भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति * ४६१


और ग्रामोंको देखते हुए तथा अपना सारा वृत्तान्त एवं तदन्तर्गत घटनास्थल अपनी प्रिया चूडालाको दिखाते हुए थोडे ही समयके बाद अपनी पुरीमें जा पहुँचे, जो स्वर्गके समान शोभायमान हो रही थी।

वहाँ पहुँचनेपर जय-जयकारके तुमुल नादसे जब राजाके सम्मानित सामन्तोंको पता लगा कि महाराज पधार रहे हैं, तब वे उनके स्वागतके लिये सेना लेकर नगरसे बाहर निकले। उस समय तुरहीके तुमुल नादसे निनादित हुई दोनों सेनाएँ एकमेक हो गयीं। तत्पश्चात् राजा शिखिध्वजने उन दोनों सेनाओंके साथ नगरमें प्रवेश किया। उस समय नगरकी नारियों मञ्जरोंसे उनपर अञ्जलि भर-भरकर लाजा और पुष्पोंकी वर्षा कर रही थीं। राजा शिखिध्वज व्यापारियोंके मार्गोंसे, जो दृष्ट्मोत्सव परम रमणीय था, देखते हुए राजमहलमें प्रविष्ट हुए। वह महल ध्वजा-पताकाओंसे खूब सजाया गया था और राजाके योग्य सारी माङ्गलिक वस्तुओंसे सन्नद्ध था। वहाँ राजाने नमस्कार करते हुए प्रजावर्गका भलीभाँति सम्मान किया। इस प्रकार सात दिनोंतक नगरमें बड़े धूमधामके साथ उत्सव मनाकर राजा अपने अन्तःपुरमें निवास करते हुए अपने राज्यका पालन करने लगे।

श्रीराम ! इस प्रकार भूतलपर चूडालाके साथ दस हजार वर्षोंतक राज्य करनेके पश्चात् राजाका देहावसान हो गया। वे महाबुद्धिमान् नरेश इस शरीरको त्यागकर परमपदरूप निर्वाणको प्राप्त हो गये।

श्रीराम ! राजा शिखिध्वजके भय और विषाद नष्ट हो गये थे। मान और मात्सर्यसे वे रहित हो गये थे तथा वे न्याययुक्त प्राप्त शास्त्रोक्त सात्त्विक कर्मोंका सम्पादन करनेवाले थे। भोगोंमें उनकी वैराग्यबुद्धि हो गयी थी और वे सबमें समरूप ब्रह्मदृष्टिसे युक्त हो गये थे। इस प्रकार उपर्युक्त बोधके द्वारा उन्होंने मृत्युको—द्वन्द्व-दशाओंको जीतकर दस हजार वर्षोंतक एकच्छत्र राज्य किया था।

(सर्ग १०९-११०)


बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति, मिथ्यापुरुपरी आख्यायिका और उसका तात्पर्य

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह शिखिध्वज-की कथा मैंने तुमसे आद्योपान्त कह दी। श्रीराम ! राजा शिखिध्वजने जिस प्रकार व्यवहार करते हुए राज्य किया, उसी प्रकार तुम भी राज्य-व्यवहार करो। शिखिध्वजकी तरह ही बृहस्पतिके पुत्र कचने भी ज्ञान प्राप्त किया था।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! बृहस्पतिके पुत्र समस्त वैभवोंसे परिपूर्ण कचने किस क्रमसे ज्ञान प्राप्त