भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

४९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अत्यन्त सूक्ष्म तथा अहंकारसे रहित नित्य स्वप्रकाशरूप चेतन ही है; इसलिये आकाशके समान उसका नाश नहीं होता। वास्तवमें तो कहीं, किसी समय न कुछ उत्पन्न होता है और न मरता ही है, केवल ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें प्रकाशित हो रहा है। आदि, मध्य,और अन्तसे तथा उत्पत्ति और विनाशसे रहित वह परमात्मा एक, अद्वितीय, सत्य, परमपदस्वरूप और शान्तिमय है।

(सर्ग १११, ११२, ११३)


सब कुछ ब्रह्म ही है—इसका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टिके आदिकालमें परब्रह्मसे यह संकल्प-विकल्पात्मक समष्टि मन उत्पन्न हुआ। वह उस परब्रह्ममें स्थित हुआ ही अनेक भिन्न-भिन्न कल्पनाओंका निमित्त बनकर आजतक विद्यमान है। जैसे फूलोंमें सुगन्ध, सागरमें बड़े-बड़े तरङ्ग और सूर्यमें किरणें स्वाभाविक ही रहती हैं, वैसे ही ब्रह्ममें मन भी स्वाभाविक ही रहता है। किंतु राघव ! जो पुरुष इन किरणोंकी आदित्यसे अलग भावना करता है, उस पुरुषके लिये ये किरणे, आदित्यसे अलग ही हैं। जिसने केयूरकी सुवर्णसे पृथक्रूपसे भावना की, उसकी दृष्टिमें सुवर्णसे पृथक् ही केयूर प्रतीत होता है; क्योंकि उसकी भावनामें केयूर सुवर्ण नहीं है। परंतु जिसने किरणोंकी आदित्य-स्वरूपसे ही भावना की, उसकी दृष्टिमें वे किरणें आदित्यरूप ही ठहरती हैं और वह यह कहता है कि आदित्य रश्मिभेदोंसे शून्य ही है यानी आदित्य और किरणोंका परस्पर कोई भेद नहीं है। जिसने तरङ्गकी जलभिन्नरूपसे भावना की, उसमें एकमात्र तरङ्ग-बुद्धि ही स्थित रहती है, जल-बुद्धि नहीं। किंतु जो पुरुष तरङ्गकी जलरूपतासे भावना करता है उसे सामान्य जल-बुद्धि ही होती है। ऐसा पुरुष जल और तरङ्गके भेदसे निर्मुक्त निर्विकल्पक कहा जाता है। जो पुरुष केयूर स्वर्णसे भिन्न नहीं है, ऐसी भावना करता है, वह सामान्य स्वर्ण-बुद्धिवाला भेदशून्य निर्विकल्प कहा जाता है। ज्वालापङ्क्ति अग्निसे भिन्न है, जो पुरुष ऐसी भावना करता है उसे अग्नि-बुद्धि उत्पन्न नहीं होती, केवल ज्वाला-बुद्धि ही रहती है।

किंतु ज्वालाकी पङ्क्ति अग्निसे भिन्न नहीं है, इस प्रकार जो भावना करता है उसको केवल अग्नि-बुद्धि ही रहती है और उसे निर्विकल्पक कहा जाता है। जो पुरुष निर्विकल्प है, वही महान् है। उसकी बुद्धि कभी क्षीण नहीं होती, सदा एकरस रहती है। उसने प्राप्तव्य वस्तु परमात्माको प्राप्त कर लिया। इसलिये वह सांसारिक पदार्थोंमें कभी नहीं फँसता। स्वप्रकाश स्वयं आत्मा ही अपने आप जब संकल्प करता है, तब वह आत्मा ही भिन्नकी तरह भासनेवाला संकल्पात्मक मन हो जाता है। फिर मन ही अपनी विश्वाकार आकृतिक़ी भावना कर लेता है। वह विश्वाकार संकल्पस्वरूप चित्त इस जगत्की जिस रूपसे कल्पना करता है, तत्क्षण हीं संकल्पोंसे वह तद्रूप हो जाता है। यह जो जगद्रूप विशाल आकार देखा जाता है, सब मनका संकल्प ही है। वह सत्य तो इसलिये नहीं है कि वह वास्तवमें संकल्परूप होनेके कारण मिथ्या है और सर्वथा सत्य इसलिये नहीं कहा जाता कि वह प्रतीत होता है। किंतु स्वप्नोंके सदृश अनिर्वचनीय ही उत्पन्न हुआ है; क्योकि वह स्वप्नके संसार-जालके समान है। जैसे साधारण प्राणीके मनका संकल्प विविध सामग्री-रचनाओंसे सुन्दर लगता है, वैसे ही हिरण्यगर्भका भी यह व्यापक मनका संकल्प सुन्दर लगता है। 'जगत् परब्रह्म-स्वरूप है' इस प्रकारकी भावना करनेपर यह जगत् ब्रह्ममें विलीन हो जाता है। वास्तवमें तो यदि देखा जाय, तो यह जगत् कुछ भी नहीं है। किंतु यदि इस जगत्को अपरमार्थतः देखा जाय, तो यह

