भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 750 में से

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पृष्ठ 536

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति * ४९३


ही जाता हूँ। उनसे जानकर मैं उसका त्याग करूँगा। तदनन्तर शीघ्र ही समस्त शोकोंसे मुक्त हो जाऊँगा।'

रघुवर ! ऐसा विचारकर वह कच स्वर्गमें चला गया तथा बृहस्पतिके पास जाकर उसने स्नेहपूर्वक वन्दना और प्रणाम किया। फिर, एकान्तमें उसने उनसे पूछा—'भगवन् ! चित्त क्या है ? इसका आप मुझे उपदेश दीजिये और चित्तका स्वरूप भी बतलाइये, जिससे कि मैं उसका त्याग करूँ।'

बृहस्पतिने कहा—आयुष्मन् ! चित्त-तत्त्वज्ञ महानुभाव अपने अहंकारको ही चित्त जानते हैं; अतः प्राणीका जो यह भीतरी अहंभाव है, वही चित्त कहा जाता है।

कचने कहा—तैतीस करोड़ देवताओंके गुरु ! महामते ! अहंभाव ही चित्तरूप कैसे हो सकता है, उसे मुझसे कहिये। योगियोंमें श्रेष्ठ ! मैं तो मानता हूँ कि इसका त्याग इतना असम्भव-सा है कि किसी प्रकार सिद्ध हो ही नहीं सकता। इसलिये इसका त्याग कैसे होगा ?

बृहस्पतिने कहा—पुत्र ! अहंकाररूप चित्तका त्याग तो फूलोंके मर्दनसे भी और नेत्रोंके मींचनेसे भी अत्यन्त सुलभ है; अतः इसके त्यागमें तनिक भी क्लेश नहीं है। तनय ! इसका त्याग जिस उपायसे सुगम होता है, वह उपाय मैं तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो। जो वस्तु केवल अज्ञानसे उत्पन्न होती है, उसका परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे विनाश हो जाता है। पुत्र ! जैसे मिथ्या भ्रम कुछ वस्तु नहीं है, वैसे ही अहंकार भी वास्तवमें कुछ है ही नहीं। अज्ञानियोंकी दृष्टिसे यह उसी प्रकार असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, जिस प्रकार बालकोंकी दृष्टिसे असत् बेताल प्रतीत होता है। जैसे रज्जुमें भ्रान्तिसे बिना हुए ही साँप दिखायी पड़ता है, जैसे मरुभूमिमें बिना हुए ही जल दिखायी पड़ता है, वैसे ही अज्ञानसे अहंकार भी मिथ्या ही प्रतीत होता है। जैसे चन्द्रमा एक ही है; परंतु नेत्र-दोषसे मिथ्या ही दो दिखायी देता है, वैसे ही यह अहंकार अज्ञानसे ही दिखायी देता है। यह अज्ञानसे प्रतीत होता है; इसलिये तो असत्य नहीं है, और वास्तवमें है नहीं; इसलिये सत्य नहीं है। एक, आदि और अन्तसे रहित, चैतन्यमात्र, सभी ओरसे निर्मल, शरदाकाशसे भी अत्यन्त स्वच्छ सर्वानुभवरूप परमात्मा ही सत्य वस्तु है। सभी जगह और सभी प्राणियोंमें निरपेक्ष सब ओरसे प्रकाश करनेवाला वही एक चिन्मात्रस्वरूप परमात्मा उसी प्रकार प्रकाशित होता है, जिस प्रकार समुद्रकी चञ्चल अनन्त तरङ्गोंमें जल। विचारपूर्वक विचार करना चाहिये कि यह अहंकार नामकी कौन वस्तु है और किस प्रकार किससे उत्पन्न हुई है ? अज्ञानके कारण ही यह प्रतीत होता है; अतः मिथ्या है। इसलिये पुत्र ! यह देह आदि मैं हूँ, इस प्रकार परिमितताका और देश-कालसे परिच्छिन्न निष्कल विश्रामको

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