भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * राजा शिखिध्वजके क्रोधकी परीक्षा * ४८७

वेग भी आठगुना बताया जाता है; अतः आप मुझपर क्रोध न करें । महाराज ! जब आप संध्यावन्दन तथा जपकर्ममें रत हो गये, तब रात्रिके समय इस गहन काननमें उस कामी पुरुषने मुझे पकड़ लिया । उस समय मैं दीन अबला कर ही क्या सकती थी। राजन् ! स्त्रियोंका ऐसा स्वभाव ही होता है कि वे अपने कामवेगको रोक नहीं सकतीं। अतः प्राणनाथ ! एक तो मैं अबला नारी, दूसरे नवयुवती और मूढ़ हूँ; इसी कारण मुझसे यह महान् अपराध हो गया। अब आप मुझे क्षमा करें; क्योंकि क्षमा करना साधु पुरुषोंका स्वभाव ही होता है।

शिखिध्वजने कहा--बाले ! तुम्हारे इस कृत्यसे मेरे अन्तःकरणमें क्रोध तो तनिक-सा भी नहीं है, परंतु मैं अब तुम्हें अपनी वधूके रूपमें केवल इस कारणसे स्वीकार करना नहीं चाहता कि साधुपुरुष इस कर्मकी घोर निन्दा करेंगे। इसलिये भद्रे ! अब हम दोनों पहलेकी तरह मित्रभावसे वीतराग होकर वनप्रान्तोंमें नित्य साथ-साथ ही सुखपूर्वक विचरण करेंगे।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--रघुनन्दन ! इस प्रकार जब राजा शिखिध्वज समत्वभावमें स्थित हो गये, तब उन्हें रागद्वेषकी भावनाओंसे निर्मुक्त देखकर चूडालाका मन प्रसन्न हो गया और वह मन-ही-मन विचार करने लगी--'अहो ! ये राजा शिखिध्वज अब सर्वोत्कृष्ट समताको प्राप्त हो गये हैं। रागसे शून्य हो जानेके कारण अब इनमें क्रोधका लेशमात्र भी अवशिष्ट नहीं है। अब ये सचमुच जीवन्मुक्त हो चुके हैं। तभी तो जिन्हें स्वयं इन्द्र प्रदान कर रहे थे, वे उत्तमोत्तम भोग, इनको विचलित नहीं कर सके तथा बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ, सुख, दुःख, आपत्ति और सम्पत्ति भी इन्हें अपनी ओर आकृष्ट करनेमें समर्थ न हो सकीं । एक जीवन्मुक्तमें जितनी निर्दोष महान् ऋद्धियाँ बतायी जाती हैं, वे सब-की-सब इस समय अकेले इन्हींका आश्रय ले रही हैं, अतः ये दूसरे नारायणकी तरह जान पड़ते हैं । इसलिये अब मैं इस कुम्भरूपका परित्याग करके चूडाला ही बन जाऊँगी और इन्हें अपने सारे वृत्तान्तका स्मरण दिलाऊँगी।' योँ विचारकर चूडालाने तुरंत ही मदनिकाके शरीरको छोड़कर वहीं अपनेको चूडालाके रूपमें प्रकट कर दिया । उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो चूडाला मदनिकाके उसी शरीरसे निकली हैं । तत्पश्चात् वह योगधारणासे युक्त होकर राजाके सामने सुशोभित हुई । राजाने प्रेमपरवशताके कारण निर्दोष अङ्गोवाली उस कमनीया मदनिकामें ही अपनी प्रियतमा भार्या चूडालाके रूपमें स्थित देखा । उस समय चूडाला भूमितलसे प्रकट हुई लक्ष्मी (श्री) के समान सुशोभित हो रही थी तथा राकाचन्द्र में खिली हुई रातप्रभाकी भाँति उदीप्त हो रही थी । इस प्रकार राजा शिखिध्वजने अपनी प्राणप्रियाको सामने उपस्थित देखा ।

(सर्ग १०८)