भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४७४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ब्रह्मसे जगत्की पृथक् सत्ताका निषेध तथा जन्म आदि विकारोंसे रहित ब्रह्मकी स्वतः सत्ताका विधान

कुम्भने कहा—राजन् ! जिसमें कारणता है, उसका वह कार्य सिद्ध हो सकता है । वास्तवमे जो निर्विशेष ब्रह्म है वह तो किसीका कारण ही नहीं, फिर उससे कार्य होगा ही कैसे ? जो कार्य कारणसे उत्पन्न होता है, वह कारणके सदृश होता है । जो यहाँ उत्पन्न ही नहीं होता, उसमें भला सादृश्य आयेगा ही कहाँसे ? भला आप बतलाइये तो सही, जिसका कोई बीज ही नहीं है, वह उत्पन्न कैसे होगा ? जो वस्तु अतर्क्य, अगम्य और निर्विशेष है, उसमें बीजता ही कहाँ ठहरेगी ? देश और कालके वशसे सभी पदार्थ कारणसे युक्त और प्रमाणसे गम्य होते हैं । किंतु अकर्ता होनेसे ब्रह्म निमित्त और उपादान कारणोंका प्रमाण कैसे सिद्ध हो सकता है ? क्योकि कर्ता, कर्म और कारणशून्य कल्याणमय परमात्मामें कारणता नहीं है, इसलिये जगत् शब्दार्थ ज्ञानका वह कारण नहीं हो सकता । अतएव राजन् ! जो सत्स्वरूप निर्विशेष ब्रह्म है, वह 'मैं ही हूँ' इस प्रकार आप निश्चय कीजिये । यह प्रतीति होनेवाला जगत् अज्ञानियोंकी दृष्टिमें ही सत् है; क्योंकि वह एक अद्वितीय चिन्मय अजर और शान्त निर्विशेष ब्रह्म ही वास्तवमें प्रमाणित है । किंतु अलातचक्रके सदृश भ्रमाकृति जो यहाँ जगत्, चित्त आदि दिखायी देता है, वह मृगतृष्णा-जल, दृष्टिदोषसे दो चन्द्रमा आदिकी भ्रान्ति तथा बालकल्पित प्रेत आदिकी भाँति है । जो जगत् सर्वथा भ्रमात्मक है, वह भला सत्य नामसे कैसे कहा जा सकता है ? अज्ञानजनित भ्रान्ति ही अन्तःकरण और चित्तादि शब्दोंसे कही जाती है ।

जैसे मरुमरीचिकामें प्रतीत होनेवाले जलका ज्ञान 'यह जल नहीं है,' इस यथार्थ ज्ञानसे नष्ट हो जाता है, वैसे ही यह चित्त है । इस रूपसे हृदयमें दृढ़ हुआ जो अज्ञानात्मक विकार है, वह 'यह चित्त नहीं है' इस यथार्थ ज्ञानसे समूल विनष्ट हो जाता है । जैसे अज्ञान-भ्रमसे उत्पन्न हुई रज्जुमें सर्परूपता 'यह सर्प नहीं है' इस तरहके हृदयमें दृढ़ हुए यथार्थ ज्ञानसे नष्ट हो जाती है, वैसे ही आत्मामें अज्ञान-भ्रमसे उत्पन्न हुआ मनोरूप चित्त 'यह चित्त नहीं है' इस तरहके हृदयमें दृढ़ हुए यथार्थ विज्ञानसे विनष्ट हो जाता है । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सारे पदार्थ हृदयमें अज्ञानसे उत्पन्न हुए हैं । वस्तुतः इस जगत्में चित्त नहीं है और इसी तरह अहकारादिसे संयुक्त देहादि कुछ भी नहीं है, किंतु एकान्त निर्मल एक आत्मा ही है । अज्ञानी जीवोंके द्वारा ही अज्ञानसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकारकी रचना की गयी है । किंतु आज आपने संकल्पके अभावके द्वारा उन सबका परित्याग कर दिया है; क्योकि जो पदार्थ सकल्पसे आता है, उसका संकल्पका अभाव होते ही विनाश हो जाता है । जैसे जलसे समुद्र परिपूर्ण है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन परमात्म-तत्त्वसे यह सारा संसार परिपूर्ण है । न मैं हूँ, न आप हैं, न अन्य हैं, न ये सब पदार्थ हैं। न चित्त है, न इन्द्रियाँ हैं और न आकाश ही है । केवल एक विज्ञानानन्दघन विशुद्ध परमात्मा ही है । घट-पटादि दृश्य-जगत्के आकाशरूपसे एक वह परमात्मा ही दिखायी देता है । 'यह चित्त है, यह मैं हूँ' इत्यादि तो असत्य कल्पनाएँ है । महीपते ! वास्तवमें तो इस त्रैलोक्यमें न कोई जन्म लेता है और न कोई मरता ही है । सत् और असत् भावनारूप यह केवल चेतनका संकल्पमात्र है । जब वास्तवमें एक सर्वात्मक व्यापक ब्रह्म परमात्मा ही प्रकट है, तब द्वित्व और एकत्व कैसे रह सकता है और कैसे संशय तथा भ्रम ही रह सकता है ? मित्र ! केवल निर्मल अनन्त परमात्म-स्वरूप आपका न तो कुछ विनष्ट हो सकता है और न कुछ बढ़ ही सकता है; क्योंकि जो अजन्मा, अजर, अनादि, अद्वितीय, विशुद्ध, सदा एकरूप, चिन्मय, संकल्परहित, सत्स्वरूप वस्तु है, वही परमात्म-तत्त्व है । (सर्ग १००)