संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अत्यन्त सूक्ष्म तथा अहंकारसे रहित नित्य स्वप्रकाशरूप चेतन ही है; इसलिये आकाशके समान उसका नाश नहीं होता। वास्तवमें तो कहीं, किसी समय न कुछ उत्पन्न होता है और न मरता ही है, केवल ब्रह्म ही जगत्के रूपमें प्रकाशित हो रहा है। आदि, मध्य,और अन्तसे तथा उत्पत्ति और विनाशसे रहित वह परमात्मा एक, अद्वितीय, सत्य, परमपदस्वरूप और शान्तिमय है।
(सर्ग १११, ११२, ११३)
सब कुछ ब्रह्म ही है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टिके आदिकालमें परब्रह्मसे यह संकल्प-विकल्पात्मक समष्टि मन उत्पन्न हुआ। वह उस परब्रह्ममें स्थित हुआ ही अनेक भिन्न-भिन्न कल्पनाओंका निमित्त बनकर आजतक विद्यमान है। जैसे फूलोंमें सुगन्ध, सागरमें बड़े-बड़े तरङ्ग और सूर्यमें किरणें स्वाभाविक ही रहती हैं, वैसे ही ब्रह्ममें मन भी स्वाभाविक ही रहता है। किंतु राघव ! जो पुरुष इन किरणोंकी आदित्यसे अलग भावना करता है, उस पुरुषके लिये ये किरणे, आदित्यसे अलग ही हैं। जिसने केयूरकी सुवर्णसे पृथक्रूपसे भावना की, उसकी दृष्टिमें सुवर्णसे पृथक् ही केयूर प्रतीत होता है; क्योंकि उसकी भावनामें केयूर सुवर्ण नहीं है। परंतु जिसने किरणोंकी आदित्य-स्वरूपसे ही भावना की, उसकी दृष्टिमें वे किरणें आदित्यरूप ही ठहरती हैं और वह यह कहता है कि आदित्य रश्मिभेदोंसे शून्य ही है यानी आदित्य और किरणोंका परस्पर कोई भेद नहीं है। जिसने तरङ्गकी जलभिन्नरूपसे भावना की, उसमें एकमात्र तरङ्ग-बुद्धि ही स्थित रहती है, जल-बुद्धि नहीं। किंतु जो पुरुष तरङ्गकी जलरूपतासे भावना करता है उसे सामान्य जल-बुद्धि ही होती है। ऐसा पुरुष जल और तरङ्गके भेदसे निर्मुक्त निर्विकल्पक कहा जाता है। जो पुरुष केयूर स्वर्णसे भिन्न नहीं है, ऐसी भावना करता है, वह सामान्य स्वर्ण-बुद्धिवाला भेदशून्य निर्विकल्प कहा जाता है। ज्वालापङ्क्ति अग्निसे भिन्न है, जो पुरुष ऐसी भावना करता है उसे अग्नि-बुद्धि उत्पन्न नहीं होती, केवल ज्वाला-बुद्धि ही रहती है।
किंतु ज्वालाकी पङ्क्ति अग्निसे भिन्न नहीं है, इस प्रकार जो भावना करता है उसको केवल अग्नि-बुद्धि ही रहती है और उसे निर्विकल्पक कहा जाता है। जो पुरुष निर्विकल्प है, वही महान् है। उसकी बुद्धि कभी क्षीण नहीं होती, सदा एकरस रहती है। उसने प्राप्तव्य वस्तु परमात्माको प्राप्त कर लिया। इसलिये वह सांसारिक पदार्थोंमें कभी नहीं फँसता। स्वप्रकाश स्वयं आत्मा ही अपने आप जब संकल्प करता है, तब वह आत्मा ही भिन्नकी तरह भासनेवाला संकल्पात्मक मन हो जाता है। फिर मन ही अपनी विश्वाकार आकृतिक़ी भावना कर लेता है। वह विश्वाकार संकल्पस्वरूप चित्त इस जगत्की जिस रूपसे कल्पना करता है, तत्क्षण हीं संकल्पोंसे वह तद्रूप हो जाता है। यह जो जगद्रूप विशाल आकार देखा जाता है, सब मनका संकल्प ही है। वह सत्य तो इसलिये नहीं है कि वह वास्तवमें संकल्परूप होनेके कारण मिथ्या है और सर्वथा सत्य इसलिये नहीं कहा जाता कि वह प्रतीत होता है। किंतु स्वप्नोंके सदृश अनिर्वचनीय ही उत्पन्न हुआ है; क्योकि वह स्वप्नके संसार-जालके समान है। जैसे साधारण प्राणीके मनका संकल्प विविध सामग्री-रचनाओंसे सुन्दर लगता है, वैसे ही हिरण्यगर्भका भी यह व्यापक मनका संकल्प सुन्दर लगता है। 'जगत् परब्रह्म-स्वरूप है' इस प्रकारकी भावना करनेपर यह जगत् ब्रह्ममें विलीन हो जाता है। वास्तवमें तो यदि देखा जाय, तो यह जगत् कुछ भी नहीं है। किंतु यदि इस जगत्को अपरमार्थतः देखा जाय, तो यह