संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका कुछ कालतक विचार * ९७७
कुम्भने कहा—राजन् ! जैसे सागर जलरूपसे एक है, उसी तरह यह सारा जगत् चिन्मात्रस्वरूप होनेके कारण एक ही वस्तु है; अतः जैसे तरङ्ग शुद्ध जलको ही उछालती हैं, वैसे ही बुद्धिवृत्तियाँ उसी चिन्मात्रको स्पन्दित करती हैं । तात ! श्रुतियाँ जिसका ब्रह्म, चिन्मात्र, अमल और सत्त्व आदि नामोंद्वारा गान करती हैं, उसीको मूढ लोग जगद्रूपसे देखते हैं । इस संसारका स्वरूप तो चेतन परमात्माका स्पन्दनमात्र है, इसलिये यथार्थ दृष्टिवालोंके लिये तो इसका विनाश ही हो जाता है; परंतु जिन्हें यथार्थदृष्टिकी प्राप्ति नहीं हुई है, ऐसे पुरुषोंको रज्जुमें सर्पभ्रान्तिकी भाँति यह जगद्रूपमें ही प्रतीत होता । जैसे चक्षुरिन्द्रियके दोषरहित होनेपर एक ही चन्द्रमा दृष्टिगोचर होता है, उसी तरह निष्काम शास्त्रोंके अभ्यास और सत्पुरुषोंके सङ्गसे जब समय पाकर चित्त शुद्ध हो जाता है, तब एकमात्र चेतन परमात्माके स्वरूपका अनुभव होता है। तातो ! आप आदि पदमें स्थित स्व-स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं । देहादि पदोंमें आपका भेद भाव नहीं रह गया है, आप महान् चेतनस्वरूप हो गये हैं और आपका शोक नष्ट हो गया है, अतः अब आप अपने उसी पदमें प्रविष्ट हुए स्थिर रहिये । (सर्ग १०१)
कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका कुछ कालतक विचार करनेके पश्चात् समाधिस्थ होना, चूडालाका घर जाकर तीन दिनके बाद पुनः लौटना, राजाके शरीरमें प्रवेश करके उन्हें जगाना और राजाके साथ उसका वार्तालाप
कुम्भने कहा—महाराज शिखिध्वज ! जिस प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है और जैसे विलीन हो जाता है, वह सारा-का-सारा वृत्तान्त मैंने आपसे वर्णन कर दिया । इसे सुनकर, समझकर तथा मनन करके स्पष्टरूपसे प्रत्यक्ष प्राप्त परमपदमें आप स्वेच्छानुसार स्थित रहिये । संकल्पपरम्परासे तथा किसी भी वस्तुकी अभिलाषासे रहित आपको सदा आत्मदृष्टिमें ही स्थित रहना चाहिये; क्योंकि यही दृष्टि परम पावन है ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! कुम्भके यों कहनेपर राजा शिखिध्वज हाथमें फल लेकर कुम्भको प्रणाम करनेके लिये प्रतिवचन बोलना चाहते थे कि तबतक कुम्भ अन्तर्धान हो गये । इस प्रकार कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे उसी विस्मयोत्पादक घटनाका विचार करते हुए चित्रलिखित-से अवाक् रह गये । फिर वे यों सोचने लगे—'अहो ! ब्रह्माकी लीला बड़ी विचित्र है, जो कुम्भके व्याजसे मुझे सदा अभ्युदयस्वरूप ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त हुआ । अहो ! उन देवकुमारने मुझको अत्यन्त ही सुन्दर एवं युक्तियुक्त उपदेश दिया, जिसके प्रभावसे चिन्मात्रके ही साक्षात्कारमें लगा पड़ा हुआ मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ । अभी तक मैं इस कर्मजालरूपी दलदलमें, जो नाना प्रकारके कष्टोंसे भरे