भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 525

४८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बोले—'जाओ, इस दुर्वचनके कारण आजसे तुम प्रत्येक रात्रिमें स्तन और केश आदि स्त्री-चिह्नोंसे युक्त होकर हाव-भाव आदि विलासोंवाली कमनीया रमणीके रूपमें बदल जाया करोगे।' वृद्ध ब्राह्मण दुर्वासाके मुखसे निकले हुए उस अशुभ वचनको सुनकर, जबतक मैं कुछ थोड़ा विचार करने लगा, तबतक वे मुनि अन्तर्धान हो गये। इसी कारणसे मेरा मन उदास हो गया है और मैं सीधे आकाश-तलसे यहाँ चला आया हूँ। सज्जनशिरोमणे ! इस प्रकार मैंने अपना सारा वृत्तान्त आपको सुना दिया। अब मैं रात्रिमें स्त्री हो जाऊँगा। भला, रात्रिमें मैं इस स्त्रीत्वका निर्वाह कैसे कर सकूँगा ? अहो ! संसारमें होनहारकी बड़ी विलक्षण गति है। हाय ! रातमें जब मेरा स्त्रीरूप हो जायगा, उस समय मैं लज्जापरवश होकर गुरुजनों, देवताओं और ब्राह्मणोंके सामने निर्वाधरूपसे कैसे रह सकूँगा ?

शिखिध्वज बोले—देवपुत्र ! जगत्‌में जो कुछ भी दुःख अथवा सुख प्राप्त होते हैं, वे सभी प्रारब्धानुसार शरीरके लिये ही होते हैं। उनमेंसे किसीका भी आत्मापर प्रभाव नहीं पड़ता। मुने ! आप तो शास्त्रको भूषणकी तरह धारण करनेवाले हैं, इसलिये किसी भी कार्यफलके विषयमें विचार करना आपके लिये उचित नहीं है। फिर, यदि आप-जैसे विवेकी पुरुष भी यों विचार करने लगेंगे तो अन्य अविवेकी जनोंके खेद-नाशका क्या उपाय होगा ? मैं तो ऐसा समझता हूँ कि खेदका विषय उपस्थित होनेपर कुछ खेदोचित वचन कहना चाहिये—इसी अभिप्रायसे आपने ऐसा कहा है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तदनन्तर जब चन्द्रोदयका समय आया, तब उन दोनों मित्रोंने उठकर संध्या-वन्दन किया और फिर जप-कर्म समाप्त करके वे लताओंके एक समूहमें जा बैठे। वहाँ जब कुम्भ धीरे-धीरे स्त्रीरूपमें परिवर्तित होने लगे, तब वे सामने बैठे हुए राजा शिखिध्वजसे गद्गद वाणीमें बोले—'राजन् ! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आपके सामने मैं लज्जाके साथ-ही-साथ स्त्रीभावको प्राप्त होता जा रहा हूँ !'

दो घड़ीतक विचार करनेके पश्चात् राजा शिखिध्वज इस प्रकार कहने लगे—'अहो ! दुःखकी बात है; ये कुम्भमुनि, जो महान् सत्त्वसम्पन्न थे, वे ही अब सुन्दरी स्त्री बन गये। साधुशिरोमणे ! आप तो तत्त्वज्ञानी हैं। दैवकी गति भी आपसे छिपी नहीं है; अतः इस अवश्यम्भावी घटनाके विषयमें विचार मत कीजिये। ये जो अवश्यम्भाविनी सुख-दुःखात्मक दशाएँ हैं सभी तत्त्वज्ञानियोंके केवल शरीरपर ही प्रभाव डाल पाती हैं, उनके अन्तःकरणपर नहीं; परंतु ये ही अविवेकियोंके केवल शरीरपर ही नहीं, अन्तःकरणतक पहुँच जाती हैं।'

कुम्भने कहा—राजन् ! ठीक है, ऐसा ही हो। अब मैं रात्रिके समय अपने स्त्री-भावको स्वीकार कर लेता हूँ और इसके लिये चिन्ता भी नहीं करूँगा; भला, दैव-का उल्लङ्घन कौन कर सकता है।

तदनन्तर जब प्रातःकाल हुआ, तब कुम्भने उस युवती स्त्रीके स्वरूपका परित्याग कर दिया और अपना वही कुम्भरूप धारण कर लिया। इस प्रकार वह राजरानी सुन्दरी चूडाला अपने पतिके पास पहले कुम्भरूपसे उपस्थित हुई, तत्पश्चात् स्त्रीरूप धारण करके आयी। वह रात्रिमें कुमारी-धर्मसे युक्त होकर और दिनमें कुम्भरूप धारण करके अपने मित्र एवं स्वामी शिखिध्वजके साथ वनप्रान्तोंमें विचरण करती थी। योगबलसे उसका गमनागमन कहीं रुकता नहीं था। इस प्रकार वह नारी चूडाला पुष्पमालाओं एवं हारोंसे विभूषित होकर अपने मित्र एवं प्रियतम पति-के साथ कैलास, मन्दर, महेन्द्र, सुमेरु और सह्याद्रिके शिखरोंपर स्वेच्छानुकूल विचरण करती थी।

(सर्ग १०४-१०५)