भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 750 में से

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निर्वाण-प्रकरण पू०] * ध्यानसे सब कुछ जानकर राजा शिखिध्वजका आश्चर्यचकित होना * ४८९

तुम्ने अपनी जिस सत्त्वमयी बुद्धिके आश्रयसे मेरा उससे उद्धार किया है, तुम्हारी उस बुद्धिकी उपमा भला, किससे दी जा सकती है ! वह अनुपमेय है । सुन्दरि ! अलौकिक सौन्दर्यवाली नारियोंमें धी, श्री, कान्ति, क्षमा, मैत्री और करुणा आदि उत्तम रूपवती मानी जाती हैं; परंतु तुम तो उन सभीमें मुख्य प्रतीत हो रही हो । तुमने घोर प्रयत्न करके मुझे ज्ञानसम्पन्न बनाया है । इस उपकारके बदलेमें मैं ऐसा कौन-सा कार्य करूँ जिससे तुम्हारा मन प्रसन्न हो । प्रिये ! जो कुलीन स्त्रियाँ होती हैं, वे उद्योगपरायण होकर अनादि कालसे चले आते हुए अत्यन्त गहनमे भी गहन मोहरूपी सागरमें पड़े अपने पतिका उद्धार कर ही लेती हैं । यहाँतक कि कुलाङ्गनाएँ अपने पतिके लिये सखा, भ्राता, सुहृद्, भृत्य, शिक्षक, मित्र, धन, सुख, शास्त्र, घर, दास आदि सब कुछ बन जाती हैं । अतः जिनमें इहलोक तथा परलोक—दोनोंका सम्पूर्ण सुख प्रतिष्ठित है, उन कुलाङ्गनाओंका सभी प्रयत्नोंद्वारा सर्वदा सम्यक्‌रूपसे आदर-सत्कार करना चाहिये । रूप, सौजन्य और उत्तमोत्तम गुणरूपी रत्नोंसे विभूषित प्रिये ! तुम पतिव्रता सती हो । तुम्हारी सारी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं और तुम संसार-सागरसे पार हो चुकी हो—ऐसी दशामें तुम्हारे इस उपकारका प्रतिशोध मैं कैसे कर सकूँगा ?'

तब चूडाला बोली—पतिदेव ! बारंबार शुष्क क्रियाजालमें फँसकर जब आपका आत्मा व्याकुल हो जाता था, तब उसे देखकर मैं आपके लिये अत्यन्त चिन्तातुर हो जाती थी; इसलिये आपके आत्माको ज्ञानसम्पन्न बनाकर मैंने अपना ही तो स्वार्थ सिद्ध किया है—( अपनी चिन्ताका तो नाश किया ही । इसमें आपका क्या उपकार किया । ) आप तो व्यर्थ ही इस बातको लेकर मेरी प्रशंसा कर रहे हैं ।

शिखिध्वजने कहा—वरारोहे ! ठीक है, तुम जिस प्रकारके शुभ स्वार्थका सम्पादन कर रही हो, वैसा ही स्वार्थ सभी कुलाङ्गनाएँ सिद्ध करें ।

चूडाला बोली—देव ! 'यह करूँ, यह न करूँ, इसे प्राप्त करूँ' इस प्रकारकी बुद्धिकी कपट-दम्भजनित कोमलतारूप जो स्थिति थी, उसका आप ज्ञान होने अंदर उपहास करते हैं ! क्योंकि जैसे आकाशमें पतंग नहीं दीख पड़ते, उसी प्रकार आपमें ये पहलेके तुच्छ तृष्णाओंका समूह तथा दुर्मिन संकल्परूपी कल्पनाएँ अब दृष्टिगोचर नहीं हो रही हैं । विप्रवर ! अब आपका कैसा स्वरूप बन गया है ! किस वस्तुमें आपकी निष्ठा है और आप क्या चाहते हैं ! विभो ! आप अपनी पिछली शारीरिक चेष्टाओंको कैसा देखते हैं !

शिखिध्वजने कहा—प्रिये ! जिस-जिसके अंदर तुम हो, उसी-उसीके अंदर मैं उपस्थित हूँ । मैं इच्छा और स्पृहासे तथा एकदेशतासे रहित हो गया हूँ, आकाशके समान निर्मल हूँ, शान्त हूँ और वास्तविक परमात्मस्वरूप परमात्मा हूँ । अमरलोचने ! मैं समस्त वस्तुओंकी निष्ठामें मुक्त एकमात्र चिन्मय परमात्मस्वरूप हूँ । पतिव्रते ! जो 'तत्' वस्तु—सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वही मैं हूँ । इसके अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं कह सकता । मयूर-सदृश चञ्चल कटाक्षवाली प्रिये ! तुम मेरी गुरु हो, अतः मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ । तुम्हारी ही कृपासे मैं इस भवसागरसे पार हो पाया हूँ । अब मैं शान्त, अपने आत्मस्वरूपमें स्थित, कोमल, प्रशान्तधी, उत्पत्ति और एकदेशतासे रहित, सर्वव्यापक और वास्तवरूपसे सर्वथा निर्मल आकाशकी तरह स्थित हूँ ।

चूडाला बोली—प्राणनाथ ! आप शोकहीन ज्ञान-सम्पन्न तथा मेरे हृदयवल्लभ हैं । आपकी बुद्धि शान्त है, प्रभो ! बतलाइये, ऐसी दशामें अब आप क्या चाहते हैं ?

शिखिध्वजने कहा—शुभदृष्टे ! जितने दृश्य और

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