भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण प्रकरण पू० ] * पुर्यष्टक बने हुए जीवात्माको तत्त्वज्ञानसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति * ४१५

रसना और घ्राण—ये इन्द्रियगोलक प्रत्यक्ष विद्यमान रहते हुए भी अपने अपने विषयोंका ग्रहण क्यों नहीं करते और जीते हुए प्राणीकी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंका ग्रहण कैसे करती हैं ? जडरूप होती हुई भी ये इन्द्रियाँ शरीरके भीतर स्थित रहकर घटादि बाह्य पदार्थोंका अनुभव कैसे करती हैं और कैसे नहीं भी करतीं ? महर्षे ! यद्यपि मैं इन विशेषताओंको जान रहा हूँ, तथापि आपसे फिर पूछता हूँ, उसे आप कृपापूर्वक पूर्णरूपसे कहिये ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! इस संसारमें विशुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्मके सिवा इन्द्रिय, चित्त और घट आदि किसी भी अन्य पदार्थका पृथक् अस्तित्त्व नहीं है। अर्थात् एक विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही हैं। वह चिन्मय परमात्मा ही प्रकृति बन गया है। उसी प्रकृतिके अंशसे इन्द्रिय आदि एवं घट आदि उत्पन्न हुए हैं। किंतु आदि और अन्तसे रहित, विकार-रहित, प्रकाशस्वरूप, शुद्ध चैतन्यमात्र, जगत्-कारणरूप ब्रह्म वास्तवमें मायासे रहित हैं। यह अज्ञानी जीवात्मा ही अज्ञानके कारण अपनी भावनाके अनुसार संसारका रूप धारण करता है। यह अह-भावनासे 'अहंकार', मननसे 'मन', निश्चयकी भावनासे 'बुद्धि', इन्द्रियोंकी भावनासे 'इन्द्रिय', देहकी भावनासे 'देह' और घटकी भावनासे घट बन जाता है। इस प्रकार अपनी भावनाके कारण यह जीवात्मा पुर्यष्टक बन जाता है। ज्ञानेन्द्रियोंके व्यापारोंको लेकर 'मैं ज्ञाता हूँ', कर्मेन्द्रियोंके व्यापारोंको लेकर 'मैं कर्ता हूँ', उन ज्ञान-कर्मेन्द्रियों-के व्यापारोंसे जनित सुख-दुःखोंका आश्रय होनेसे 'मैं भोक्ता हूँ', उदासीन होकर सबका प्रकाशन करनेसे मैं 'साक्षी हूँ' इत्यादि अभिमानयुक्त जो चैतन्य है, वही 'जीव' कहा गया है। वही जीवात्मा अपनी भावनासे समय-समयपर स्वयं ही अनेकरूप हो जाता है। जैसे जल सींचनेसे बीजके पल्लव आदि आकार होते हैं, वैसे ही भावनाके अनुसार उस जीवके भी शरीर आदि, स्थावर आदि एवं जंगम आदि अनेक रूप होते हैं; क्योंकि यह जीवात्मा अज्ञानसे यह मान लेता है कि मैं चेतन आत्मा नहीं हूँ, किंतु शरीरादि हूँ। वासनाओंके वशीभूत हुआ यह जीव कर्मानुसार चिरकालतक स्वर्ग-नरकमें आवागमनोंद्वारा जगत्में घूमता ही रहता है। इनमेंसे कोई तो विशुद्ध जन्मके कारण पहले जन्ममें ही परमात्माको यथार्थ जानकर आदि-अन्तसे रहित परमपद परमात्माको प्राप्त हो जाता है। कोई बहुत कालतक अनेक योनियोंमें प्राप्त सुख-दुःखादि भोगोंके अनन्तर परमात्माके यथार्थ ज्ञानद्वारा परमपदको प्राप्त होता है। श्रीराम ! बाह्य विषयोंके ज्ञानमें इन्द्रिय-सम्बन्ध ही सदा कारण है और वह इन्द्रियोंका सम्बन्ध चित्तसे युक्त जीवित पुरुषमें ही सम्भव है, मृत पुरुषमें कभी नहीं। जब शानपर चढ़े हुए चमकीले नवीन रत्नके समान आँखोंके तारेमें बाह्य दृश्य पदार्थ प्रतिबिम्बित होता है, तब उस पदार्थका हृदयमें प्रतिबिम्ब पड़नेके कारण, देहाभिमानी जीवके साथ सम्बन्ध हो जाता है। इस रीतिसे बाह्य वस्तु जीवद्वारा हृदयमें जानी जाती है। (सर्ग ५०)


पुर्यष्टक बने हुए जीवात्माको तत्त्वज्ञानसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति होनेका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! व्यष्टि चेतन जीवात्मा गर्भमें चक्षु आदि इन्द्रियोंके प्रादुर्भावसे सम्पन्न पुर्यष्टकस्वरूप हो जानेपर जिस वस्तुकी जिस प्रकार भावना करता है, उसी प्रकार उसे अपनी भावनासे तत्काल ही अनुभव करने लगता है। किंतु वास्तवमें अद्वितीय, असीम और अभेद्य होनेसे निर्विकार शुद्ध आत्मामें दूसरे किसी पदार्थका अस्तित्व है ही नहीं। अतः वह चेतन आत्मा वास्तवमें दृश्यके सम्बन्धसे कभी भी मनोरूपता, जीवरूपता अथवा पुर्यष्टकरूपताको नहीं प्राप्त होता। श्रीराम ! परमात्मा तो वास्तवमें विद्या