भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 494

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाकी सिद्धिका वैभव, गुरुपदेशको सरलतामें किरातका आख्यान *


भी भोग लिया। अब मुझे वैराग्य हो गया है, अतः मैं वन जाना चाहता हूँ; क्योंकि वनवासी मुनिपर सांसारिक सुख, दुःख, आपत्ति, सम्पत्ति—ये कोई भी अपना अधिकार नहीं जमा सकते। न तो उन्हें देशके विनाशसे मोहपूर्वक दुःख होता है और न संग्राममें प्रजाजनोंका क्षय ही करना-कराना पड़ता है; अतः मैं वनवासी मुनियोंके सुखको राज्य-सुखकी अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट मानता हूँ। वैराग्ययुक्त मन जैसा एकान्तमें सुखका अनुभव करता है, वैसा सुख उसे न तो चन्द्रवदनी रमणियोंके मुखमण्डलोंमें मिलता है और न ब्रह्मा एवं इन्द्रके भवनोंमें ही प्राप्त होता है। इसलिये सुन्दरि ! मैंने जो यह वनगमनका उत्तम विचार किया है, इसमें बाधा डालना तुम्हारे लिये उचित नहीं है; क्योंकि कुलीन स्त्रियाँ स्वप्नमें भी पतिकी इच्छाको भङ्ग नहीं करतीं।

चूडाला बोली—नाथ ! जैसे वसन्त ऋतुमें पुष्पकी शोभा होती है और शरद् ऋतुमें पुष्प भला मालूम देता है, उसी तरह जिस कार्यके करनेका अवसर प्राप्त हो, उसीका सम्पादन करनेसे उनकी शोभा होती है, अकालके कार्यमें नहीं। इसलिये जिनके शरीर वृद्धभावको प्राप्त हो गये हैं, उन्हींके लिये वनका आश्रय लेना शोभनीय है, आप जैसे युवकोंके लिये नहीं। इसी कारण आपका यह विचार मुझे पसन्द नहीं है। प्रियतम ! जब वृद्धावस्था आनेपर हम दोनोंके सिरके बाल श्वेत पुष्पोंके समान बिल्कुल सफेद हो जायँगे, उस समय हम दोनों एक साथ ही घरसे निकलकर वनको चले चलेंगे। राजन् ! बिना समयके ही प्रजापालन रूप कर्मका परित्याग कर देनेवाले राजाके राज्यका विनाश हो जाता है और उसे महान् पापका भागी होना पड़ता है। समयानुकूल अवसरके ही कार्य करनेवाले राजाको प्रजाएँ रीझती हैं। इसी प्रकार न करनेयोग्य कार्यसे नौकर स्वामीको और स्वामी नौकरको परस्पर मना करते ही हैं।

शिखिध्वजने कहा—कमलनयनी प्रिये ! मेरे अभीष्ट कार्यमें विघ्न मत डालो। अब तुम मुझे यहाँसे दूर एकान्त वनमें गया हुआ ही समझो। अनिन्दिते ! कठोर-से-कठोर अङ्गवाली स्त्रियाँ भी वनवासके लिये उपयुक्त नहीं हो सकतीं, फिर तुम्हारे अङ्ग तो बहुत कोमल हैं। तुम अभी नवयुवती हो, अतः तुम्हें तो वनमें नहीं जाना चाहिये। वनवास तो पुरुषोंके लिये भी बड़ा कठिन होता है; अतः तुम्हें तो प्रजाका पालन करते हुए इस उत्तम राज्यमें ही रहना चाहिये; क्योंकि पतिके बाहर जानेपर कुटुम्बका भार वहन करना स्त्रीका धर्म है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! अपनी उस कल्याणप्राणप्रियासे ऐसा कहकर जितेन्द्रिय राजा शिखिध्वज स्नान करनेके लिये उठकर चल दिये और स्नान करके उन्होंने अपने सम्पूर्ण दैनिक कार्योंका सम्पादन किया। जब सायंकाल हुआ, तब पुनः संध्योपासन सम्पन्न करके तथा भोजन पूरा करके वे अपनी प्रिय पत्नी चूडालाके साथ शय्यापर सो गये। तदनन्तर आधी रातके समय जब चारों ओर सन्नाटा छा गया, सारी जनता गाढ़ निद्रामें लीन हो गयी,