संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, दुःखनाशका उपाय * ४०७
निर्मलमना, शान्त, राग और दोषसे रहित तथा शोक-रहित बुद्धिसे युक्त होकर आप न्यायतःप्राप्त पदार्थोंसे परमात्मदेवकी पूजा करते हुए स्थित रहें।
(सर्ग ३८-४०)
शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, ब्रह्मके नाम-भेदोंका और स्वरूपका रहस्य एवं दुःखनाशका उपाय
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—देव ! शिव, परब्रह्म, आत्मा और परमात्मा किसके नाम कहे गये हैं? तीनों लोकोंके स्वामिन् ! भगवन् ! 'तत्', 'सत्', 'किंचित्', 'न किंचित्', 'शून्य' और 'विज्ञान' आदि भेद किसके कहे गये हैं ?
श्रीमहादेवजीने कहा—मुने ! आदि और अन्तसे रहित, प्रकाशान्तरकी अपेक्षा न रखनेवाली, स्वतःप्रकाश-स्वरूप जो सत् वस्तु अपनी महिमामें अपने-आप विद्यमान है, वही 'किंचित्' शब्दसे कही जाती है; और वह इन्द्रियोंके द्वारा जाननेमें नहीं आती, इसलिये 'न किंचित्' शब्दसे कही जाती है ।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—ईशान ! जो बुद्धि आदिसे युक्त चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके जाननेमें नहीं आता, उस परब्रह्मका संशयरहित अधिकारीद्वारा कैसे साक्षात्कार किया जाता है ?
श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! जिसमें अविद्याका नाममात्र अंश है, ऐसा केवल सात्त्विक और मोक्षकी चाह रखनेवाला साधक शास्त्राभ्यास आदि सात्त्विक उपायोंसे अविद्याका प्रक्षालन करता है, तब अविद्याका क्षय होनेपर वह अपने-आप ही अपनेद्वारा परमात्माका अनुभव करता है । आत्मा ही परमात्माको देखता है और आत्मरूपसे ही उसका विचार करता है । इस संसारमें एकमात्र परमात्मा ही सत् है, अविद्या नहीं; इसे ही अविद्याका क्षय कहते हैं। जो कुछ यह नाना-विध विनाशीशील दृश्य वस्तु है, इसे आप परमात्मा न समझिये; क्योंकि यह मिथ्या है । परब्रह्म परमात्मा तो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके क्षयसे प्राप्य है । जो वस्तु जिसका नाश होनेपर प्राप्त होती है, वह वस्तु उसके उपस्थित रहते कभी प्राप्त नहीं हो सकती । शिष्यके बोधके लिये किये गये गुरूपदेशसे अनिर्देश्य और अव्यक्त परमात्मा उसे स्वयं प्राप्त हो जाता है । गुरुके उपदेशों और शास्त्रार्थोंके बिना भी परमात्माका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि इन सबके संयोगसे ही परमात्माका ज्ञान होता है । कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय आदिका नाश तथा सुख, दुःख आदिका अभाव होनेपर जो बच रहता है, वह शिवस्वरूप परमात्मा ही 'तत्'-'सत्' इत्यादि नामोंसे कहा गया है । वास्तवमें तो यह सम्पूर्ण जगत् है नहीं, बल्कि परमात्माका सङ्कल्प होनेके कारण यह उसका स्वरूप ही है । वह सत्-स्वरूप परमात्मा आकाशसे भी अत्यन्त बढ़कर निर्मल और अनन्त है । विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुमुक्षु पुरुषोंने मोक्षके उपासकोंके बोधके लिये नाम-रूपरहित सच्चिदानन्द परमात्मामें चेतन, ब्रह्म, शिव, आत्मा, ईश, परमात्मा और ईश्वर आदि पृथक्-पृथक् नाम रूपोंकी कल्पना कर रखी है । वसिष्ठजी ! इस तरह जगतत्त्व एवं शिवनामक परमात्मतत्त्व ही सर्वदा सब तरहसे सब कुछ है। इसलिये आप इसे जानकर सुखपूर्वक स्थित हो जायें । प्राचीन मुमुक्षु लोगोंने शिव, आत्मा और परब्रह्म इत्यादि नामोंसे उस परमात्माकी भिन्न-भिन्न कल्पना की है; वस्तुतः एक परमात्मा ही है, उसमें कुछ भी भेद नहीं है । मुनिनायक ! इस प्रकार ज्ञानपूर्वक ध्यानरूप पूजा करनेवाला ज्ञानी पुरुष उस परमपदको प्राप्त हो जाता है ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—भगवन् ! मिथ्या होते हुए भी