भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 750 में से

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४५२* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

और कोमल बिछावनसे युक्त पलंगपर सोयी हुई चूडाला भी गाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी, तब जिस पलंगके आधे बिस्तरपर पत्नी सोयी हुई थी, उस पलंगसे राजा उठ खड़े हुए और 'हे राजलक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है' यों कहकर अकेले ही अपने राजमहलसे चल पड़े ।

चलते-चलते वे महासागरमें प्रवेश करनेवाले नदकी तरह एक भयंकर अरण्यमें जा पहुँचे। पुनः प्रातःकाल होनेपर राजा शिखिध्वज वेगपूर्वक वहाँसे आगे चले और बारह दिनोंमें बहुत-से नगरों, देशों, पर्वतों और नदियोंको लाँघ गये ।

तत्पश्चात् वे मन्दराचलके तटवर्ती एक काननमें जा पहुँचे, जो मनुष्यके लिये अति दुर्गम था। वहाँसे मनुष्योंकी बस्ती और नगर अत्यन्त दूर पड़ते थे। वहाँ उन्होंने एक चौरस एवं शुद्ध स्थानमें, जो जलसे घिरा हुआ, शीतल, हरी-हरी घासोंसे आच्छादित होनेके कारण श्याम, स्निग्ध तथा फलोंसे लदे हुए वृक्षोंसे सम्पन्न था, मञ्जरीयुक्त लताओंसे बाँधकर अपने लिये एक पर्णशाला बना ली। फिर राजाने अपनी उस कुटियामें बाँसका चिकना डंडा, फलाहारके लिये पात्र, अर्घ्यपात्र, पुष्पपात्र, कमण्डलु, रुद्राक्षकी माला, शीतका निवारण करनेके लिये गुदड़ी, चटाई और मृगचर्म आदि लाकर यथास्थान रख दिये। इनके सिवा और भी जो कोई वस्तु तापस-कर्मोपयोगी प्रतीत हुई, राजाने उसे भी लाकर वहाँ रख लिया। फिर दिनके प्रथम प्रहरमें प्रातःकाल उन्होंने संध्यापूर्वक. जप और दूसरे प्रहरमें पुष्प आदिका संचय कर लेनेके बाद स्नान और देवार्चन किया। तत्पश्चात् कुछ जंगली फल, कन्दमूल और कमलदण्ड आदि खाकर उन जितेन्द्रिय नरेशने जपपरायण हो अकेले ही वह रात बितायी। इस प्रकार मन्दराचलकी तलहटीमें अपने द्वारा बनायी गयी पर्णशालाके भीतर बैठकर जप करते हुए मालव-नरेश शिखिध्वज खेदरहित होकर दिन बिताने लगे। वे अपने पूर्वानुभूत नित्य नूतन राजसी भोगविलासौंका कुछ भी स्मरण नहीं करते थे। भला, जिसके हृदयमें विवेकपूर्वक वैराग्यका उदय हो जायगा, उसके मनका अपहरण राज्यलक्ष्मियाँ कैसे कर सकती हैं !
( सर्ग ८३-८४)


सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज, वनमें राजाके दर्शन और राजाके भविष्यका विचार करके चूडालाका लौटना, नगरमें आकर राज्य-शासन करना, तदनन्तर कुछ समय बाद राजाको ज्ञानोपदेश देनेके लिये ब्राह्मणकुमारके वेषमें उनके पास जाना, राजाद्वारा उसका सत्कार और परस्पर वार्तालापके प्रसंगमें कुम्भद्वारा कुम्भकी उत्पत्ति, वृद्धि और ब्रह्माजीके साथ उसके समागमका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार राजा शिखिध्वज वनमें, एक तापसको जिन-जिन

वस्तुओंकी आवश्यकता पड़ती है, उन पदार्थोंका संग्रह करके कुटियामें रहने लगे । इधर घरपर चूडालाने क्या

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