भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४८६ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

नदीके तटपर संध्यावन्दन तथा जप-कर्ममें तत्पर होकर ध्यानस्थ थे और शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु बह रही थी, तब मदनिका काम-मदसे विह्वल हुई-सी संतानक वृक्षोंके एक लताकुञ्जमें प्रविष्ट हुई। वह कुञ्ज सघन पुष्पगुच्छों-से सुशोभित था तथा वनदेवियोंके शुद्ध अन्तःपुर-सा प्रतीत होता था। वहाँ पुष्पहारोंसे सजी हुई मदनिकाने अपने संकल्पसे एक पुष्पशय्या तैयार की और उसपर मायानिर्मित एक सुन्दर जार पुरुषको लेकर उसके गलेसे लिपटकर लेट गयी।

उधर जपकर्म समाप्त होनेपर जब राजा शिखिध्वज उस स्थानसे उठे और एक कुञ्जसे दूसरे कुञ्जमें मदनिकाका अन्वेषण करने लगे, तब उन्हें उस लतागृहमें मदनिका दीख पड़ी। उसके गलेसे एक मनोहर जार पुरुष लिपटा हुआ था। उस पुरुषके कंधे लंबे केशोंसे आच्छादित थे और शरीरमें चन्दनका अनुलेप लगा हुआ था। उसके सिरकी सजावट शय्यापर इधर-उधरके परिवर्तन एवं परस्परके मर्दनसे अस्त-व्यस्त हो गयी थी। वह मदनिकाकी भुजाको, जिसकी कान्ति सुवर्णकी-सी थी तथा जो मोड़नेके कारण दो भुजा-सी लग रही थी, तकिया बनाकर उसपर अपना कान, नेत्रप्रान्त, कपोल और केश रखकर लेटा हुआ था। तदनन्तर राजाने पुनः देखा—उन दोनों स्त्री-पुरुषोंके मुख परस्पर एक-दूसरेसे सटे हुए हैं और उनपर मुसकराहत खेल रही है। शयन करते समय उनके पुष्पहार हिल रहे हैं। वे कामवेगसे आतुर और व्याकुल हैं। परस्पर आलिङ्गनके बहाने वे एक-दूसरेको अपना प्रेम समर्पित कर रहे हैं। वे एक दूसरेके उन्मुख, समान आनन्दसे परिपूर्ण तथा प्रबल काममदसे भरपूर हो गये हैं। यह सब देखकर भी राजा शिखिध्वजके मनमें जरा-सा भी क्रोध-विकार उत्पन्न नहीं हुआ, उलटे वे परम संतुष्ट हुए और कहने लगे—'अहो ! ये दोनों व्यभिचारी कैसे आनन्दमग्न हैं।' सहसा राजाको आया हुआ देखकर जब वे दोनों डर गये, तब राजाने कहा—

'तात ! भय मत करो। तुम दोनों स्वेच्छानुसार सुखपूर्वक जैसे सोये हो, वैसे ही सोये रहो। मैं इसमें विघ्न नहीं डालूँगा।' यों कहकर राजा वहाँसे चले गये।

तदनन्तर दो ही घड़ीके बाद चूडाला उस प्रपञ्चका उपसंहार करके लतागृहसे बाहर निकली। उस समय उसका शरीर प्रियतमके साथ सम्भोग करनेके कारण प्रफुल्लित दीख रहा था। बाहर आकर उसने देखा कि राजा शिखिध्वज एकान्तमें एक सुन्दर शिलापर बैठे हैं। उनकी समाधि लग गयी है, जिससे उनके नेत्र थोड़े खुले हुए हैं। तब सुन्दरी मदनिका राजाके निकट गयी और क्षणभरतक चुपचाप खड़ी रही। उस समय लज्जाके कारण उसका मुख नीचे झुक गया था और उसकी कान्ति मलिन हो गयी थी तथा मन खिन्न था। क्षणभरके बाद जब राजा शिखिध्वज ध्यानसे विरत हुए, तब मदनिकाको पास ही खड़ी देखा। उसे देखकर उनकी बुद्धिमें जरा-सा भी क्षोभ नहीं हुआ। वे उससे अत्यन्त मधुर वाणीमें कहने लगे—'सुन्दरि ! क्या किसीने शीघ्र ही तुम्हारे सुखमें विघ्न डाल दिया ! तुमने सुखका उपभोग तो किया है न ! (इसमें लज्जित होनेकी क्या बात है; क्योंकि) संसारमें जितने प्राणी हैं, वे सभी सुखके लिये ही तो प्रयत्न करते हैं। अतः तुम जाओ और पुनः अपनी प्रणयगर्भित चेष्टाओंसे अपने उस प्रियतमको संतुष्ट करो। मानिनि ! तुम्हारे इस कार्यसे मेरे मनमें किसी प्रकारकी उद्विग्नता नहीं है। यहाँ मेरे और कुम्भमें तो रागका लेशमात्र भी नहीं रह गया है, अतः हम दोनों तो वीतराग हो चुके हैं। तुम तो हमलोगोंसे भिन्न एक तीसरी नारी हो, जो महर्षि दुर्वासाके शापसे उत्पन्न हुई हो; अतः तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा ही करो।'

तब मदनिका बोली—महाभाग ! आपका कथन बिल्कुल सत्य है; परंतु मैं क्या करूँ, स्त्रियोंका स्वभाव ही बड़ा चञ्चल होता है। उनमें पुरुषोंकी अपेक्षा कामका