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता, महात्यागीके लक्षण-निरूपण * ४१७

हजारों शाखा-प्रशाखाओंमें विभक्त हो जाता है। अतः तुम जो कुछ करते हो, उसे निर्मल चिन्मय ब्रह्म ही समझो; क्योंकि ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें वृद्धिको प्राप्त हो रहा है। इसलिये उस ब्रह्मसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। (सर्ग ११४)


भृङ्गीशके प्रति महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागीके लक्षणोंका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! किसी समयकी बात है कि सुमेरु पर्वतके अग्निसदृश उत्तरीय शिखर-पर अपने समस्त परिवारके साथ भगवान् शङ्कर विराजमान थे। अपने परिवारके साथ बैठे हुए उमापतिसे साधारण आत्मज्ञान रखनेवाले महान् तेजस्वी विनम्र भृङ्गीशने, जो वहींपर उपस्थित था, अञ्जलि बाँधकर पूछा—'महाराज ! इस क्षणभङ्गुर जगद्रूपी घरके अंदर विश्रामसुखसे किस आन्तरिक निश्चयका अवलम्बन करके मैं समग्र चिन्ताओंसे मुक्त होकर निश्चलरूपसे स्थित रह सकता हूँ ?'

भगवान् शङ्कर बोले—अनघ ! तुम समस्त शङ्काओंसे रहित होकर अविनाशी अचल धैर्यका अवलम्बन कर महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी हो जाओ।

भृङ्गीशने कहा—प्रभो ! ऐसे वे कौन-से लक्षण हैं, जिनकी प्राप्ति हो जानेपर पुरुष महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी कहा जा सकता है, उन्हें मुझसे भली-भाँति कहिये।

भगवान् शङ्कर बोले—महाभाग ! अहंता, पाप और मात्सर्यसे रहित जो मननशील पुरुष उद्वेगसे रहित हो शास्त्रविहित क्रियाओंका अनुष्ठान करता है, वह महाकर्ता कहा जाता है। जो कहींपर भी स्नेह नहीं रखता, जो साक्षीके सदृश निर्विकार रहता है और जो न्याययुक्त प्राप्त कार्यका निष्कामभावसे आचरण करता है, वह पुरुष महाकर्ता कहा जाता है। उद्वेग और हर्षसे रहित जो पुरुष निर्मल समबुद्धिसे शोकजनक परिस्थितियोंमें शोक नहीं करता और हर्षजनक परिस्थितियोंमें हर्ष नहीं करता, वह महाकर्ता कहा जाता है। जो ज्ञानवान् मुनि अपने प्रारब्धसे जिस समय जो भी कोई न्यायविहित कार्य प्राप्त हो जाय, उस समय उस कार्यको रागद्वेष-रहित हो करता है, वह महाकर्ता कहा जाता है। जन्म, स्थिति और विनाशमें तथा उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंमें जिसका मन सम ही रहता है, वह महाकर्ता कहा जाता है।

