दर हृदय-कमलमें विशेषरूपसे और सम्पूर्ण देहमें समानरूपसे स्थित है। वह परमात्मा केवल चेतन और शुद्ध ज्ञानस्वरूप है। उसका चिन्तन करना चाहिये।

इसके सिवा ध्यानका एक दूसरा प्रकार यह है कि 'मैं जीवात्मा ही परिच्छेदशून्य आकारवाला, अनन्तरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंसे परिपूर्ण, सब वस्तुओंका पूरक एवं अखण्ड अद्वितीय शिवस्वरूप परमात्मा हूँ'—इस प्रकार स्वच्छ और अलौकिक भावना करके देवभावसे परिपूर्ण यह जीवात्मा महान् परमात्मा बन जाता है। वह परमात्माको प्राप्त पुरुष सबमें सम रहता है। उसका व्यवहार भी समान होता है। उसका ज्ञान भी सम होता है। उसका भाव भी सम होता है। उस सौम्य पुरुषका उद्देश्य भी महान् सुन्दर होता है। वह देहपातपर्यन्त अखण्ड तत्त्वज्ञानसे युक्त होता हुआ चिरकालतक निरन्तर परमात्माका ध्यानरूप पूजन ही करता रहता है। इसलिये मनुष्यको उचित है कि सज्जनोंके हृदयमें रहनेवाली, चन्द्रमाकी भाँति शीतल, मधुर-स्वभाव, दृढ़ मैत्रीसे हृदय-प्रदेशमें स्थित उस परमात्मदेवकी ध्यानरूप पूजा करे। दुष्टोंकी उपेक्षा, दुखियोंपर दया, पुण्यात्माओंके प्रति हृदयकी नित्य मुदिता (प्रसन्नता) की भावनासे, शुद्ध सामर्थ्यकी पद्धतिसे और ज्ञानरूप ध्यानसे उस परमात्मदेवकी पूजा करे।

प्रारब्धसे प्राप्त सम्पूर्ण इष्ट एवं अनिष्ट पदार्थोंमें सर्वदा ही परम समताका आश्रय लेकर नित्य चेतन परमात्माका ध्यानरूप व्रत करना चाहिये। अनुकूल और प्रतिकूलकी प्राप्तिमें सम होकर नित्य चिन्मय परमात्माके ध्यानरूप व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। 'यह मैं हूँ और यह मैं नहीं हूँ'—इस प्रकारके भेदको छोड़ देना चाहिये तथा 'यह सब ब्रह्म ही है' इस प्रकार निश्चय करके नित्य चिन्मय परमात्माके ध्यानरूप व्रतका आचरण करना चाहिये। महर्षे! इस परमात्माके ध्यानरूप पूजाके विधानमें जो द्रव्य-सम्पत्तियाँ बतलायी गयी हैं, वे सब एकमात्र समतारूप रससे परिपूर्ण होनेके कारण मधुर-रसवती ही हो जाती हैं। रसमयी शक्ति-समता मधुर और अतीन्द्रिय है। उस समतासे जो भी दृश्य विषय भावित होगा, वह तत्क्षण ही अमृततुल्य मधुर हो जायगा। समतारूप अमृतसे जो-जो भावित होता है, वह सब परम मधुरताको प्राप्त होता है। ब्रह्मैक्य-दर्शनस्वरूप समतासे स्वयं आकाशकी तरह विकारशून्य होकर मनके लय होनेपर जो स्वाभाविक स्थिति है, वही परमात्माकी ध्यानरूप पूजा कही जाती है। महात्मा ज्ञानीको पूर्णचन्द्रकी भाँति परिपूर्ण, समताके द्वारा समान ज्ञानवान्, एक, चिन्मय, स्वच्छ और स्फटिक-शिलाकी तरह निर्मल एवं दृढ़ होना चाहिये। जो भीतर आकाशकी तरह विशाल और बाहर न्यायतःप्राप्त कार्योंको करनेवाला, आसक्तिसे रहित एवं परमात्माके यथार्थ तत्त्वका पूर्णतया ज्ञाता है, वही सच्चा उपासक है। अज्ञानरूप मेघोंके नष्ट होनेपर स्वप्नमें भी जिसमें राग-द्वेष आदि हृदय-विकार नहीं देखे जाते तथा जिसका अहंता-ममतारूप कुहरा शान्त हो चुका है, ऐसे निर्मल आकाशके समान वह तत्त्वज्ञ सुशोभित होता है।

महर्षे ! यथासमय और यथाशक्ति आप जो कुछ भी कर्म करते हैं अथवा नहीं करते, उसीको चिन्मय शिवस्वरूप परमात्माका अन्तःपूजन समझना चाहिये। इस प्रकारके पूजनसे ही साधक अपने पारमार्थिक निरतिशय आनन्दमय स्वरूपका अनुभव करता है। शिव, शान्त, अन्यसे प्रकाशित न होनेवाला, स्वप्रकाशरूप परमात्मा ही जगत्के रूपमें प्रतीत हो रहा है। ब्रह्मन् ! भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत्में व्यापक, परम विशुद्ध चेतन-परमात्मारूप ईश्वरके स्वरूपका वाणीसे वर्णन भी नहीं किया जा सकता। इसलिये वसिष्ठजी ! तुच्छ दृष्टिका परित्याग करके और अपनी अखण्ड दृष्टिका आश्रय लेकर सम,