संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 451, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
और विषाद नहीं करना चाहिये; क्योंकि ये सभी संसारके अनुभव सदा विनश्वर ही हैं। श्रीराम ! प्रमथन-शील चित्र-विचित्र परिस्थितियाँ जिस प्रकार आती हैं, जाती हैं और पुरुषको पराजित करती हैं, यह सब तुम भी जानते ही हो। इसी प्रकार प्रेम और धन आते रहते हैं और यों ही चले भी जाते हैं। वे जगत्के व्यवहार वास्तवमें न तो तुम्हारे अंदर हैं और न तुम ही उनके अंदर हो। इस प्रकार यह जगत् तुच्छ ही है। केवल चेतनस्वरूप व्यापक देहवाले श्रीराम ! यह जगत् तुम्हारा संकल्प होनेके कारण तुम्हारा स्वरूप ही है। अतः तुम्हारे लिये हर्ष और शोकका प्रसङ्ग ही क्या है। तात ! तुम चिन्मात्र स्वरूप हो। यह जगत् तुमसे पृथक् नहीं है। इसलिये तुमको किस प्रकार और कहाँ हेय और उपादेयकी कल्पना हो सकती है ? तुम सम, ज्ञानस्वरूप और उदारधी होकर सदा ब्रह्मके ध्यानमे तत्पर होते हुए समुद्रकी तरह परिपूर्ण (परितृप्त) रूपसे स्थित रहो ! रघुनन्दन ! यह सब तुमने सुना और परिपूर्ण-बुद्धि होकर तुम स्थित भी हो; इस विषयमे और जो कुछ पूछना चाहो, पूछो। पहले जो तुमने प्रश्न किये थे, उनमेंसे यदि कोई उत्तरके बिना रह गया हो तो उसे भी आज पूछ लो।
श्रीरामजीने कहा—ब्रह्मन् ! न तो आत्मा उत्पन्न होता है न मरता है और न मायासे कलङ्कित ही है तथा 'यह सारा जगत् ब्रह्ममय है' इस प्रकारका निश्चय मेरा है। भगवन् ! मेरा मन शुद्ध और सब प्रकारके प्रश्नोंसे, संशयोंसे और इच्छित पदार्थोंसे निवृत्त है। इस चराचर संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसकी मुझे इच्छा और अनिच्छा हो तथा ऐसी कोई वस्तु भी नहीं है, जो मेरे लिये त्याज्य और ग्राह्य हो। मुझे न स्वर्गकी आकांक्षा है और न नरकसे द्वेष है; किंतु मन्दराचलकी तरह संशयरहित हुआ मै अपने स्वरूपमें स्थित हूँ। यह जगत् जिस स्वरूपका दिखायी देता है, उसी स्वरूपका है, उससे भिन्न उसका कोई दूसरा स्वरूप नहीं है—यों जो मूर्ख जानता है, उसके हृदयमें ज्वालाके सदृश अधिक संतापदायिनी, कुत्सित संशय-समूहोंसे होनेवाली 'यह वस्तु है और यह अवस्तु है' इस प्रकारकी कल्पनाएँ पर्याप्तरूपसे उत्पन्न होती रहती है। मूढ पुरुष जिन धन आदि विषयोंके लिये कृपणता करता है, जगत्की वे वस्तुएँ वास्तवमें हैं ही नहीं। परमेश्वर ! हमने सम्पत्तियोंकी अवधि जान ली, आपत्तियोंकी सीमाका भी अन्त देख लिया। हम सर्वसार अपने स्वरूपमे दीनरहित और परिपूर्ण हुए स्थित है।
(सर्ग ४२-४३)
ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वासना, आसक्ति और अज्ञानके नाशसे मनके विनाशका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! आसक्तिसे तथा कर्तृत्वाभिमानसे रहित एवं न्याययुक्त व्यवहार करनेवाले अन्तःकरणसे इन्द्रियोंके साथ तुम जो कुछ करते हो, वह कर्म कर्म ही नहीं है। जिस तरह प्राप्तिकालमें विषय तुष्टिकारक होता है, उसी तरह उसके बाद दूसरे कालमें नहीं होता। इसलिये बालबुद्धि अविवेकी ही क्षणिक सुख देनेवाले विषयोंमें आसक्त होता है, विवेकी नहीं। श्रीराम ! तुम आत्मज्ञानी हो। इसलिये
अहंकार तुम्हारा पतन नहीं कर सकता; क्योंकि जिसने निरन्तर असीम सत्यस्वरूप ब्रह्मका स्मरण किया है और जो तत्त्वज्ञानरूप सुमेरु पर्वतके शिखरपर स्थित है, उस पुरुषका पुनर्जन्मरूप पतन नहीं हो सकता। श्रीराम ! तुम्हारा जो यह समता एवं सत्यतामय स्वभाव मुझे दिखायी देता है, इससे मै मानता हूँ कि तुम सङ्कल्प-विकल्प और अविद्यासे रहित हो, अपने स्वरूपमें भलीभाँति स्थित हुए तुम मानो मुझे यह