जो किसीसे द्वेष नहीं करता, जो किसीकी अभिलाषा नहीं करता और जो प्रारब्धके अनुसार न्याययुक्त प्राप्त हुए सारे पदार्थोंका उपभोग करता है, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष अहंकारसे रहित और परमात्मामें स्थित होनेके कारण न्यायपूर्वक इन्द्रियोंसे विषयोंका ग्रहण करता हुआ भी ग्रहण नहीं करता, कर्मोंका आचरण करता हुआ भी आचरण नहीं करता एवं पदार्थोंका उपभोग करता हुआ भी उपभोग नहीं करता, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष बुद्धिको विरसतासे रहित होकर साक्षीके सदृश समस्त लोकव्यवहारोंका किसी इच्छाद्वेषके बिना अनुभव करता है, वह पुरुष महाभोक्ता कहा जाता है। जैसे समुद्र नाना नदियोंके जलको सम-रूपसे ग्रहण करता है, वैसे ही जो मनुष्य समतासे बड़े-बड़े सुख-दुःखोंको समानरूपसे सहन करता है, वह महाभोक्ता कहा जाता है। जो पुरुष मधुर, खट्टे, नमकीन, तीते, मीठे, खारे, रूखे या सुस्वादु भोजनके प्राप्त अन्नको समान बुद्धिसे ग्रहण करता है—वह महाभोक्ता कहा जाता है।

४९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

काम्य कर्म, निषिद्ध कर्म, सुख, दुःख, जन्म और मृत्युका जिसने विवेकपूर्वक सर्वथा त्याग कर दिया है, वह महात्यागी कहा जाता है। सम्पूर्ण इच्छाओं, समस्त संशयों, वाणी, मन और शरीरकी सभी चेष्टाओं तथा सम्पूर्ण सांसारिक निश्चयोंका जिस पुरुषने विवेक-पूर्वक सर्वथा त्याग कर दिया है, वह महात्यागी कहा जाता है। यह जितनी भी सम्पूर्ण दृश्यरूप मनकी कल्पना दिखायी दे रही है, उसका जिस पुरुषने अच्छी तरहसे त्याग कर दिया है, वह महात्यागी कहा जाता है।

'निष्पाप श्रीराम ! देवदेवेश भगवान् शङ्करने बहुत दिन पहले भृङ्गीशको इस तरहका उपदेश दिया था।

श्रीराम ! सदा प्रकाशमान, निर्मलस्वरूप, आदि और अन्तसे शून्य केवल परब्रह्म ही है, ब्रह्मसे अतिरिक्त कुछ भी पदार्थ नहीं है; क्योंकि इस संसारमें जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब कुछ कल्पोंके कार्यका एकमात्र मूल कारण निर्विकार परमात्मस्वरूप परब्रह्म ही है। वह परमात्मा बड़े-बड़े अनेक सर्गोसे विशाल आकारवाला होनेपर भी वास्तवमें आकाशके समान निराकार ही है। कहींपर कुछ भी पदार्थ, फिर चाहे वह स्थूल हो, सूक्ष्म हो अथवा कारणरूप हो,—सदा एकरस परब्रह्मसे भिन्न किसी तरह नहीं हो सकता; इसलिये तुम 'मैं सद्रूप ब्रह्म हूँ,' इस प्रकारका अपने अंदर निश्चय करके स्थित रहो।

(सर्ग ११५)


सर्वथा विलीन हुए या विलीन होते हुए अहंकार-रूप चित्तके लक्षण

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—सर्वधर्मज्ञ ! भगवन् ! अहंकार नामक चित्त जिस समय सर्वथा विलीन हो जाता है या विलीन होने लग जाता है, उस समयके वासनारहित अन्तःकरणका क्या स्वरूप होता है ?

