भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 750 में से

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४०८ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ


यह जगत् किस प्रकार सद्-सा प्रतीत होता है, वह सब कुछ फिर संक्षेपमें मुझसे कहनेकी कृपा कीजिये।

**श्रीमहादेवजीने कहा—**मुने ! जो यह ब्रह्म, शिव, ईश्वर इत्यादि शब्दोंका अर्थ है, उसे ही विशुद्ध चिन्मय परमात्मा समझिये जैसे जलके आधारभूत समुद्रमें जल ही तरङ्गके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही परब्रह्म परमात्मामें केवल अद्वितीय सद्रूप ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें प्रकट हो रहा है; क्योंकि सारा जड दृश्यसमूह चेतन परमात्मरूप ही है, इस प्रकारका ज्ञान होनेपर वह दृश्यसमूह मनोराज्यके संकल्पनगरकी तरह हो जाता है। यह जगत् परमात्माका संकल्प है, इस यथार्थ अनुभवसे सम्पूर्ण दृश्य जगत् कल्याणमय परमात्मा ही बन जाता है।

**श्रीवसिष्ठजीने पूछा—**भगवन् ! इस जगत्‌की भले ही गन्धर्वनगरसे अथवा स्वप्नके मनुष्यसे उपमा दी जाय, फिर भी यह दुःखका कारण तो है ही। अतः दुःखके नाशके लिये यहाँ कौन-सी युक्ति है?

**श्रीमहादेवजीने कहा—**महर्षे ! वासनाके कारण दुःख उत्पन्न होता है और वह वासना सत् पदार्थमें हुआ करती है; किंतु यह जगत् तो मृगतृष्णाके जलकी तरङ्गके समान मिथ्या ही है। इसलिये वासना कैसे, किसमें, किसको, कहाँसे होगी? स्वप्नावस्थाका पुरुष भला कैसे मृगतृष्णाके जलका पान कर सकता है। द्रष्टाके सहित, अहंतासे युक्त और मन तथा मनन आदिके साथ इस जगत्‌का जब स्वप्नवत् अस्तित्व ही नहीं है, तब जो शेष रह जाता है, वही सद्रस्तु परमात्मा है। उस परमात्मामें न तो कोई वासना रहती है, न कोई वासना करनेवाला और न कोई वासनाका विषय ही रहता है। किंतु एकमात्र वह परमात्मा ही रहता है, जिसमें कल्पना-भ्रमका अत्यन्त अभाव है। प्रतीत होनेके कारण सत्य और वास्तवमें असत्य संसाररूप वेताल शून्यस्वरूप होनेके कारण जिस ज्ञानवान्‌की दृष्टिमें असत्य ही है, उसकी दृष्टिमें केवल परमात्माके सिवा और दूसरा क्या अवशिष्ट रह सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं। इस प्रकार शून्यमें ही वेतालकी तरह यह चित्त-वासना उत्पन्न हुई है, जिसका नाम जगत् है। उसकी शान्ति हो जानेपर अक्षय शान्ति ही अवशिष्ट रहती है। किंतु अहंतामें, जगत्में तथा मृगतृष्णाके जलमें जिस अज्ञानी मनुष्यकी आस्था (सत्तावुद्धि) बँधी हुई है, उसको बार-बार धिक्कार है ! वह अज्ञानी उपर्युक्त उपदेशके योग्य नहीं। इस जगत्‌में ज्ञानीलोग जिज्ञासु विवेकी मनुष्यको ही उपदेश दिया करते हैं, न कि उस बालवुद्धिवाले अविवेकीको, जो अनेक प्रकारकी भ्रान्तियोंसे ग्रस्त है, श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा त्याज्य है एवं देह आदिमें अभिमान रखता है।

(सर्ग ४१)


समष्टि-व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है—यह उपदेश देकर भगवान् श्रीशंकरका अपने वासस्थानको जाना तथा श्रीवसिष्ठजी और श्रीरामजीके द्वारा अपनी-अपनी स्थितिका वर्णन

**श्रीवसिष्ठजीने पूछा-**भगवन् ! सृष्टिके आदिमें देहके सम्बन्धसे संसारमें भ्रमण करनेवाला वह जीवात्मा मायारूप आकाशमें स्थित हुआ किस अवस्थाको प्राप्त करता है ?

**भगवान् शंकरने कहा-**मुने ! जिस प्रकार स्वप्न-मनुष्य स्वप्नके संसारको देखता है, उसी प्रकार वह जीवात्मा भी परम सूक्ष्म मायामय आकाशमें कर्मानुसार शरीरोंको देखता है। जैसे आज भी स्वप्नमनुष्य चैतन्य-घन आत्माके सर्वत्र व्यापक होनेसे स्वप्नमें कार्य करता है, वैसे ही देहधारी जीवात्मा भी जाग्रदवस्थामें कार्य करता है। जिस तरह शून्यस्वरूप वेताल वास्तविक

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