संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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सच्चिदानन्दमय हो जाते हैं। शुद्ध चैतन्यदृष्टिके सम्बन्धसे जड पदार्थकी कदापि सिद्धि न होनेके कारण, जड पदार्थोंकी भावनाका भी अभाव हो जानेसे भावनाजनित जीवरूप नहीं रहता, केवल स्वयं परमात्मा ही रहता है। 'सब ब्रह्मस्वरूप ही है' इत्यादि वेदार्थभावनासे जनित ब्रह्मसाक्षात्कारद्वारा केवल चिन्मय ब्रह्मके ही प्रकाशित हो जानेपर फिर शोक कहाँ ? फिर तो, शोकका अत्यन्त अभाव हो जाता है। समस्त द्वैतका बाध हो जानेपर एक ब्रह्मरूप ही रह जाता है। वह ब्रह्म विशुद्ध, कारणशून्य, शाश्वत एवं आदि और मध्यसे रहित है।
(सर्ग ९५–९७)
चित्त और संसारके अत्यन्त अभावका तथा परमात्माके भावका निरूपण
कुम्भ कहते हैं—राजन् ! चित्त नामका पदार्थ किसी कालमें, किसी देशमें या किसी वस्तुरूपमें कहीं है ही नहीं। यह जो चित्त-सा प्रतीत हो रहा है, वह अविनाशी ब्रह्म ही है। सम्पूर्ण चित्त आदि प्रपञ्च अज्ञानात्मक है, इसलिये उसका अस्तित्व ही नहीं है; क्योंकि जो अज्ञानात्मक वस्तु रहती है, उसका ज्ञानसे बाध हो जाता है। अतः अधिष्ठान ब्रह्ममें अहम्, त्वम्, तत् इत्यादि कल्पनाएँ कैसे रह सकती हैं ? जो कुछ भी यह प्रकट जगत् है, वह कुछ है ही नहीं। सब ब्रह्म ही है; अतः कौन किसको कैसे जाने ? प्राकृत प्रलयके अनन्तर सृष्टिके आरम्भमें जो यह चित्त आदि जगत् उत्पन्न प्रतीत होता है, वह वास्तवमें है ही नहीं। मैंने 'यह चित्त-सा मालूम पड़ता है', इत्यादि रूपसे जो कहीं-कहीं निर्देश किया है, वह केवल आपके बोधके लिये ही किया है। उपादान आदि कारणरूपसे जो प्रसिद्ध हैं, उनका भी अस्तित्व नहीं है और जितने भावरूपसे प्रसिद्ध हैं, उनका भी अस्तित्व नहीं है, इसलिये इस असत् जगत्का ब्रह्म कारण नहीं है; क्योंकि अज्ञानजनित भ्रान्तिरूप ही जगत् है, इसलिये उसकी किसी कालमें सत्ता ही नहीं है। अतः यह जो दिखायी पड़ता है, वह भासनात्मक ब्रह्म ही है, दूसरा नहीं। जो देव नाम और रूपसे रहित है, उस ब्रह्मरूप देवके विषयमें यह कहना कि यह देव इस मिथ्या जगत्का निर्माण करता है, वास्तवमें न तो युक्तिसंगत है, न सत्य है और न अद्वैतवादियोंका वैसा अनुभव ही है। राजन् ! इसी प्रयोगसे चित्तका अस्तित्व नहीं है; क्योंकि जब जगत्का ही अस्तित्व नहीं है, तब जगत्के अन्तर्गत चित्तका अस्तित्व कैसे हो सकता है ? चित्त तो वासनामात्ररूप है। वासना तब होती है, जब कि वासनाका विषय रहे। परंतु वासनाका विषय जो जगत् है, वह तो स्वयं असत् है, अतः चित्तका अस्तित्व ही कहाँ है ? वास्तवमें तो कारणके अभावसे ही यह दृश्य वासनाका विषय जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ है; फिर चित्त आया ही कहाँसे ?
अतः केवल चिन्मय विशुद्ध विज्ञानस्वरूप परमात्मा ही अपने संकल्पसे स्फुरित हो रहा है, इसलिये उससे भिन्न जगत्की सत्ता कहाँसे आयी ? समस्त अनर्थोंको उत्पन्न करनेवाला अहम्, त्वम्, जगत् इत्यादि जो यह अनुभव होता है, वह वास्तविक नहीं है; स्वप्नके सदृश मिथ्या ही है। वासनाके विषय जगत्की असत्ता होनेसे वासनाकी सत्ता नहीं है, इसलिये फिर वासनात्मक चित्त ही कैसा, कहाँ, किससे और किस तरहसे हो सकता है ? जो परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे रहित हैं, वे अज्ञानी ही चित्त और इस दृश्य जगत्को सत्य समझते हैं। वस्तुतः चित्त असत् है, उसका