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! वासनारहित अन्तः-करणको बलपूर्वक उत्पन्न हुए भी—लोभ, मोह आदि दोष वैसे ही लिप्त नहीं कर सकते, जैसे कमलपत्रको जल लिप्त नहीं कर सकते। अहङ्कार नामक चित्त और पापके विलीन हो जानेपर पुरुष सदा शान्त प्रसन्नमुख रहता है। उस समय साधककी वासनाओंका समूह छिन्न-भिन्न-सा होकर धीरे-धीरे बिल्कुल क्षीण होने लग जाता है। क्रोध और मोहका क्षय होने लगता है। काम और लोभ चले जाते हैं। इन्द्रियाँ और दुःख विकसित नहीं होते। ये सुख-दुःख आदि प्रतीत होनेपर भी, तुच्छ होनेके कारण, उस साधकके मनको लिप्त नहीं कर सकते। चित्तके विलीन हो जानेपर उस श्रेष्ठ साधक पुरुषकी देवतागण भी प्रशंसा करते हैं। उस पुरुषके हृदयमें शीतल चाँदनीरूपी समता उत्पन्न होती है। ऐसा श्रेष्ठ साधक पुरुष उपशान्त, कमनीय, सेव्य, अप्रतिरोधी (दूसरेकी इच्छाका विघात न करनेवाला), विनीत, बलशाली और स्वच्छ श्रेष्ठ शरीरवाला होकर रहता है। जो बुद्धिकी तीक्ष्णतासे प्राप्त करने योग्य है और जिसकी प्राप्ति होनेपर समस्त आपत्तियाँ अस्त हो जाती हैं, उस परमात्म-वस्तुमें जो मनुष्य मोहके कारण प्रवृत्त नहीं होता, उस नराधमको धिक्कार है। श्रीराम ! दुःखरूपी रत्नोंकी खानि और जन्म-मरणरूप संसार-सागरके पार होनेकी इच्छावाले पुरुषको निरतिशयानन्दमय परमात्मामें नित्य निरन्तर समुचित विश्राम पानेके लिये 'मैं कौन हूँ' 'यह जगत् क्या है, परमात्मतत्त्व कैसा है ? इन तुच्छ भोगोंसे कौन-सा फल मिलेगा ?' इन प्रश्नोंपर विवेकपूर्वक विचार करना चाहिये। यही परम साधन है। इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त साधनका आश्रय लेना चाहिये।

(सर्ग ११६)

निर्वाण-प्रकरण पू०]    * महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति उपदेश *    ४९९


महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति, 'मैं कौन हूँ, यह जगत् क्या है'—यह बताते हुए देहमें आत्मबुद्धिका परित्यागकर परमात्मभावमें स्थित होनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— श्रीराम ! तुम्हारे वंशके आदिपुरुष इक्ष्वाकु नामक राजा जिस प्रकारके विवेकपूर्वक विचारसे मुक्त हो गये, उस विचारको तुम सुनो। अपने राज्यका परिपालन करते हुए इक्ष्वाकु नामक राजा किसी समय एकान्तमें जाकर अपने मनमें स्वयं यह विवेकपूर्वक विचार करने लगे कि 'बुढ़ापा, मृत्यु, क्षोभ, सुख, दुःख तथा भ्रमसे युक्त इस दृश्य-प्रपञ्चका हेतु क्या है।' इस प्रकार विचार करते हुए भी वे जब जगत्के कारणको न समझ सके, तब उन्होंने एक दिन ब्रह्मलोकसे आये हुए सभामें बैठे तथा पूजित हुए अपने पिता प्रजापति मनुसे पूछा।

इक्ष्वाकुने कहा— भगवन् ! आपकी दया ही आपसे पूछनेके लिये मुझे प्रेरित कर रही है। करुणानिधे ! 'यह सृष्टि कहाँसे आयी है, इसका स्वरूप कैसा है तथा कब किसने इसकी रचना की है ?' यह आप कहिये। भगवन् ! विस्तृत जालमें फँसे हुए पक्षीकी भाँति मैं इस विषम संसारजालसे किस प्रकार मुक्त हो सकूँगा ?'

मनु बोले— राजन् ! तुम्हारे अंदर सुन्दर विकासयुक्त विवेकका उदय हुआ है, तभी तुमने यह प्रश्न किया है। यह प्रश्न किया मिथ्या संसारजालका उच्छेद करनेवाला तथा सब प्रश्नोंका सार है। महीपते ! यह जो कुछ जगत् दिखायी दे रहा है, वस्तुतः कुछ भी नहीं है। यह आकाशमें प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरकी भाँति तथा मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मिथ्या है। किन्तु जो अविनाशी परब्रह्म है, वही 'सत्' और 'परमात्मा' इत्यादि नामोंसे कहा जाता है। उस परमात्मारूप दर्पणमें यह दृश्यरूप जगत् प्रतिबिम्बकी तरह प्रतीतिमात्र है। इसलिये वस्तुतः संसारमें न तो किसीका बन्धन है और न मोक्ष है। केवल एकमात्र सब विकारोंसे शून्य ब्रह्म ही है। जैसे समुद्रमें एक ही जल अनेक तरङ्गोंके रूपमें प्रतीत होता है, उसी तरह एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही जगत्के अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है। उस ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, इसलिये राजन् ! तुम द्वन्द्व और शोकसे रहित होकर निर्भय-पदरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाओ।

