भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 537

५९४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

छोड़ दो। तुम तो देश, काल आदि परिच्छेदोंसे शून्य, स्वच्छ, निरन्तर उदय-स्वभाव, व्यापक, सब पदार्थोंके रूपसे भासमान, निर्मल, अद्वय केवल सच्चिदानन्दमय हो। तुम सर्वदा ही अत्यन्त विशुद्ध, अनन्त, नित्य चिन्मय परमात्मा हो। कच! सत्स्वरूप तुम्हारा यह अहंभाव क्या वस्तु है? अर्थात् कुछ नहीं है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! देवगुरु बृहस्पतिसे अपनी आत्माको परमात्माके साथ एकरूपतासे सम्पन्न करानेवाला उत्तमोत्तम इस प्रकारका परम उपदेश पाकर उनका पुत्र कच जीवन्मुक्त हो गया। जिस प्रकार बृहस्पतिका पुत्र कच ममता और अहंकाररहित, अज्ञानमूलक जडचेतनकी ग्रन्थिसे रहित और परम शान्तबुद्धि होकर ब्रह्ममें स्थित रहा, उसी प्रकार तुम भी निर्विकार होकर स्थित रहो। इस अहंकारको तुम असत् समझो; क्योंकि मिथ्या खरगोशके सींगोंका त्याग और ग्रहण क्या? तुम एकदेशी नहीं हो। संकल्परहित, सर्वभावरूप सर्वव्यापी, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, मनसे रहित केवल सच्चिदानन्दघन-स्वरूप हो। निष्पाप श्रीराम ! यह मायामय सम्पूर्ण जगत् अज्ञानसे तो सत्-सा दिखायी पड़ता है और ज्ञानसे वह सब ब्रह्मरूप ही है; क्योंकि यह अत्यन्त गाढ़, जो संसारकी माया है, उसका पार पाना यद्यपि अत्यन्त कठिन है, तथापि जैसे शरद् ऋतुसे कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही यह माया परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे तुरंत नष्ट हो जाती है।

श्रीरामजीने कहा—गुरुवर ! ज्ञातव्य तत्त्वके ज्ञानसे तृप्त हुआ भी मैं आपसे यह प्रश्न पूछता हूँ। भला बतलाइये तो सही कि कौन ऐसा प्राणी है, जो तृप्त होता हुआ भी सामने रखे हुए अमृतरूपी पेयको न पीयेगा? मुनिश्रेष्ठ ! मुझसे शीघ्र यह बतलाइये कि मिथ्यापुरुष नामकी कौन वस्तु है, जिसने सत्य वस्तु ब्रह्मको असत्य-सा बना रखा है और असत्य वस्तु समस्त जगत्‌को सत्य-सा बना डाला है?

श्रीवसिष्ठजी बोले—राघव ! मिथ्यापुरुषको जाननेके लिये यह सुन्दर हास्यप्रद आख्यायिका तुम सुनो, जो मेरे द्वारा कही जाती है। महाबाहो ! कोई एक माया-यन्त्रमय पुरुष था। वह केवल बालकके सदृश तुच्छबुद्धि, मूढ़ और अज्ञानसे आवृत था। वह किसी एक निर्जन एकान्त प्रदेशमें उत्पन्न हुआ था और उसी शून्य प्रदेशमें रहता था। वह वास्तवमें आकाशमें नेत्रदोषसे दिखायी पड़नेवाले केशोंके झुंड-सदृश और मरुभूमिमें मृगतृष्णाजलके सदृश मिथ्या ही था। वहाँ वृद्धिको प्राप्त हुए उस मिथ्यापुरुषके मनमें यह संकल्प हुआ कि मेरी प्रियसे प्रिय वस्तु आकाश है, अतः उसे कहीं-पर रखकर स्वयं मैं ही उसकी बड़े आदरसे रक्षा करूँ। इस प्रकार विचार करके आकाशकी रक्षाके लिये उसने एक घरका निर्माण किया। रघुनन्दन ! तदनन्तर उस घरके अंदर उसने यह आस्था बाँध ली कि यह आकाश मेरा है और इसकी मैंने रक्षा की है और उस गृहाकाशसे वह सन्तुष्ट हो गया। इसके अनन्तर कुछ कालके बाद वह उसका घर नष्ट हो गया। जब वह नष्ट हो गया, तब मिथ्यापुरुष इस प्रकार शोक करने लगा—'हा गृहाकाश, तुम नष्ट हो गये, अरे ! तुम एक ही क्षणमें कहाँ चले गये। हा हा ! तुम टूट गये। तुम बड़े अच्छे थे।'

इस प्रकार सैकड़ों बार शोक कर फिर उस दुर्बुद्धि मिथ्यापुरुषने वहाँपर आकाशकी रक्षा करनेके लिये एक कूपका निर्माण किया और उसी कूपाकाशकी रक्षामें तत्पर होकर संतुष्ट हो गया। कुछ समयके बाद उसका वह कूप भी नष्ट हो गया। जब कूपाकाशका नाश हो गया, तब वह महान् शोक-सागरमें निमग्न हो गया। कूपाकाशके लिये शोक कर चुकनेके अनन्तर उसने तत्काल ही एक घड़ेका निर्माण किया और घटाकाशकी रक्षामें तत्पर होकर संतुष्ट हो गया। रघुकुलश्रेष्ठ ! कालसे उसका वह घट भी नष्ट हो गया। भाग्यहीन जिस किसी दिशाका ग्रहण करता है, वही नष्ट हो जाती