संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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ध्यानसे सब कुछ जानकर राजा शिखिध्वजका आश्चर्यचकित होना और प्रशंसापूर्वक चूड़ालाका आलिङ्गन करना तथा उसके साथ रात बिताना, प्रातःकाल संकल्प-जनित सेनाके साथ दोनोंका नगरमें आना और दस हजार वर्षोंतक राज्य करके विदेहमुक्त होना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! तदनन्तर अपनी प्यारी पत्नी चूड़ालाको देखकर आश्चर्यके कारण राजा शिखिध्वजके नेत्र प्रफुल्लित हो उठे । तब वे आश्चर्ययुक्त वाणीसे इस प्रकार बोले—'सुन्दरि ! तुम अपने शरीरसे, व्यवहारसे, मन्द-मुसकानसे, अनुनय-विनयसे तथा पत्नीसम्बन्धी विलाससे ऐसी उपलक्षित हो रही हो, मानो मेरी भार्या चूड़ालाकी ही प्रतिमूर्ति हो।'
चूड़ालाने कहा—प्रभो ! हाँ, ऐसा ही समझिये, निस्सन्देह मैं चूड़ाला ही हूँ । आज मैंने अपने पहलेके स्वाभाविक शरीरसे साक्षात् आपको प्राप्त किया है । इस वनमें मैंने जो कुम्भ आदिके देहनिर्माणद्वारा माया-प्रपञ्च प्रकट किया था, वह तो केवल आपको प्रबुद्ध करनेके लिये ही था । महाराज ! जब आप मोहवश राज्यका परित्याग करके तपस्याके लिये वनमें चले आये, तभीसे मैं आपको ज्ञानसम्पन्न बनानेके लिये प्रयत्न कर रही थी । भूपते ! इस कुम्भवेषसे मैंने ही आपको प्रबुद्ध किया है। मैंने मायाद्वारा जो कुम्भ मदनिका आदिके शरीरका निर्माण किये थे, उसका एकमात्र प्रयोजन आपको प्रबुद्ध करना ही था । वास्तवमें कुम्भ आदि कुछ भी सत्य नहीं है । राजन् ! ( यदि मेरी बातोंपर विश्वास न आता हो तो ) अब तो आप जाननेयोग्य परमात्माको जान चुके हैं, अतः ध्यान लगानेसे आप यह सारा दृश्य अविकल रूपसे देख सकेंगे । इसलिये तत्त्वज्ञ ! अब शीघ्र ही ध्यान लगाकर देखिये ।
चूड़ालाके ऐसा कहनेपर राजा आसन लगाकर बैठ गये और ध्यानद्वारा उन्होंने अपना सारा वृत्तान्त अच्छी तरहसे जान लिया। मुहूर्तमात्रके ध्यानसे ही राजाने राज्य-परित्यागसे लेकर चूड़ालाके साक्षात्कारपर्यन्त अपने विषयमें जितनी घटनाएँ घटी थीं, उन सबको प्रत्यक्षरूपसे देख लिया । तत्पश्चात् समाधि भंग होनेपर हर्षातिरेकसे राजाके नेत्रकमल विकसित हो उठे, भुजाएँ रोमाञ्चके कारण उज्ज्वल हो गयीं । उन्होंने तुरंत ही दोनों ही भुजाओंको फैलाकर अपनी प्रियतमा पत्नी चूड़ालाका गाढ़ आलिङ्गन किया । उस समय स्नेह घनीभूत होकर टपक रहा था, आँखोंसे प्रेमाश्रु झर रहे थे और प्रेम स्फुरित हो रहा था । तदनन्तर शिखिध्वजने कहा—'प्रिये ! तुम बालचन्द्रमाके सदृश सुन्दरी हो, फिर भी तुमने अपने पतिके लिये चिरकालतक कितना दारुण कष्ट उठाया है । मैं इस दुस्तर भवकूपमें डूब रहा था,