भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू०] * महेन्द्र पर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका (चूड़ाला)-शिखिध्वजका विवाह * ४८३

महेन्द्र पर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका (चूड़ाला) और शिखिध्वजका विवाह, एक सुन्दर कन्दरामें पुष्प-शय्यापर दोनोंका समागम, शिखिध्वजकी परीक्षाके लिये चूड़ालाद्वारा मायाके बलसे इन्द्रका प्राकट्य, इन्द्रका राजासे स्वर्ग चलनेका अनुरोध, राजाके अस्वीकार करनेपर परिवारसहित इन्द्रका अन्तर्धान होना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर कुछ ही दिनोंके बीतनेके बाद कुम्भरूपधारिणी सती चूड़ाला अपने स्वामी राजा शिखिध्वजसे इस प्रकार बोली—'कमलपत्रसदृश नेत्रोंवाले महाराज ! मेरी यह बात सुनिये। मैं प्रतिदिन रात्रिके समय स्त्री ही बनकर रहता हूँ, इसलिये मैं अपने इस प्रकारके स्त्री-धर्मको सफल बनाना चाहती हूँ। इसके लिये विवाहद्वारा अपनेको किसी योग्य पतिके हाथों सौंप देनेका मेरा विचार है। इस विषयमें त्रिलोकीमें केवल आप ही मुझे पतिरूपसे पसंद आ रहे हैं, अतः विवाह-विधिसे आप सर्वदा रात्रिके समय पत्नी-रूपमें मुझे स्वीकार कीजिये। राजन् ! चारों ओरसे सारी वस्तुओंमें इच्छा, अनिच्छा तथा तज्जनित फलका त्याग करके हमलोग इच्छा-अनिच्छासे रहित हो गये हैं अतः इस अभीष्ट कार्यको आप अवश्य सम्पन्न करें।

तब शिखिध्वज बोले—सखे ! इस विवाहकार्यके करनेसे मुझे शुभ अथवा अशुभ—किसी प्रकारके फल-की सम्भावना नहीं दीख रही है, अतः आपको जैसा रुचे, वैसा ही कीजिये।

कुम्भने कहा—महीपाल ! यदि ऐसी बात है तो आज यह श्रावणमासकी पूर्णिमा है, अतः आज ही शुभ लग्न है; क्योंकि कल ही मैंने विवाहसम्बन्धी सारी गणना कर ली थी। महाबाहो ! आज रातमें सम्पूर्ण कलाओंसे परिपूर्ण निर्मल चन्द्रमाके उदय होनेपर हम दोनोंका विवाह होगा। राजन् ! उठिये और हम दोनों वनके भीतरसे अपने विवाहके लिये चन्दन और पुष्प आदि सामग्री एकत्र करें।

यों कहकर कुम्भ उठे और राजा शिखिध्वजके साथ-साथ पुष्पोंको चुनने तथा सामग्रियोंके सङ्ग्रह करनेमें जुट गये। इस प्रकार एक सुन्दर गुफामें सारी विवाह-सामग्री जुटाकर वे दोनों प्रेमी मित्र मन्दाकिनी नदीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ नहा-धोकर उन दोनोंने देवताओं, पितरों और ऋषियोंका पूजन किया; क्योंकि जैसे उन्हें क्रियाजनित फलकी इच्छा नहीं थी, उसी प्रकार शास्त्रविहित क्रियाका त्याग भी उन्हें पसंद नहीं था। तदनन्तर कल्पवृक्षके उज्ज्वल दर्पणके समान वल्कल पहनकर तथा फल खाकर वे दोनों क्रमशः विवाह-स्थानमें आये। फिर सूर्यास्त होनेपर उन्होंने संध्या-वन्दनकी विधि पूरी की और मन्त्र-जप तथा अघमर्षण आदि भी किया। इतने-में ही कुम्भ स्त्रीरूपमें परिणत हो गये। तब वे सोचने लगे कि 'यह वधू तो मैं बन गया। अब मुझे अपना शरीर वरको दे देना चाहिये; क्योंकि समयोचित रूपका पालन अवश्य करना चाहिये। यह मैं वधू हूँ और आप मेरे मनोनीत वर सामने उपस्थित हैं। यह अपने पाणिग्रहणका समय है, अतः आइये और मुझे ग्रहण कीजिये।' यों विचारकर वह वरके समीप, जो सामने अगोष्ठीके निकट स्थित तथा उगते हुए सूर्यके समान तेजस्वी थे, गयी और यों बोली—'मानद ! मैं आपकी भार्या हूँ। मेरा नाम मदनिका है। मैं आपके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम करती हूँ। नाथ ! अब आप शास्त्रोक्त विधिके अनुसार अग्नि प्रज्वलित करके मेरा पाणिग्रहण कीजिये।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उन दोनोंने वेदीके समीप खड़े हुए स्तम्भोंको पुष्पसे लदी हुई लताओंसे सजाया। फिर उस वेदीके मध्यभागमें अग्निकी स्थापना करके उसे चन्दनकी लकड़ियोंसे प्रज्वलित किया। जब लपटें निकलने लगीं, तब दक्षिण-क्रमसे उस अग्नि-