भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * समष्टि-व्यष्ट्यात्मक जो संसार है वह सब माया ही है * ४०९

दृष्टिसे असद्रूप है, किंतु भ्रमसे सद्रूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार यह समस्त जगत् वास्तवमें असत् है, किंतु भ्रमसे सद्रूप प्रतीत होता है; इसलिये जगत्‌का कारण वास्तवमें अहंकार ही है। यह संसार वास्तवमें सत् नहीं है; न यह कल्पित है न क्षणिक है, न यह कुछ उत्पन्न ही होता है और न कुछ विनष्ट ही होता है। वास्तवमें इसका अत्यन्त अभाव है। चेतन जीवात्मा ही सम्पूर्ण प्रपञ्चकी संकल्परूपसे अपनेमें उसी प्रकार कल्पना करता है, जिस प्रकार मनुष्य स्वप्नमें नगरका निर्माण और विनाश करता है पर जागनेपर वास्तवमें उसका स्वप्नके देश और कालसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। इस विनाशशील संसारका वास्तविक स्वरूप तत्त्वसे समझ लेनेपर इस मायारूप संसारकी भेदसत्ताका अभाव हो जाता है। तदनन्तर ज्ञानपूर्वक ध्यानके अभ्याससे कल्याणमय शिवरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। नहीं तो यह जीवात्मा अपने कर्मानुसार देह, इन्द्रिय आदिके संयोग-क्रमसे मृगी, लता, कीट, देव, असुर आदिरूप हो जाता है। नित्य, व्यापक, अनन्त दृढ और विश्वमें व्याप्त एवं विश्वके कर्ता जिस परब्रह्ममें यह जगत् कल्पित है, विवेक होनेपर वह जगत् न दूर है न समीप, न ऊपर न नीचे, न आपका है न मेरा, न पहले था न आज है, न प्रातःकालमें है न सत् है न असत् और न सत् और असत्‌के मध्यमें है अर्थात् वास्तवमें यह कल्पनामात्र ही है। मुने ! जैसा आपने पूछा; वैसा ही मैंने उत्तर दे दिया। आपका कल्याण हो। अब हमलोग अपनी अभिलषित दिशाकी ओर जा रहे हैं। पार्वती ! आओ, उठो।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! ऐसा कहकर वे नीलकण्ठ भगवान् शंकर जिनके ऊपर मैंने उस समय पुष्पाञ्जलि समर्पित की थी अपने परिवारके साथ आकाशकी ओर चले गये। तब पहलेसे ही शान्तस्वभाववाला मैं त्रिभुवनके अधिपति उमापतिके जानेके बाद क्षणभर चुप रहकर उनके स्मरणपूर्वक उनके द्वारा उपदिष्ट परमात्मदेवका ज्ञानपूर्वक ध्यानरूप पूजन नवीन (परिष्कृत) और श्रद्धा आदिसे पवित्र हुई बुद्धिसे करने लगा।

रघुनन्दन ! महादेव शंकरजीने सच्चिदानन्द परमात्माका ध्यानरूप यह सर्वोत्कृष्ट पूजन मुझसे कहा है और स्वयं मैं भी उसे तत्त्वसे जानता हूँ। जिस तरहका यह जगत्‌का स्वरूप है, उसे तुम भी तत्त्वसे जानते ही हो। जैसे जलका द्रवत्व स्वभाव है, जैसे वायुका स्पन्दत्व स्वभाव है और जैसे आकाशका शून्यत्व स्वभाव है, वैसे ही परमात्माका सर्गत्व (सृजन) स्वभाव है। श्रीराम ! तबसे लेकर आजतक उसी क्रमसे मैं शान्तिपूर्वक परमात्माका ध्यानरूप पूजन करता आ रहा हूँ। इसलिये मनुष्यको धन और बन्धुओंकी उत्पत्ति और विनाश होनेपर हर्ष