संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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की प्रदक्षिणा की। तत्पश्चात् उस अग्निके सामने पल्लवके आसनपर वे पूर्वाभिमुख हो दोनों आसीन हो गये। उस समय उन दोनों वर-वधूकी अद्भुत शोभा हो रही थी। फिर शिखिध्वजने उठकर स्वयं ही उस कान्ता मदनिकाका पाणिग्रहण किया। उस समय उस वनमें उन दोनोंकी परस्पर शिव-पार्वतीके समान शोभा हो रही थी। फिर उस मङ्गलस्वरूप दम्पतीने उस अग्निकी प्रदक्षिणा की। उन दोनोंने परस्पर एक दूसरेको अपना हृदय, जो प्रेमके लिये लोलुप तथा सर्वोत्तम ज्ञानसे पूर्ण था, समर्पित कर दिया। उन्होंने अग्निकी तीन बार
प्रदक्षिणा की और उसमें लाजाहोम किया। इस प्रकार समान रूपसे संतुष्ट हुए वर-वधूने एक दूसरेद्वारा पकड़े गये अपने हाथको छुड़ा लिया। तदनन्तर उन दोनों प्रेमियोंने वहाँसे उठकर एक सुन्दर कन्दरामें, जिसका उन्होंने पहलेसे ही स्वयं निर्माण कर रखा था और जिसमें चमकीले दीपक जल रहे थे, प्रवेश किया। और वे दोनों पुष्पशय्यापर बैठ गये। फिर तो, परस्पर प्रेमभरे तरह-तरहके मनोहर वाग्विलासोंसे, समयोचित आलिङ्गन आदि कृत्योंसे, प्रेमयुक्त व्यवहारोंसे तथा नये-नये सुखोपभोगसे उस उत्तम दम्पतीकी वह लंबी रात एक मुहूर्त्तके समान बीत गयी।
रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार वे दोनों कुम्भ और शिखिध्वज उस महेन्द्राचलकी गुफामें स्वयं विवाहित होकर देवतुल्य परम प्रेमी दम्पती बन गये। दिनमें तो वे परम प्रेमी मित्र बन जाते थे और रातमें प्रिय पति-पत्नी हो जाते थे। प्रभा और दीपककी तरह वे परस्पर घुले-मिले रहते थे, अलग तो कभी होते ही नहीं थे। इस प्रकार जब धीरे-धीरे कुछ मास व्यतीत हो गये, तब देवपुत्रका स्वरूप धारण करनेवाली चूडालाने विचार किया कि अब मैं नाना प्रकारके उत्तम-उत्तम उपभोगोंद्वारा राजा शिखिध्वजकी परीक्षा करूँगी, जिससे इनका चित्त कभी भी भोगोंमें अनुरक्त नहीं होगा। ऐसा सोचकर चूडालाने अपनी मायाके बलसे उस वनस्थलीमें देवगणों तथा अप्सराओंके साथ पधारे हुए इन्द्रको दिखलाया। परिवारसहित इन्द्रको अपने निकट आया हुआ देखकर वनवासी राजा शिखिध्वज उनकी विधिवत् पूजा करके पूछने लगे।