संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता, महात्यागीके लक्षण-निरूपण * ४१७
हजारों शाखा-प्रशाखाओंमें विभक्त हो जाता है। अतः तुम जो कुछ करते हो, उसे निर्मल चिन्मय ब्रह्म ही समझो; क्योंकि ब्रह्म ही जगत्के रूपमें वृद्धिको प्राप्त हो रहा है। इसलिये उस ब्रह्मसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। (सर्ग ११४)
भृङ्गीशके प्रति महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागीके लक्षणोंका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! किसी समयकी बात है कि सुमेरु पर्वतके अग्निसदृश उत्तरीय शिखर-पर अपने समस्त परिवारके साथ भगवान् शङ्कर विराजमान थे। अपने परिवारके साथ बैठे हुए उमापतिसे साधारण आत्मज्ञान रखनेवाले महान् तेजस्वी विनम्र भृङ्गीशने, जो वहींपर उपस्थित था, अञ्जलि बाँधकर पूछा—'महाराज ! इस क्षणभङ्गुर जगद्रूपी घरके अंदर विश्रामसुखसे किस आन्तरिक निश्चयका अवलम्बन करके मैं समग्र चिन्ताओंसे मुक्त होकर निश्चलरूपसे स्थित रह सकता हूँ ?'
भगवान् शङ्कर बोले—अनघ ! तुम समस्त शङ्काओंसे रहित होकर अविनाशी अचल धैर्यका अवलम्बन कर महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी हो जाओ।
भृङ्गीशने कहा—प्रभो ! ऐसे वे कौन-से लक्षण हैं, जिनकी प्राप्ति हो जानेपर पुरुष महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी कहा जा सकता है, उन्हें मुझसे भली-भाँति कहिये।
भगवान् शङ्कर बोले—महाभाग ! अहंता, पाप और मात्सर्यसे रहित जो मननशील पुरुष उद्वेगसे रहित हो शास्त्रविहित क्रियाओंका अनुष्ठान करता है, वह महाकर्ता कहा जाता है। जो कहींपर भी स्नेह नहीं रखता, जो साक्षीके सदृश निर्विकार रहता है और जो न्याययुक्त प्राप्त कार्यका निष्कामभावसे आचरण करता है, वह पुरुष महाकर्ता कहा जाता है। उद्वेग और हर्षसे रहित जो पुरुष निर्मल समबुद्धिसे शोकजनक परिस्थितियोंमें शोक नहीं करता और हर्षजनक परिस्थितियोंमें हर्ष नहीं करता, वह महाकर्ता कहा जाता है। जो ज्ञानवान् मुनि अपने प्रारब्धसे जिस समय जो भी कोई न्यायविहित कार्य प्राप्त हो जाय, उस समय उस कार्यको रागद्वेष-रहित हो करता है, वह महाकर्ता कहा जाता है। जन्म, स्थिति और विनाशमें तथा उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंमें जिसका मन सम ही रहता है, वह महाकर्ता कहा जाता है।
जो किसीसे द्वेष नहीं करता, जो किसीकी अभिलाषा नहीं करता और जो प्रारब्धके अनुसार न्याययुक्त प्राप्त हुए सारे पदार्थोंका उपभोग करता है, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष अहंकारसे रहित और परमात्मामें स्थित होनेके कारण न्यायपूर्वक इन्द्रियोंसे विषयोंका ग्रहण करता हुआ भी ग्रहण नहीं करता, कर्मोंका आचरण करता हुआ भी आचरण नहीं करता एवं पदार्थोंका उपभोग करता हुआ भी उपभोग नहीं करता, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष बुद्धिको विरसतासे रहित होकर साक्षीके सदृश समस्त लोकव्यवहारोंका किसी इच्छाद्वेषके बिना अनुभव करता है, वह पुरुष महाभोक्ता कहा जाता है। जैसे समुद्र नाना नदियोंके जलको सम-रूपसे ग्रहण करता है, वैसे ही जो मनुष्य समतासे बड़े-बड़े सुख-दुःखोंको समानरूपसे सहन करता है, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष मधुर, खट्टे, नमकीन, तीते, मीठे, खारे, रूखे या सुस्वादु भोजनके प्राप्त अन्नको समान बुद्धिसे ग्रहण करता है—वह महाभोक्ता कहा जाता है।