भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 524

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भ और शिखिध्वजका परस्पर सौहार्द * ४८१

उसे पल्लवोंसे आच्छादित कर लेते और कभी पुष्पोंसे सजा लेते। इस प्रकार वे दोनों मित्र साथ-साथ विचरण करते थे।

कुछ ही दिनोंके बाद समचित्तता तथा सत्त्वकी उत्कृष्टताके कारण राजा शिखिध्वज भी कुम्भके ही समान शोभा पाने लगे। तब मानिनी चूडालाने राजा शिखिध्वजको देवकुमारके सदृश उत्तम शोभासे सम्पन्न देखकर विचार किया कि 'अब मैं इस काननमें अपनी बुद्धिसे सोचकर कुछ ऐसे प्रपञ्चकी रचना करूँ जिससे दूसरोंको मान देनेवाले ये मेरे स्वामी राजा शिखिध्वज मुझमें रति-सुखके इच्छुक हो जायँ।' यों सोच-विचारकर कानन-कुञ्जमें बैठी हुई कुम्भवेषधारिणी चूडाला अपने पतिसे बोली—

कुम्भने कहा—'राजन् ! मैं स्वर्ग जा रहा हूँ और सायंकाल होते-होते वहाँसे निश्चय ही लौट आऊँगा; क्योंकि आपका सङ्ग मुझे स्वर्गसे भी बढ़कर सुखप्रद है।' 'अच्छा, आप शीघ्र ही लौटियेगा।' राजाके ऐसा कहनेपर कुम्भ उस वनप्रान्तसे उड़कर शरत्कालीन मेघके सदृश आकाशमें जा पहुँचे। वहाँ आकाशमार्गसे जाते हुए कुम्भने राजाके ऊपर पुष्पाञ्जलि छोड़ दी। राजा शिखिध्वज भी जाते हुए कुम्भकी ओर तबतक टकटकी लगाये देखते ही रहे, जबतक वे उनकी आँखोंसे ओझल नहीं हो गये।

उधर आकाशमें राजा शिखिध्वजकी आँखोंसे ओझल होते ही सुन्दरी चूडालाने कुम्भ-शरीरका परित्याग कर दिया और वह पुनः अपने पूर्वरूपमें आ गयी। फिर आकाश-मार्गसे चलकर वह स्वर्गके समान रमणीय अपने नगरमें जा पहुँची और अदृश्यरूपसे अपने अन्तःपुरमें जो सुन्दरी स्त्रियोंसे खचाखच भरा था, प्रवेश कर गयी। वहाँ झटपट सारा राज्यकार्य सँभालकर वह पुनः राजा शिखिध्वजके समक्ष आ गयी। पर आज उसके चेहरेपर उदासी आयी थी। यों उदास-मन कुम्भको सामने देखकर राजा शिखिध्वज उठकर खड़े हो गये। उनका भी चित्त उदास हो गया, फिर वे आदरपूर्वक यों कहने लगे—

'देवपुत्र ! आपको नमस्कार है। आप तो उदास-से दीख पड़ते हैं। आप कुम्भ तो हैं न ! इस उदासीको छोड़िये और इस आसनपर विराजिये। मित्रवर ! जिन्हें वेद्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो चुका है तथा जो अपने स्वरूपमें स्थित हो गये हैं, ऐसे संत महात्मालोग हर्ष-विषादजनित स्थितिका उसी प्रकार आश्रय नहीं ग्रहण करते, जैसे कमलपत्र जलका।'

तब कुम्भने कहा—'राजन् ! जैसे जबतक तिल हैं, तबतक तेल रहता है, उसी तरह जबतक देह है, तबतक उसकी अच्छी-बुरी दशा भी होती है। परन्तु भोगमें चित्त-की जो समता होती है, वही देहकी अच्छी-बुरी दशाओं-द्वारा प्राप्त दुःखसे रहित होना है। तत्त्वज्ञानी लोग भी, जबतक प्राप्त हुए अन्तिम देहका पतन नहीं हो जाता, बुद्धि आदिकी समता तथा हाथ-पैर आदिके चलानेमें तबतक ईश्वरीय विधानके अनुसार समय बिताते रहते हैं।'

शिखिध्वज बोले—महाभाग ! आप तो तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं। देवता होते हुए भी आपको ऐसी उदासी किस कारणसे प्राप्त हुई—यह बतलानेकी कृपा कीजिये।

तब कुम्भने कहा—भद्र ! जब मैं यहाँसे गया, तब आपको पुष्पाञ्जलि समर्पण करके आकाशमें उड़ता हुआ स्वर्गमें जा पहुँचा। वहाँ पिताजीके साथ इन्द्रके सभाभवनमें क्रमानुसार बैठा था। जब सभा-विसर्जनका समय आया और पिताजीने मुझे जानेकी आज्ञा दी, तब मैं उठकर यहाँ आनेके लिये स्वर्गसे चल पड़ा और नभोमण्डलमें आ पहुँचा। आगे बढ़नेपर मैंने देखा कि मलय-उपत्यकाके मध्यसे होकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा बड़े वेगसे इधर ही आ रहे हैं। वे भूतलपर स्थित मन्दाकिनीकी ओर सूर्य-दिशाकी ओर जा रहे थे। तब मैंने भी आकाशमार्गमें ही जाते हुए उन मुनिश्रेष्ठको अभिवादन किया और कहा—'मुने ! नील मेघके सदृश वस्त्र धारण करनेके कारण आप अभिसारिका नारीकी तरह लग रहे हैं।' दुर्वासोजी यह देखकर महाराज ! यह सुनकर दुर्वासाजी मुझे शाप देते हुए