संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू०] * चित्त और संसारके अत्यन्त अभावका तथा परमात्माके भावका निरूपण * ४३१
कोई आकार नहीं है और न वह उत्पन्न ही हुआ है। क्योंकि लोक, शास्त्र और अनुभवसे दृश्य वस्तुमें अनादिता, अजता और स्थिरता सम्भव नहीं है। जिसकी बुद्धिमें लोक, शास्त्र और वेद प्रमाण नहीं है, वह अत्यन्त मूर्ख है। अतः सज्जनको उसके कथनका कभी अवलम्बन नहीं करना चाहिये। वास्तवमें शास्त्रीय बोधसे सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है। न तो कहीं जगत् आदिका ज्ञान है, न कहीं चित्तका ही भाव है और न अभाव है तथा न कहीं द्वैत है, न कहीं अद्वैत ही है। यह समस्त जगत् आश्रयरहित, परम शान्त, अजन्मा अनादि परमात्मारूप ही है। किन्तु यह जो अज्ञानियोंद्वारा देखे गये रूपसे युक्त जगत् है, वह न नाना है और न अनाना ही है। अतः आप मौन व्रत धारण करके काठके सदृश स्थित रहिये।
राजा शिखिध्वजने कहा—महामुने ! आपकी दयासे मेरा मोह नष्ट हो गया। मुझे ब्रह्मके स्वरूपकी स्मृति प्राप्त हो गयी, मेरा संदेह दूर हो गया। मेरी बुद्धि परम विश्रामको प्राप्त हो गयी, अब मैं आत्मवान् होकर स्थित हूँ। अब मैंने ज्ञेय वस्तु परमात्माके स्वरूपका अनुभव कर लिया, मैं महामौनी हो गया, मायारूपी महासमुद्रको पार कर गया; अब मैं शान्त हूँ, मैं अहंकारस्वरूप नहीं हूँ, आत्मज्ञानी बनकर सम्पूर्ण विकारोंसे रहित होकर अवस्थित हूँ। अहो ! अति चिरकालतक मैं भवसागरमें परिभ्रमण करता रहा। परंतु अब मैं क्षोभरहित अक्षय परमपदको प्राप्त हो गया हूँ। मुने ! इस तरह अवस्थित होनेपर मूर्खोंके माने हुए अहंतासहित ये भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों जगत् नहीं हैं। जो कुछ यह भासित हो रहा है, उसे ब्रह्मका संकल्प होनेके कारण मैं ब्रह्मरूप ही समझता हूँ।
कुम्भ बोले—राजन् ! आपका कथन सत्य है। जिस चिन्मय परमात्मामें वस्तुतः यह जगत् ही नहीं है, वहाँ आकाशमें बिना हुए प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरके समान उस तरहका 'अहं, त्वम्' आदि अनुभव कैसा, कहाँ, किस निमित्तसे और किस प्रकार हो सकता है ? जैसे कड़ा, कुण्डल आदि भावनाके शान्त हो जानेपर सुवर्णमात्र अवशिष्ट रह जाता है, वैसे ही जगदादि भावनाओंके शान्त हो जानेपर एकमात्र ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है। 'देह आदि मैं हूँ' इस प्रकारकी भावना अत्यन्त विनाशकारक बन्धनके लिये होती है तथा 'देहादिरूप मैं नहीं हूँ' इस तरहकी भावना विशुद्ध मोक्षके लिये होती है। अहंकार-ज्ञानका अभाव मोक्ष है तथा अहंकार-ज्ञान ही बन्धन है। इसलिये राजन् ! 'मैं वह साक्षात् ब्रह्म ही हूँ, अहंकार मैं नहीं हूँ' इस प्रकारके शुद्ध कैवल्यात्मक बोधसे युक्त होकर आप आत्मवान् हो जाइये। जिस तरह समुद्रमें तरङ्ग आदि वास्तवमें जलमात्र ही हैं, उसी तरह ब्रह्ममें संसार और संसारके पदार्थ परमात्म-का यथार्थ ज्ञान होनेपर एकमात्र परमात्मस्वरूप ही हैं। यह सृष्टि ही सृष्टि शब्दके अर्थसे रहित परब्रह्म है और परब्रह्म ही सृष्टि है; क्योंकि यही शाश्वत परब्रह्म 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस श्रुति-वाक्यका अर्थ है। समस्त शब्द और उनके अर्थकी भावनाका जहाँ अभाव है, वह शुद्ध, नित्य, चेतन, अनन्त परमात्मा ही ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है; क्योंकि परमात्माका यथार्थ अनुभव हो जानेपर जब शब्द और उनके अर्थरूप जगत्का ज्ञान नहीं रहता, तब वह अजर, शान्त ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है। उसमें वाणीकी भी गति नहीं है।