अज्ञानकी उपाधिसे युक्त जीव कर्मानुसार सुख-दुःख भोगते हुए अनेक योनियोंमें भ्रमण करते रहते हैं। किन्तु वास्तवमें सुख-दुःख और मोह आदि चित्तके धर्म ही होते हैं, आत्मामें नहीं। परमेश्वर न तो ग्रन्थोंके स्वाध्यायद्वारा और न गुरुके द्वारा ही दिखायी देता है, वह तो अपनी सुप्रसन्न-श्रद्धायुक्त पवित्र और स्थिर बुद्धिसे ही अपने आप दिखायी देता है। इसलिये जैसे मार्गमें राग-द्वेषरहित बुद्धिसे पथिक दौड़े जाते हैं, वैसे ही अपनी राग-द्वेषरहित बुद्धिसे ही इस अपनी इन्द्रिय आदिका अवलोकन करना चाहिये। अपनी बुद्धिमें देहादि पदार्थमात्रका दृश्य ही त्यागकर अपने अन्तःकरणको शान्तिमय बनाकर नित्य परमात्ममय हो जाओ। 'मैं ही देह हूँ' यह बुद्धि संसारमें फँसानेवाली है। इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको इस प्रकारकी बुद्धिको कभी नहीं अपनाना चाहिये। 'मैं सब पदार्थोंमें भी सूक्ष्मतर सच्चिदानन्दघन हूँ'— ऐसी जो निष्प्रपञ्च बुद्धि है, वह संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाली है। जैसे केयूर, कड़े, कुण्डल आदि जाम्बूनदके भूषण सुवर्णके रूप ही हैं, वैसे इस प्रपञ्चके कार्यरूप जगत्का उपादान जो परमात्माका संकल्प होनेसे परमात्मा ही है। इसलिये अनात्म देहादि दृश्यसमूहोंमें आत्मभावका त्यागकर अन्तःकरणको वासनारहित करके, परमात्मामें अपना अनायास अखण्ड निवास हो। जैसे केवल जल-प्रवाह ही फेन, बुद्बुद और तरङ्ग आदिके रूपमें विभिन्न आकारोंमें दिखायी देता है, वैसे ही जगत् भी ब्रह्मरूप ही है।

५००* अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सच्चिदानन्द ब्रह्म ही नाना प्रकारके आकारोंमें प्रकट होता है । वत्स ! तुम सङ्कल्परूपी कलङ्कोंसे रहित चित्तको परमात्मामें स्थापित करके कर्म करते हुए भी कर्त्तापनके अभिमानसे रहित, शान्त और सुखपूर्वक ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित हुए राज्य-पालन करो ।

जैसे चन्द्र, सूर्य, अग्नि, तप्तलोह एवं रत्न आदिके प्रकाश, वृक्षोंके पत्ते तथा झरनोंके कण कल्पित हैं, वैसे ही इस ब्रह्ममें जगत् तथा बुद्धि आदि भी कल्पित ही हैं तथा वही ब्रह्म जगद्रूप होकर अज्ञानियोंके लिये दुःखप्रद हो रहा है। अहो ! विश्वको मोहमें डाल देनेवाली यह माया कैसी विचित्र है, जिसके कारण संपूर्ण अङ्गोंमें भीतर और बाहर सब जगह व्याप्त परमात्माको यह जीव नहीं देख सकता । इसलिये अहंकारसे रहित निर्मल सात्त्विक अन्तःकरणसे 'सभी पदार्थ निराकार सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है'--ऐसी भावना करे । 'यह रमणीय है और यह रमणीय नहीं है'--इस प्रकारकी भावना ही तुम्हारे दुःखका कारण है। वह भावना जब सर्वत्र समदृष्टिरूपी अग्निसे जल जाती है, तब कहीं भी दुःखका नामोनिशान भी नहीं रह जाता । निर्वासनारूप अस्त्रसे प्रियाप्रिय-रूप विषमताको परम पुरुषार्थके द्वारा तुम स्वयं ही काट डालो । राजन् ! तुम निर्वासनारूप अस्त्रसे वासनारूप कर्म-वृक्षको काटकर सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर ब्रह्मभाव प्राप्तकर शोकरहित हो जाओ। पुत्र ! तुम सदसद्वस्तुके विवेकरूप विचारसे युक्त होकर समस्त कल्पनाओंसे रहित हो जाओ तथा समस्त विशाल भुवनोंको परमात्माके स्वरूपसे परिपूर्ण समझो । तदनन्तर जन्म-मरणरूप रोगसे रहित होकर परब्रह्म परमात्माके आनन्दका अनुभव करते हुए दीर्घकालतक स्थिर रहो और समता तथा शान्तिसे युक्त होकर निर्मथ चेतन ब्रह्मस्वरूप बन जाओ ।

