संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
किया था, उस क्रमको संक्षेपमें मुझसे कहिये ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! देवताओंके आचार्य बृहस्पति के पुत्र श्रीमान् कचने राजा शिखिध्वजकी तरह ही सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त किया था । इसकी कथा तुम सुनो। कचका अभी बाल्यकाल समाप्त ही हुआ था और ज्यों ही यौवन आरम्भ हुआ. त्यों ही वह संसार-सागरको तर जानेके लिये कटिबद्ध हो गया । वह पद और पदार्थका यथार्थ ज्ञाता था । वह अपने पिता बृहस्पतिसे कहने लगा—
कचने कहा—भगवन् ! सब धर्मोंका ज्ञान रखनेवाले पिताजी ! मैं इस संसाररूपी जालसे कैसे बाहर निकल सकता हूँ, यह आप बताइये ।
बृहस्पति बोले—पुत्र ! अनर्थरूप हजारों मगरोंके निवासस्थान इस संसार-सागरसे किसी प्रकारके उद्वेगके बिना किये गये सर्व-त्यागसे तत्काल ही प्राणी बाहर निकल जा सकता है ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! अपने पिताका यह परम पवित्र वचन सुनकर कच सब कुछ परित्याग करके एकान्त वनमें चला गया । पुत्रके चले जानेसे बृहस्पतिको चित्तमें जरा भी उद्वेग नहीं हुआ; क्योंकि जो महान् होते हैं, उनका मन संयोग और वियोग—दोनोंमें सुमेरु पर्वतके सदृश अचल रहता है । वनमें जानेके अनन्तर उसे जब आठ वर्ष व्यतीत हो गये, तब किसी महारण्यमें उस कचने अपने पिताजीका दर्शन किया । कचने पहले अपने पिताजीकी विधिपूर्वक पूजा की, फिर उन्हें प्रणाम किया । बृहस्पतिने भी अपने पुत्रका आलिङ्गन किया । इसके बाद कचने अत्यन्त मधुर वाणीमें बृहस्पतिसे कहा—
कचने कहा—पिताजी ! मैंने जो सर्व-त्याग किया है, उसका आज यद्यपि आठवाँ वर्ष है, तथापि मुझे अभीतक निर्मल शान्ति प्राप्त नहीं हुई ।
श्रीवसिष्ठजी बोले — श्रीराम ! कच अरण्यमें इस प्रकार दीन वचन बोल ही रहा था कि 'सभीका त्याग करो' यों कहकर बृहस्पति आकाशमें जाकर अदृश्य हो गये । बृहस्पतिके चले जानेके अनन्तर कचने अपने शरीरपरसे वल्कल आदिका भी परित्याग कर दिया और शरत् कालके आकाशकी तरह वह दिगम्बर हो गया । वह अनावृत दिशाओंमें रहने लगा । उसका शरीर शान्त और सुन्न हो गया था तथा वह श्वासमात्र ले रहा था । तीन वर्षके बाद खिन्न-चित्त उसने किसी एक जंगलमें फिर अपने गुरु उन्हीं पिताजीका दर्शन किया । भक्तिसे उसने अपने पिताजीका पूजन-अभिवादन आदि किया । पिताने भी अपने पुत्रका आलिङ्गन किया । इसके अनन्तर कच दुःखित होकर गद्गद वाणीसे पूछने लगा ।
कचने कहा—पिताजी ! मैंने सबका त्याग कर दिया, कन्था, दण्ड, कमण्डलु आदिका भी त्याग कर दिया । तथापि अपने आत्मपदमें मेरी स्थिति नहीं हुई । अब मैं क्या करूँ ?
बृहस्पति बोले—पुत्र ! चित्त ही सब कुछ है; अतः उसीका त्यागकर तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओ । सर्वज्ञ लोग चित्तत्यागको ही सर्वत्याग कहते हैं ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा- - श्रीराम ! पुत्रसे ऐसा कहकर बृहस्पति शीघ्रतासे आकाशमें उड़ गये । इसके अनन्तर अन्तःकरणसे खेद निकालकर वह कच त्यागके उद्देश्यसे चित्तकी खोज करने लगा । खोज करनेपर भी जब उसे चित्तकी प्राप्ति नहीं हुई, तब उसने विवेक-पूर्वक विचार किया कि 'देह आदि जो भी कुछ ये प्रसिद्ध पदार्थ हैं, वे तो चित्त नहीं कहे जा सकते और उनमें चित्त कहाँ रहता है, इसका भी निरूपण नहीं हो सकता । इसलिये बेचारे अपराधशून्य देह आदिका मैं व्यर्थ ही क्यों त्याग करूँ ! इस परिस्थितिमें अब चित्तरूप महाशत्रुको जाननेके लिये पिताजीके पास