संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हुआ हूँ; क्योंकि मेरी तो ऐसी धारणा है कि इस जगत्में आपके समान मेरा बन्धु; आप्त, सुहृद्, मित्र, सखा, विश्वासपात्र व्यक्ति अथवा अनुयायी दूसरा कोई नहीं है।
शिखिध्वज बोले—अहो ! देवपुत्र ! असङ्ग होते हुए भी जो आप मेरे समागमकी इच्छा रखते हैं, इससे प्रतीत होता है कि आज निश्चय ही मेरे पुण्य सफल हो गये।
कुम्भने कहा—राजन् ! आपको महानन्दस्वरूप परमपदमें विश्रामकी प्राप्ति हो गयी न ? आप इस भेदमय दुःखसे सर्वथा रहित हो गये हैं न ? भोगकी नीरसताका विचार करके आपात रमणीय संकल्पोंसे आपका प्रेम एकदम निर्मूल हो गया है न ? आपका मन हेय और उपादेयकी अवस्थाको अतिक्रान्त कर गया है न ? वह शान्त, शम-सम्पन्न होनेसे समतायुक्त और प्रारब्धानुसार प्राप्त पदार्थोंमें उद्वेगशून्य होकर ही स्थित रहता है न ?
शिखिध्वज बोले—भगवन् ! चिरकालके पश्चात् थोड़े ही समयमें मैं निर्विकार होकर पूर्ण विश्रामको प्राप्त हो गया हूँ। मुझे सम्पूर्ण ज्ञातव्य पदार्थ उपलब्ध हो चुके हैं। अब मैं पूर्णतया तृप्त हो गया हूँ। जिस ब्रह्मका मुझे न तो ज्ञान ही था और न जिसकी प्राप्ति ही हुई थी, उसे मैंने जान लिया और प्राप्त भी कर लिया तथा छोड़ देने योग्य संसारका त्याग भी कर दिया। अब मेरा मन वासनारहित हो गया है और मैंने परमात्मस्वरूप परम तत्त्वका आश्रय भी ले लिया है। अब मेरे लिये कुछ भी शेष नहीं रह गया है। अब तो मैं सांसारिक वासनाओंसे शून्य मोह और भयसे रहित, वीतराग, नित्य ज्ञानस्वरूप, सर्वत्र समतापूर्ण, सर्वथा सौम्य, सर्वात्मक, सारी कल्पनाओंसे मुक्त, आकाशमण्डलके समान निर्मल तथा एकरूप होकर स्थित हूँ।
(सर्ग १०२-१०३)
कुम्भ और शिखिध्वजका परस्पर सौहार्द, चूडालाका राजासे आज्ञा लेकर अपने नगरमें आना और उदास-मन होकर पुनः राजाके पास लौटना, राजाके द्वारा उदासीका कारण पूछनेपर चूडालाद्वारा दुर्वासाके शापका कथन और चूडालाका दिनमें कुम्भरूपसे और रातमें स्त्रीरूपसे राजा शिखिध्वजके साथ विचरण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! वे दोनों कुम्भ और शिखिध्वज तत्त्वज्ञानी तो थे ही, अतः वे परस्पर इस प्रकारकी अध्यात्मविषयकी विचित्र कथाएँ कहते हुए तीन मुहूर्त-छः घड़ीतक उस वनमें बैठे रहे। तत्पश्चात् वे वहाँसे उठकर किसी दूसरे शिखरपर जाकर वहाँके सरोवरपर तथा आनन्ददायक वनमें विचरण करने लगे। इस प्रकार उस महावनकी उन वनवीथियोंमें वैसा आचरण करते हुए तथा परस्पर वैसी कथाओंको कहते-सुनते हुए उन दोनोंके आठ दिन बीत गये। तब कुम्भने राजासे कहा—'राजन् ! आओ अब हमलोग इस पर्वतपर किसी दूसरे वनमें चलें।' राजाने कुम्भकी बात मानकर स्वीकार कर लिया। फिर तो वे दोनों वहाँसे चल पड़े और अनेक तरहके वनो, जंगलों, जलाशयोंके तटों, सरोवरों, कुञ्जों, भीषण शिखरों, नदी प्रदेशों, ग्रामों, नगरों, उपवनों, पर्वतीय गोष्ठो, कुञ्जों तीर्थस्थानों और आश्रमोंमें घूमते रहे। वे पूर्णतया शान्त तो थे ही, अतः एक ही साथ रहते थे। उनमें स्नेह, सत्त्व और उत्साह एक-सा था। राघव ! वे देवताओं और पितरोंकी पूजा भी एक ही साथ करते थे और उनका भोजन भी एक साथ ही होता था। श्रीराम ! 'यह अपना घर है और यह नहीं है' ऐसी वैकल्पिक धारणा उन दोनोंके मनका कभी अपहरण नहीं कर पायी थी। वे कभी अपने शरीरपर धूल लपेट लेते, कभी चन्दनका लेपन कर लेते, कभी भस्म रमा लेते, कभी दिव्य वस्त्र धारण कर लेते, कभी