भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 750 में से

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४७६* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

स्थान है, उस चित्तका तो आपने विनाश कर ही दिया। इससे अब आपका ज्ञान जाग उठा है और आप विमुक्त हो गये हैं। अतः अब आप शोकशून्य, आयासरहित निःसङ्ग, अनन्य, आत्मज्ञानसम्पन्न, महान् अभ्युदयसे युक्त, मौनी एवं मुनि होकर अपने निर्मलरूपमें स्थित रहिये।

शिखिध्वज बोले—भगवन् ! यों आपके कथनानुसार जो मूर्ख जीवके लिये ही चित्त है, ज्ञानीके लिये नहीं; किंतु प्रभो ! यदि आत्मज्ञानीके लिये चित्त है ही नहीं तो ये आप-जैसे जीवन्मुक्त मनुष्य मनसे रहित होकर जगत्में कैसे विचरण करते हैं ? यह बतलानेकी कृपा कीजिये।

कुम्भने कहा—तत्त्वज्ञ ! आप जैसा कह रहे हैं यह ठीक वैसा ही है; इसमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं है। जैसे पत्थरमे अङ्कुर नहीं निकलता, उसी प्रकार जीवन्मुक्तोंका चित्त व्यापारशून्य हो जाता है; क्योंकि पुनर्जन्म लेनेमें सहायक जो घनीभूत वासना होती है, वही चित्त शब्दसे कही जाती है और वह आत्मज्ञानीमें रहती नहीं। आत्मज्ञानसम्पन्न पुरुष जिस वासनाद्वारा सांसारिक कर्मोंका व्यवहार करते हैं, उसे आप 'सत्त्व' मात्रवाली समझिये। वह वासना पुनर्जन्मसे रहित होती है। जो सत्त्वमें स्थित हैं तथा जिनकी इन्द्रियाँ सम्यक्-प्रकारसे वशमें हैं, ऐसे जीवन्मुक्त महात्मा आसक्तिरहित होकर विचरते हैं; परंतु चित्तस्थ पुरुष वैसा कभी नहीं कर सकते। राजन्! अज्ञानसे आच्छादित चित्तको 'चित्त' कहते हैं और प्रबुद्ध चित्त 'सत्त्व' कहा जाता है। जो अज्ञानी हैं वे 'चित्त' में स्थित रहते हैं और महाबुद्धिमान् ज्ञानी लोग 'सत्त्व'में स्थित रहते हैं। भूपते ! चित्त बारंबार उत्पन्न होता है; किंतु सत्त्व पुनः नहीं पैदा होता; इसीलिये अज्ञानी बन्धनमें पड़ता है, ज्ञानी नहीं पडता। राजन् ! मुझे यह ठीक-ठीक पता है कि आज आपने पूर्णरूपसे अपने चित्तका विनाश कर दिया है जिससे आप सत्त्वसम्पन्न हो गये हैं और महात्यागी बनकर स्थित हैं। आज आपकी सारी वासनाएँ नष्ट हो गयी हैं, जिससे आपकी विशेष शोभा हो रही है।

मुने ! मैं यह भी मानता हूँ कि आपका मन आकाशकी तरह निर्मल हो गया है। आप परम शान्तिको प्राप्त हो गये हैं और सिद्ध होकर सर्वोत्कृष्ट समस्थितिमें पहुँच गये हैं। राजन् ! यह वही महात्याग है, जिसमें आपने अपने सर्वस्व-रूप चित्तका परित्याग कर दिया है। भला, तप आपके कितने दुःखोंका विनाश करनेमें समर्थ होता। यह जो उपनिरूप परम सुख है, यही अक्षय सुख है। यही वास्तवमें सत्य है। स्वर्गादिका जो थोड़ा-बहुत सुख है, वह सत्य नहीं है; क्योंकि वह विनाशशील है तथा उत्पत्ति एवं विनाशयुक्त होनेके कारण वर्तमानकालमें ही प्रतीत होता है।

राजेन्द्र ! जैसे आकाशसे भी अत्यन्त निर्मल सच्चिदानन्द परमात्मासे सभी पदार्थ समुद्भूत होकर दृष्टिगोचर होते हैं, वैसे ही वे उसी परमात्मामें विलीन भी हो जाते हैं। सङ्कल्पसे ही जिनकी उत्पत्ति हुई है, ऐसे पदार्थोंको आत्मज्ञानी महात्मा लोग जलमें प्रतिबिम्बित सूर्योंकी तरह समझकर ग्रहण नहीं करते। सज्जनशिरोमणे ! जगत्में जिसका चित्त स्पन्दनरहित हो गया है, उसके समीप संसार आ ही नहीं सकता; क्योंकि महीपाल ! इस त्रिलोकीमें जो जो दुःख जीवको प्राप्त होते हैं, वे सभी चित्तकी चपलतासे ही उत्पन्न हुए रहते हैं। इसलिये जिसका चित्त स्थिर, शान्त, स्पन्दनशून्य और चञ्चलतारहित हो गया है, वही मनुष्य सदा परमानन्दमें निमग्न रहता है और वही साम्राज्य—परमात्म-साक्षात्कारका पात्र होता है।

शिखिध्वज बोले—सम्पूर्ण संशयोंका उच्छेद करनेवाले विभो ! स्पन्द और अस्पन्द—ये दोनो किस प्रकार एकताको प्राप्त होते हैं, वह विधि मुझे शीघ्र बतलानेकी कृपा कीजिये।

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