( सर्ग ११७-११९ )


सात भूमिकाओंका, जीवन्मुक्त महात्मा पुरुषके लक्षणोंका एवं जीवको संसारमें फँसानेवाली और संसारसे उद्धार करनेवाली भावनाओंका वर्णन करके मनु महाराजका ब्रह्मलोकमें जाना

मनु महाराजने कहा-राजन् ! सबसे पहले शास्त्र और सज्जनोंकी संगतिसे अपनी बुद्धि शुद्ध और तीक्ष्ण करनी चाहिये । यही योगीके योगकी पहली भूमिका कही गयी है । इसका नाम 'श्रवण' भूमिका है। सच्चिदानन्द ब्रह्मके स्वरूपका निरन्तर चिन्तन करना 'मनन' नामक दूसरी भूमिका है । संसारके संगसे रहित होकर परमात्माके ध्यानमें नित्य स्थित रहना 'निदिध्यासन' नामक तीसरी भूमिका है। जिसमें वासनाका अत्यन्त अभाव है, वह ब्रह्म-साक्षात्कारसे अज्ञान आदि निखिल प्रपञ्चकी निवृत्ति करनेवाली 'विलापनी' नामकी चौथी भूमिका है। इस 'ब्रह्मवित्' पुरुषको संसार स्वप्नवत् प्रतीत होता है । विशुद्ध चिन्मय आनन्दस्वरूपकी प्राप्ति पाँचवीं भूमिका है । इस भूमिकामें जीवन्मुक्त पुरुष आधे सोये या जागे हुए पुरुषके सदृश रहता है। अर्धसुप्त पुरुषको संसारकी जैसी प्रतीति होती है, वैसी ही इस 'ब्रह्मविद्वर' जीवन्मुक्त पुरुषको होती है। छठी भूमिकामें एक विज्ञानानन्दघन परमात्माका ही अनुभव रहता है, संसारका अनुभव ही नहीं रहता । जैसे सुषुप्ति अवस्थामें मनुष्यको संसारकी प्रतीति नहीं होती, वैसे ही इस 'ब्रह्मविद्वरीयान्' योगीको जाग्रत् अवस्थामें भी संसारकी प्रतीति नहीं होती । इसे स्वसंवेदनरूप शान्तिमय 'तुर्यावस्था' कहते हैं । केवल विदेह-मुक्तिरूप अवस्था ही सप्तम भूमिका है। यह अवस्था समता, स्वच्छता और सौम्यतारूप है*। (इस


* शास्त्रसज्जनसम्पर्कैः प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।
प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिनः ॥
विचारणाद्वितीया स्यात्तृतीयाऽसङ्गभावना ।
विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ॥
शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी ।
अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवन्मुक्तोऽत्र तिष्ठति ॥

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सात भूमिकाका, जीवन्मुक्त महात्मा पुरुषके लक्षण आदिका वर्णन ५०१

तुर्यातीत सप्तम भूमिकामें स्थित योगीको 'ब्रह्मविद्वरिष्ठ' कहते हैं। इसमें गाढ़ सुषुप्तिकी तरह संसारका अत्यन्त अभाव हो जाता है। छठी भूमिकामें स्थित योगीको तो दूसरेके द्वारा जगाये जानेपर प्रबोध होता है। किंतु सातवीं भूमिकामें स्थित योगी मुर्देकी भाँति दूसरेके द्वारा जगाये जानेपर भी नहीं जागता; क्योंकि वह जीता हुआ ही मुर्देके तुल्य है। वह जीता है तो भी थोड़े समय ही जीता है। मरनेपर उसकी आत्मा ब्रह्ममें विलीन हो जाती है, तब उसको भी विदेहमुक्त कहते हैं। यह तुर्यातीत अवस्था परम मुक्तिरूप है।

