भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 750 में से

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * जगत्‌के अत्यन्ताभावका राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका वर्णन * ४७६

अगम्‍य होनेके कारण वह अनिर्वचनीय, अति उत्तम और विलक्षण पदार्थ है। वह सर्वस्वरूप परमात्मा सबका आत्मा है। वह अति सूक्ष्म, शुद्ध तथा अनुभवस्वरूप है। वह वास्तवमें न कर्ता है, न कर्म है और न कारण ही है। वह सत्-चित्-आनन्दमय परमात्मा अविनाशी, अगम्य तथा स्वयं अनुभवस्वरूप है। यह जगत् यथार्थरूपसे जान लिये जानेपर परम कल्याणकारक हो जाता है; क्योंकि यह परमात्माके संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण परमात्माका स्वरूप ही है। किंतु यदि जगत् यथार्थरूप-से न जाना गया तो वह भयंकर दुःख देनेवाला और अकल्याणकारक होता है। जैसे अग्नि चित्र-विचित्र रूपसे आविर्भूत हुई भी वास्तवमें वह अपने ही स्वरूपसे रहती है, वैसे ही संकल्पसे अन्यान्य रूपोंमें आविर्भूत हुई भी ब्रह्मसत्ता अपने यथार्थ ब्रह्मरूपसे ही स्थित रहती है। वास्तवमें जगत्‌का कोई भी कारण नहीं है; अतः इसका तीनों कालोंमें अत्यन्त अभाव है। ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें प्रतीत होता है।

कुम्भने कहा—महाराज ! अपनी ही सत्तामें स्थित ब्रह्म वास्तवमें तो न किसीका उपादान कारण है और न किसीका निमित्त कारण है। वह केवल विशुद्ध अनुभव-रूप है। अनुभवरूप उससे भिन्न दूसरा कुछ भी पदार्थ नहीं है। जो कुछ अहंता आदि जगत् प्रतीत होता है वह भी ब्रह्मका संकल्प होनेके कारण अनन्त ब्रह्मरूप ही है।

राजा शिखिध्वज बोले—मुनिवर ! मैं मानता हूँ कि कल्याणमय परमात्मामें वास्तवमें अहंतादि जगत् नहीं है; परंतु उसमें जो जगत्‌का ज्ञान होता है, वह किस कारणसे होता है, इसे शीघ्र मुझसे कहिये।

कुम्भने कहा—साधो ! असीम जगत्‌का विस्तार करनेवाला जो अनादि-अनन्त ब्रह्म है, वही अपने संकल्पसे जगत् और जगत्‌के ज्ञानके सदृश बनकर अवस्थित है; इसीलिये वही जगत्-रूप कहा जाता है। जिस प्रकार जलमें रस सार वस्तु है, उसी प्रकार सब पदार्थोंकी सार वस्तु परमात्मा ही है। यदि शान्त ब्रह्मरूप पद जगत्‌का कारण माना जाय तो फिर निष्क्रिय, अगम्य, अतर्क्य आदि शब्दोंसे जो ब्रह्मका वर्णन किया गया है, वह कैसे सिद्ध होगा? इन सब युक्तियोंसे यह निश्चित होता है कि वास्तवमें यह ब्रह्म किसी भी कार्यका न निमित्त कारण है और न उपादान कारण ही है, अतः इस सृष्टिका अस्तित्व किसी कालमें है ही नहीं। चिन्मय परमात्माके अतिरिक्त इस सृष्टिकी दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं, जिससे कि उसका वर्णन किया जाय। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि जड़ दृश्य जगत्‌की सत्ता है ही नहीं। जो भी कुछ यह दीखता है, वह एक मात्र चेतनानन्द-घन ही अपने संकल्पसे स्फुरित हो रहा है। वही अहंभाव, जगत् आदि शब्द और ज्ञानार्थादिरूपोंसे युक्त-सा होकर भासता है। घट, पट आदि नामिक वस्तु चिन्मय नहीं हो सकती, क्योंकि ज्ञानिक वस्तुओंका नाश अवश्यम्भावी है। 'नाते ! यह चेतन है और यह जड़ है'—इस प्रकारका जो कल्पना-दोष है वह केवल चित्तकी चञ्चलता है, वस्तुतः कुछ भी नहीं है। संसारमें केवल चेतनानन्द ब्रह्मकी ही सत्ता है। द्वित्व और एकत्व कुछ नहीं है, केवल कल्पना-मात्र है। राजन् ! इसलिये जब दृश्य पदार्थोंकी सत्ताका अभाव होनेपर उनकी भावनाकी अत्यन्त शून्यता सिद्ध हो जाती है। सम्पूर्ण भावनाओंके शून्यता होनेपर तो आपकी अहम्भावनाका अस्तित्व कैसे सम्भव है ! अहम्भावका अभाव होनेपर फिर दूसरा क्या बचता ही है जिसे कि चित्त कहा जाय। इसलिये चित्त भी ब्रह्मरूप ही है। ब्रह्मसे भिन्न चित्त नामक पदार्थ है ही नहीं और जीव आदिके नामपर भी दृश्यका भेद भी नहीं है। अतः राजन् ! आप निष्काम मनसे युक्त और मौनी हो जाइये ।

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