भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४७० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जगत् जब किसी भी कारणका कार्य नहीं है, तब अनायास समस्त पदार्थोंका मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है। पदार्थोंका मिथ्यात्व सिद्ध हो जानेपर फिर ज्ञान किसका और जब ज्ञानका ही अभाव सिद्ध हो गया, तब अहंकारका कोई कारण ही नहीं रहता। इसलिये राजन् ! आप शुद्ध मुक्त ही हैं। फिर बन्धन और मोक्षकी बात ही क्या है !

राजा शिखिध्वजने कहा—भगवन् ! मैं वास्तविक तत्त्वको जान गया। आपने बहुत ही उत्तम और युक्तियुक्त कहा है। मैं यह भी समझ गया कि कारणका अभाव होनेसे ब्रह्म भी जगत्का कर्ता नहीं है। अतः कर्ताके अभावसे जगत्का अभाव है और जगत्के अभावसे पदार्थका अभाव है। इससे उसके बीज चित्त आदिका भी अभाव है और इसीसे अहंता आदिकी भी सत्ता नहीं है। इस प्रकारकी स्थिति होनेपर मैं विशुद्ध ही हूँ, सर्वज्ञ हूँ और कल्याणस्वरूप हूँ; क्योंकि परमात्मासे भिन्न दृश्य विषय कुछ है ही नहीं, यह आपने मुझे समझा दिया। इसलिये सब पदार्थोंका स्वरूप जान लेनेपर 'अहम्' आदिसे लेकर अन्ततक जितने दृश्य पदार्थ हैं, वे सब असद्रूप ही भासते हैं; इसलिये मैं आकाशकी भाँति शान्त हुआ समभावसे नित्य स्थित हूँ। अहो ! देश, काल, कला एवं क्रियाओंमें युक्त यह जो जगत्के पदार्थोंकी नाना दृष्टि थी, वह दीर्घकालके अनन्तर शान्त हो गयी अर्थात् मुझे दृश्य जगत्के अभावका ज्ञान हो गया। अब केवल अविनाशी शान्त ब्रह्म ही स्थित है। अब मैं शान्तिमय मुक्तस्वरूप और परिपूर्ण हूँ। मैं क्रिया, उत्पत्ति और विनाशसे रहित हूँ। मैं अतिशय शुभ, कल्याणस्वरूप विशुद्ध परमात्मस्वरूप हूँ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! राजा शिखिध्वज पूर्वोक्त रीतिसे परब्रह्ममें विश्राम पाकर दो घड़ीतक वायुरहित स्थानमें दीपशिखाकी तरह निश्चल तथा शान्तचित्त हो गये। फिर जब राजा शिखिध्वज निर्विकल्प समाधिमें स्थित थे, तब अपनी सहज लीलामयी वाणीसे कुम्भने उन्हें तत्काल जगाया।

कुम्भने कहा—राजन् ! अब आप अज्ञानरूपी निद्रासे जाग गये हैं और कल्याणरूप होकर स्थित हैं। प्रिय ! जब परमात्माका एक बार स्पष्टरूपसे अनुभव हो जाता है, तब उसके लिये समस्त अनिष्टकारक पदार्थोंका अभाव हो जाता है। अतः अब आप समस्त कल्पनारूपी दोषोंसे रहित हो जीवन्मुक्त बन गये हैं।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जब मुनिश्रेष्ठ उस कुम्भने राजा शिखिध्वजको इस तरह समझाया, तब वे ज्ञानी हो गये और महामोहसे रहित हो शोभा पाने लगे।

(तब) कुम्भने कहा—महाराज ! मैंने पहले जिस आत्मतत्त्वका उपदेश दिया था, उसे ग्रहणकर अज्ञानरूपी आवरणसे मुक्त हो जानेके कारण आप देदीप्यमान होकर खूब शोभा पा रहे हैं। अब आपको जाननेके लिये जो यह कुछ बच गया है, इसे सुनिये। राजन् ! यह जो कुछ भी स्थावर, जङ्गम नानाविध आकार-प्रकारसे भरा हुआ जगत् दिखायी पड़ता है, वह सब कल्पकी समाप्तिमें विनष्ट हो जाता है। तदनन्तर जब महाकल्पकी लीला समाप्त हो जाती है, तब एकमात्र प्रसन्न, गम्भीर, सर्वव्यापक सच्चिदानन्द परमात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है। यह परमात्मा केवल चिन्मय, विशुद्ध, शान्त, परम अनन्त, सम्पूर्ण कल्पनाओंसे रहित और परम दिव्य ज्ञानस्वरूप है। वह तर्करहित, अनिज्ञेय, समस्वरूप, कल्याणमय, निन्दारहित, ज्ञानसे परिपूर्ण एवं निर्वाण ब्रह्मस्वरूप है। इसलिये राजन् ! परमात्मासे भिन्न कोई भी दूसरी कल्पना इस संसारमें है ही नहीं। आपको जो निर्मल परमात्मतत्त्व ज्ञात हुआ है, वही परिपूर्ण और अविनाशी ब्रह्म है। सम्पूर्ण आकार-प्रकारोंसे युक्त हो प्रकट हुआ-सा वह सर्वस्वरूप होकर सदा ही स्थिर रहता है। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे