संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति * ४१५
है। घड़ेके आकाशका शोक कर लेनेके बाद उसने आकाशकी रक्षाके लिये कुण्डका निर्माण किया और पहले-की तरह ही कुण्डाकाशकी रक्षाके लिये तत्पर होकर संतुष्ट हो गया। कुछ कालके बाद उसका कुण्ड भी उसी प्रकार विनाशको प्राप्त हो गया, जिस प्रकार तेजसे अन्धकारका नाश हो जाता है। कुण्डाकाशके विषयमें भी उसने महान् शोक किया। कुण्डके आकाशका शोक करनेके बाद उसने आकाशकी रक्षाके लिये एक ऐसे घेरेका निर्माण किया, जिसमें चारों ओर कमरे तथा बीचमें एक बड़ा कमरा था, फिर उसीके आकाशकी रक्षामें तन्मय होकर वह संतुष्ट हो गया। जिसने अनेक प्रजाओंका ग्रास कर लिया है, समयपर वह काल इस घरको भी खा गया। उससे भी वह शोक-निमग्न हो गया। उस चतुःशाल घरके शोकके बाद उसने आकाशकी रक्षाके लिये मेघाकार कुसूल (कोठार) बनाया और फिर उसीके आकाशकी रक्षामें निरत हो संतुष्ट हो गया। उसके उस कुसूलको भी कालने वैसे अपहृत कर दिया, जैसे वायु मेघको अपहृत कर लेता है। उस कुसूल-विनाशके शोकसे वह अत्यन्त सन्तप्त हो गया। इस प्रकार घर, चतुःशाल, कुण्ड और कुसूल आदिसे आकाशकी रक्षा करते हुए उस मिथ्यापुरुषका यह कभी समाप्त न होनेवाला काल बीतता ही जाता था। श्रीराम! इस प्रकार गहन घर, कूप, कुण्ड आदि उपाधियोंसे आकाशको आत्मबुद्धिसे पकड़कर स्थित हुआ वह मिथ्यापुरुष गमनागमनकी आसक्तिसे मूढ़ और विवश होकर एक दुःखसे अति कठिन दूसरे दुःखमें आता और जाता रहता है।
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—प्रभो! मिथ्यापुरुषके प्रसंगसे आपने जिस मायामय पुरुषका कथन किया, वह किस अभिप्रायसे किया है और उसके द्वारा किये गये आकाश-रक्षणका भी क्या अभिप्राय है, यह मुझसे कहिये।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम! सुनो। अभी जो मैंने मिथ्यापुरुषकी कथा तुमसे कही है, उसका यथार्थ तात्पर्य तुमसे प्रकट करता हूँ। रघुनन्दन! मैने मन्दकल्पनासे जिस मिथ्यापुरुषका उस कथामें उल्लेख किया है, उसे तुम अहंकार ही जानो। वह शून्य आकाशमें मायासे उत्पन्न हुआ है। जिस मायामय आकाशके एक कोनेमें यह जगत् स्थित है, वह स्वयं सृष्टिके आदिमें भी असमीचीन, असत् और शून्यरूप ही रहता है। उस मायाकाशके अंदर प्राणियोंसे अत्यन्त अगम्य परब्रह्म परमात्मा विराजमान हैं और उसी ब्रह्मरूप मायाकाशसे प्रारम्भमें अहंकारका वैसे ही उदय होता है, जैसे आकाशमे शब्द और वायुसे स्पन्दनका उदय होता है। यह अहंकार ही पूर्वोक्त कथाका मायापुरुष है और वही मिथ्यापुरुष है; क्योंकि मायासे जो अहंकार उत्पन्न हुआ है, वह असत्य एवं मिथ्यारूप ही है। कुँआ, कुण्ड, चतुःशाल, घड़ा आदि शरीरोंकी रचना कर मैने उनके सम्बन्धकी रक्षा की—यों अहंकारने ही आकाशमें संकल्प किया था। जगदाकाररूप विभ्रमोंसे यह अहंकार ही जीवात्माको मोहित करता है। उस व्यापक, शून्य, अनन्ताकाशस्वरूप ब्रह्ममें यह जगत् निश्चय ही मिथ्या है। उसीमें यह अहंकाररूप पुरुष मिथ्या ही सुख-दुःखोंका अनुभव करता हुआ स्थित था। श्रीराम! आकाशमें नाशवान्की रक्षा करते हुए उस मिथ्यापुरुषने घट आदिका निर्माण कर उनके आकाशोंका रक्षण करनेमें अनेक बारके क्लेशोंका ही अनुभव किया था। जो आत्मा है, वह तो सब प्रकारसे भी बड़ा है, परम शुद्ध है, अत्यन्त सूक्ष्म है, परम कल्याणरूप तथा शुभ है। उसको कौन पकड़ सकता है और कौन उसकी रक्षा कर सकता है? जैसे घट आदिके विनष्ट हो जानेपर घटस्थित आकाशका नाश नहीं होता, वैसे ही देहोंके नष्ट होनेपर भी नित्य जीवात्माका कभी विनाश नहीं होता; क्योंकि यह आत्मा शुद्ध, केवल, चिन्मय तथा अहंकारसे रहित है॥