इन सातोंमें जो पहलेकी तीन भूमिकाएँ हैं, वे जाग्रद्रूप ही हैं और जो चौथी भूमिका है वह तो स्वप्न ही कही गयी है; क्योंकि उसमें जगत् स्वप्नके सदृश प्रतीत होता है। आनन्दके साथ एकात्मभाव हो जानेसे पाँचवीं भूमिका अर्ध-सुषुप्तरूप है तथा अन्य पदार्थोंके ज्ञानसे रहित एकमात्र स्वसंवेदनरूप छठी भूमिका तुर्य शब्दसे कही जाती है। तुर्यातीत शब्दसे कहलानेवाली अवस्था सातवीं भूमिका सबसे अन्तिम है। यह अवस्था मन और वाणीसे परे है तथा केवल स्वप्रकाश परब्रह्मरूप ही है। राजन्! इस सप्तम भूमिकाके अवलम्बनसे सब दृश्योंको ब्रह्ममें विलीन करके तुम यदि दृश्यके चिन्तनसे रहित हो जाओगे तो निश्चय ही मुक्त हो जाओगे, इसमें सन्देह नहीं; क्योंकि जिसकी बुद्धि भोगों और सुख-दुःखोंसे लिपायमान नहीं होती, वही पुरुष जीवन्मुक्त है। 'मैं जीवन-मरण, सत्-असत् सबसे रहित हूँ'— इस प्रकार जो मनुष्य आत्माराम होकर स्थित रहता है, वह जीवन्मुक्त कहा गया है। मनुष्य व्यवहार करे चाहे न करे, गृहस्थ हो चाहे अकेला विचरण करनेवाला

स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका।
आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थितिः ॥
तुर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम्।
समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ॥
(नि० पू० १२० । १–५)

यदि हो, परंतु 'मैं वास्तवमें कुछ भी नहीं हूँ, केवल सच्चिदानन्द ब्रह्म ही हूँ' ऐसा निश्चय करनेसे सदा शोकसे मुक्त ही रहता है। 'मैं निर्लेप, अजर, राग-रहित, वासनाओंसे शून्य, शुद्ध अनन्त चिन्मय ब्रह्म हूँ'—ऐसा मानकर पुरुष सदाके लिये शोकसे मुक्त हो जाता है। 'मैं अन्त और आदिसे रहित, शुद्ध-बुद्ध, अजर-अमर और शान्त हूँ तथा सभी पदार्थोंमें समरूपसे स्थित हूँ'— ऐसा मानकर पुरुष सदाके लिये शोकसे परे हो जाता है। क्षीण वासनासे युक्त हो या सर्वथा वासनासे रहित होकर जो पुरुष जिस अर्थका सेवन करता है वह अर्थ उस पुरुषके लिये न सुखजनक होता है और न दुःखजनक ही होता है। अनघ ! वासनारहित बुद्धिसे जो कर्म किया जाता है, वह कर्म जले हुए बीजके सदृश रहता है। वह फिर अङ्कुर उत्पन्न नहीं करता अर्थात् भावी जन्मको देनेवाला नहीं होता। देह, इन्द्रिय आदि जो भिन्न- भिन्न करण हैं, उन्हींके द्वारा कर्म किये जाते हैं। ऐसी स्थितिमें जीवात्मा कर्ता नहीं है, इसलिये भोक्ता भी नहीं है। यह परमात्म-विषयक ज्ञानकी वृत्ति यदि भीतर एक बार उत्पन्न हो जाय तो उर्वराभूमिमें बोये गये धानके सदृश अनिवार्यरूपसे दिन-पर-दिन बढ़ती ही जाती है।

राजन्! व्यष्टिचेतनको जबतक विषयभोगकी अभिलाषा बनी रहती है, तभीतक उसकी 'जीव'-संज्ञा है। यह अभिलाषा भी अज्ञानके कारण ही है। जब यथार्थ ज्ञानसे विषयभोगकी अभिलाषा नष्ट हो जाती है, तब यह व्यष्टि- चेतन जीवत्वरहित और निर्विकार होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। राजन् ! कर्मानुसार ऊपरके लोकसे नीचेके लोकमें तथा नीचेके लोकसे ऊपरके लोकमें दीर्घकालतक आवागमन करते हुए तुम संसाररूपी अरहट्टकी चिन्तारूपी रज्जुमें घड़ेके सदृश मत बनो। 'ये पुत्र-कलत्र आदि मेरे हैं और मैं इन पुत्र-कलत्र आदिका हूँ' इस प्रकारके व्यवहाररूपी दृढ़ भ्रमका जो शठ मोहसे सेवन करते हैं, वे नीचीसे भी नीची योनिको

