भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू०] * जगत्के अत्यन्ताभावका, राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका वर्णन * ९६९


बिना कारणके ही अनुभूत हो रहा है। इसलिये वास्तवमें किसीसे उत्पन्न न होनेके कारण इसे अविद्यमान ही जानिये।

राजा शिखिध्वज बोले—मुनीश्वर ! हाथ, पैर आदिसे युक्त प्रतिदिन दिखायी देनेवाले इस शरीरका भला पिता कारण कैसे नहीं है ?

कुम्भने कहा—राजन् ! कारणरूप पिताका भी अभाव होनेसे वास्तवमें पिता भी कारण नहीं है। जो पदार्थ असत्से उत्पन्न होता है, वह असत् ही है। कार्यभूत पदार्थोंका कारण बीज कहा जाता है। इसलिये जिस कार्यका कारण नहीं है, वह कार्य भी कारणरूप बीजके अभाव रहनेसे नहीं है। मनुष्यको जो उसका ज्ञान होता है वह तो बिल्कुल विभ्रम है। अवश्य ही जो वस्तु बीजरूप कारणसे रहित है, वह है ही नहीं। अतः उसका जो मनुष्यको ज्ञान होता है, वह नेत्र-दोषसे दीखनेवाले दो चन्द्रमा, मरुभूमिमें जल और गन्धर्वनगरके समान बुद्धिका भ्रम ही है—मिथ्या है।

(सर्ग ९४)


जगत्के अत्यन्ताभावका, राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका तथा जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन

राजा शिखिध्वजने पूछा—मुने ! ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब-पर्यन्त जो कुछ यह संसार भासित होता है वह यदि भ्रमरूप ही है तो फिर वह दुःखदायी कैसे है ?

कुम्भ बोले—राजन् ! वास्तवमें पितामहकी भी सत्ता नहीं है, फिर उनके द्वारा निर्मित प्रपञ्चकी सत्ता हो ही कैसे सकती है। जो वस्तु असत् वस्तुसे सिद्ध की जाती हो, वह त्रिकालमें भी सिद्ध नहीं हो सकती। यह जो भूत-सृष्टि दिखायी पड़ती है, वह मृगतृष्णाजलके सदृश मिथ्या ही उदित हुई है, इसलिये शुक्तिसे रजत-ज्ञानके सदृश विचारसे ही उसका विलय हो जाता है। कारणका अस्तित्व न होनेसे कार्यकी सत्ता हो ही नहीं सकती। जो असत् कारणसे असत् कार्यकी उत्पत्ति प्रतीत होती है, उसका स्वरूप मिथ्याज्ञानके अतिरिक्त और कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। मिथ्याज्ञानके कारण दिखायी पड़नेवाला पदार्थ किसी कालमें भी अस्तित्व नहीं रख सकता, क्या कहीं किसीने मृगतृष्णा-जलसे घड़े भरे हैं ?

राजा शिखिध्वजने कहा—मुनिवर ! अनन्त, अजन्मा, अव्यक्त, आकाशकी तरह निराकार, अविनाशी, शान्त, परब्रह्म परमात्मा सृष्टिके आदिरचयिता ब्रह्माका कारण क्यों नहीं हैं ?

कुम्भ बोले—राजन् ! वास्तवमें शुद्ध निर्विशेष अद्वितीय ब्रह्म न तो कार्य हैं और न कारण ही हैं; क्योंकि निर्विकार होनेसे उनमें कारणत्व और कार्यत्वका अभाव है। इसलिये वस्तुतः ब्रह्म न कर्ता हैं, न कर्म हैं और न कारण ही हैं। उनका न कोई निमित्त है और न कोई उपादान है। वह तर्कका विषय नहीं हैं, अतः वह अविज्ञेय हैं। जो अनैश्वर्य, अहिंसक, शान्त, विकार-शून्य और कल्याणरूप हैं, उनमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व किस तरह, किसका, जिनसे और किस प्रकार होंगे ? अतः यह जगत् वास्तवमें किसीसे उत्पन्न नहीं है और न इसकी सत्ता ही है। इसलिये आप न कर्ता हैं और न भोक्ता हैं; किन्तु सब कुछ शान्त, अजन्मा, कल्याणमय ब्रह्म ही है। वास्तवमें कारणकी सत्ता ही नहीं है। इसलिये यह जगत् किसीका भी कार्य नहीं है। क्योंकि कारणका स्वरूप न रहनेसे जो कार्यरूप दिखायी देता है, वह केवल भ्रमसे ही है। इसलिये इस रूपमें ही इस सृष्टिका तीनों कालोंमें अत्यन्त अभाव है। यह