संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजकी ज्ञानमें दृढ़ स्थिति * ९३५
राजा शिखिध्वजकी ज्ञानमें दृढ़ स्थिति तथा जीवन्मुक्तिमें चित्तराहित्य एवं तत्त्वस्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार कुम्भके स्वाभाविक वचनोंपर विचार करके राजा शिखिध्वज उसी क्षण स्वयमेव आत्मपदमें स्थित हो गये। फिर तो उनके मन और नेत्रोंका व्यापार बंद हो गया, वाणी शान्त हो गयी तथा वे ध्यानस्थ होकर मनन करने लगे, उस समय उनके शरीरके सभी अवयव ऐसे निश्चल हो गये, मानो शिलातलपर खुदी हुई कोई मूर्ति हो। महाबाहो ! तदनन्तर दो ही घड़ीके बाद जब उनकी ध्यानमुद्रा भंग हुई और वे विकसित नेत्रोंसे कुम्भकी ओर देखने लगे, तब कुम्भरूपिणी चूडालाने राजासे प्रश्न करना आरम्भ किया।
कुम्भने पूछा—राजन् ! जो अत्यन्त प्रकाशमान, शुद्ध, विस्तृत एवं निर्मल है तथा जो निर्विकल्प-समाधिमें स्थित रहनेवाले योगियोंके लिये सुन्दर शय्याके समान है, उस आत्मपदमें आपको आनन्दपूर्वक विश्रान्ति प्राप्त हो चुकी न ? आपका अन्तःकरण प्रबुद्ध हो गया न ? आपने भ्रान्तिका परित्याग कर दिया न ? ज्ञातव्यका ज्ञान प्राप्त कर लिया और द्रष्टव्य वस्तु देख ली न ?
शिखिध्वज बोले—भगवन् ! आपकी कृपासे मुझे उस महती पदवीका साक्षात्कार हो गया, जो निरतिशयानन्दकी भूमिका और समस्त उत्कर्षोंकी पराकाष्ठा है। अहो ! जानने योग्य वस्तुओंके ज्ञानसे सम्पन्न संत-महात्माओंका सङ्ग अपूर्व एवं सर्वोत्तम अमृतमय होता है, अतः सर्वोत्कृष्ट फल प्रदान करनेवाला है । प्रभो ! जिस महामृतकी उपलब्धि मुझे सारे जन्ममें भी नहीं हुई, वही आज आपके समागमसे अनायास ही सुलभ हो गयी। परन्तु कमललोचन ! इस अनन्त, आद्य एवं अमृतरूप आत्मपदकी प्राप्ति मुझे पहले ही क्यों नहीं हो गयी ?
कुम्भने कहा—राजन् ! जब भोगेच्छाओंका परित्याग कर देनेसे मन पूर्णतः शान्त हो जाता है और सम्पूर्ण इन्द्रियगणोंके भोगरूप दोषोंकी निवृत्ति हो जाती है, तब चित्तमें उपदेशककी विमल उक्तियाँ उसी प्रकार निमग्न हो जाती हैं, जैसे शुद्ध स्वच्छ वस्त्रपर कुंकुममिश्रित जलके छींटे। कमलनेयन ! आपके अपने वासनात्मक उत्पन्न दोषोंका, जो अनेक जन्मोंके शरीरोंद्वारा संगृहीत किये हुए थे, परिपाक आज प्रकट हुआ है। साधुशिरोमणे ! कालद्वारा परिपक्व होकर सम्पूर्ण दोष शरीरसे निकल जाते हैं। सखे ! शरीरसे वासनात्मक दोषोंके निकल जानेपर गुरुदेव जो कुछ निर्मल उपदेश देते हैं, वह शीघ्र ही अन्तःकरणमें प्रविष्ट हो जाता है। महामते ! दोषोंका परिपाक सम्पन्न हो जानेपर आज मैंने आपको उद्बुद्ध किया है। इसी कारण आज ही आपके अज्ञानका विनाश हो गया। आज आपके सभी दोष परिपक्व होकर नष्ट हो गये। आज ही आपने सम्यक्रूपसे ज्ञानोपदेश धारण किया है। आज ही आप उपदेशसम्पन्न हुए हैं और आज ही आप प्रबोधवान् भी हुए हैं। गन्धर्वके न्यायसे आज आपके समस्त शुभ-अशुभ कर्मोंका समूह विनाश हो गया। महीपते ! जबतक इस चित्तका दुर्भाग्य दीन रहा था, तबतक आपके चित्तमें 'यह मैं हूँ, यह मेरा है' ऐसा अज्ञान वर्तमान था; परन्तु भूपते ! इस समय मेरा वचनोपदेश श्रवण करके आपने अपने हृदयसे उस अज्ञानको निकाल फेंका है, जिससे आपके चित्तका विनाश हो गया है; अतः अब आप भलीभाँति प्रबुद्ध हो गये हैं। राजन् ! जबतक हृदयमें मनका अस्तित्व वर्तमान रहता है, तबतक अज्ञान रहता है, किन्तु ज्यों ही अविद्या-रूपसे चित्तका विनाश हुआ, त्यों ही ज्ञानका अभ्युदय हो जाता है। द्वैत और अद्वैतकी दृष्टि ही चित्त है और वही अज्ञान भी कहा जाता है; इन दोनोंकी दृष्टिका नष्ट होना विनाश है, यही ज्ञान और इसी पदका नाम मुक्ति है। नरेश ! जो प्रतीत होनेके कारण सत् और जन्मने न होनेके कारण असत् है तथा जो मिथ्या जगतरूपी वासना...