भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 528

[निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजके क्रोधकी परीक्षा * ४८५

शिखिध्वज बोले—देवराज ! आपने इतनी दूरसे यहाँ आनेका कष्ट क्यों उठाया ? आप जिस प्रयोजनसे यहाँ पधारे हैं, उसे बतलानेकी कृपा कीजिये ।

इन्द्रने कहा—राजन् ! आपके गुणाधिक्यरूपी सूत्रने हमारे हृदयको बाँध रखा है, जिससे खिंचकर हम आकाश-से यहाँ आ गये हैं । महाराज ! अब उठिये और स्वर्ग चलिये; क्योंकि वहाँ यूथ-के-यूथ देवता तथा देवाङ्गनाएँ आपके गुणोंको सुनकर विस्मय-विमुग्ध हो रहे हैं और वे सब-के-सब आपके शुभागमनकी प्रतीक्षा में बैठे हैं । इसलिये आप पादुका, गुटिका, खड्ग और पारद आदि रसोंको भी लेकर सिद्धमार्गसे स्वर्गलोकमें चलना स्वीकार कीजिये । राजर्षे ! आप जीवन्मुक्त तो हैं ही, अतः देवलोकमें पधारकर आप अनेक प्रकारके भोगोंका उपभोग करें, इसी कारण मैं आपके पास आया हूँ । साधो ! आपके समान जो संत-महात्मा हैं, वे न तो प्राप्त हुई लक्ष्मीका तिरस्कारद्वारा अपमान करते हैं और न अप्राप्त-की कामना ही करते हैं । महात्मन् ! जैसे भगवान् नारायणके शुभागमनसे त्रिलोकी पवित्र हो जाती है, वैसे ही आप बिना किसी विघ्न-बाधाके स्वर्ग पधारें और वहाँ सुखपूर्वक विहार करें, जिससे वह स्वर्ग पवित्र हो जाय ।

शिखिध्वज बोले—देवेन्द्र ! मैं तो सभी देशोंको स्वर्ग-सा ही मानता हूँ; क्योंकि मैं जिस परमात्माको स्वर्ग मानता हूँ, उसकी सत्ता सदा सर्वत्र वर्तमान है; अतः मेरे लिये कहींपर भी एकदेशी स्वर्ग नहीं है । प्रभो ! मैं सभी जगह संतुष्ट रहता हूँ और सभी स्थानोंमें विचरण करता हूँ । मेरे मनमें किसी प्रकारकी इच्छा तो है नहीं, अतः मैं सर्वत्र आनन्दसे परिपूर्ण रहता हूँ । इन्द्र ! इन्हीं सब कारणोंसे एक स्थानमें स्थित रहनेवाले किसी ऐसे एकदेशी स्वर्गमें जानेकी तो मैं इच्छा ही नहीं करता । इसलिये मैं आपकी आज्ञाका पालन नहीं कर सकूँगा ।

इन्द्रने कहा—साधुशिरोमणे ! जिन्हें ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो गया है तथा जिनकी बुद्धि परिपूर्ण हो गयी है, उनके लिये भोगोंका उपभोग करना और न करना बराबर है; अतः आपके लिये भोगोंका सेवन करना उचित है । देवराज इन्द्रके यों कहनेपर भी जब राजा मौन ही रहे, तब इन्द्रने पुनः कहा—'राजन् ! जब आपकी ऐसी ही धारणा है, तब मैं ही यहाँसे चला जाता हूँ ।' यों कहकर 'राजन् ! आपका कल्याण हो' यह आशीर्वाद देते हुए इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये । देवराजके अदृश्य होते ही उनके साथका देवसमूह भी क्षणभरमें अदृश्य हो गया ।

( सर्ग १०६-१०७ )


राजा शिखिध्वजके क्रोधकी परीक्षा करनेके लिये चूड़ालाका मायाद्वारा राजाको जार-समागम दिखाना और अन्तमें राजाके विकारयुक्त न होनेपर अपना असली रूप प्रकट करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इन्द्र-दर्शनकी मायाका उपसंहार करके चूड़ाला मन-ही-मन विचार करने लगी—'बड़े सौभाग्यकी बात है, जो विषय-भोगोंकी लालसा इन नरेशके मनको आकृष्ट करनेमें समर्थ न हो सकी । इन्द्रके आनेपर भी ये निर्विकार शान्त ही रहे । इनके शरीरके अवयवोंकी स्थिति पूर्ववत् समान रही तथा बिना किसी प्रकारके क्षोभ एवं अवहेलनाके इन्होंने इन्द्रके साथ उचित व्यवहार भी किया । अतः अब मैं पुनः एक ऐसे मायाप्रपञ्चकी रचना करूँगी, जिसमें राग-द्वेषकी प्रधानता रहेगी और जो बुद्धिका अपहरण करनेवाला होगा । फिर उसके द्वारा आदर-पूर्वक इनकी परीक्षा करूँगी।' ऐसा निश्चय करके रात्रिमें चन्द्रोदय होनेपर उसने उस वनमें सुन्दरी मदनिकाका रूप धारण कर लिया । उस समय जब राजा शिखिध्वज