५०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्राप्त होते हैं। 'पुत्र-कलत्र आदिका मैं सम्बन्धी हूँ और पुत्र, कलत्र आदि परिवार मेरा सम्बन्धी है तथा मैं ऐसा हूँ' इस प्रकारके मोहको जिन लोगोंने बुद्धिपूर्वक छोड़ दिया है, वे महानुभाव ऊँचेसे भी ऊँचे लोकको प्राप्त होते हैं। इसलिये राजन्! तुम अपने आप ही प्रकाशित होनेवाले चिन्मय परमात्माका शीघ्र ही आश्रय लेकर स्थित हो जाओ और समस्त जगत्‌को परिपूर्ण अनन्त विज्ञानानन्दघनरूप ही देखो। जिस समय तुम इस प्रकारके सर्वव्यापी, पूर्ण, चिन्मय परमात्माके स्वरूपको यथार्थरूपसे जान जाओगे, उसी समय संसारसे तर जाओगे और परब्रह्म हो जाओगे; क्योंकि जो पुरुष विज्ञानानन्दघन-स्वरूप हो गया है, जो संसाररूपी मृत्युसे पार हो चुका है और जिसका चित्त विलीन हो गया है, उस महापुरुषको जो परमानन्द प्राप्त होता है, उसकी उपमा किस आनन्दसे दी जा सकती है? इस परमात्माके स्वरूपको प्राप्त करनेपर अविद्या शान्त हो जाती है। फिर, उसके लिये ब्रह्मकी प्राप्तिके सिवा मोक्ष नामका न कोई देश है, न कोई काल है और न कोई स्थिति ही है; क्योंकि यह जो वासनारूपी अविद्या है, वह अहंकाररूपी मोहके विनाशसे विलीन हो जाती है और अविद्याका यह अभाव ही प्रसिद्ध मोक्ष है। जब योगीपुरुषकी अविद्या नष्ट हो जाती है, तब उसकी नाना प्रकारके शास्त्रार्थोंके विचारकी चञ्चलता शान्त हो जाती है। काव्य, नाटक आदि विषयोंकी उत्कण्ठा नष्ट हो जाती है और उसके सारे विकल्प-विभ्रम विलीन हो जाते हैं। वह केवल शाश्वत और सम परमात्मस्वरूप होकर सुखपूर्वक स्थित रहता है।

जो वाणीसे अतीत ब्रह्ममें स्थित है तथा विषय-कामनासे रहित है, वह पुरुष संसारमें परम शोभासे सम्पन्न है। वह गम्भीर, प्रसन्न तथा निरन्तर परमात्माके आनन्दमें मत्त योगी स्वयं ही अपने आत्मस्वरूप परब्रह्ममें रमण करता रहता है। वह सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंका त्याग करनेवाला, ब्रह्मानन्दमें नित्य तृप्त और संसारके आश्रयसे रहित योगीपुरुष पुण्य-पाप और हर्ष-शोक आदि विकारोंसे लिपायमान नहीं होता, जनसमूहमें विचरण करता हुआ भी वह महाज्ञानी अपनी देहके छेदन या पूजनसे शोक या हर्षका अनुभव नहीं करता। उस ब्रह्मज्ञानी पुरुषसे प्राणियोंको उद्वेग नहीं होता। वह भी दूसरे प्राणियोंकी प्रतिकूल चेष्टासे उद्वेगवान् नहीं होता। वह ज्ञानीपुरुष अपने शरीरका किसी तीर्थमें त्याग कर दे या किसी चाण्डालके घरमें त्याग कर दे अथवा कभी भी शरीरका त्याग न करे या वर्तमान क्षणमें ही त्याग कर दे, फिर भी वह ज्ञानप्राप्तिकालमें पहलेसे ही अन्तःकरणसे रहित और जीवन्मुक्त हो चुका है। अहंकारकी भ्रान्ति बन्धनकारक है और ज्ञानसे अहंकारका नाश होकर मोक्ष-की प्राप्ति होती है। विभूति और वैभव चाहनेवाले पुरुष-को प्रयत्नपूर्वक उपयुक्त ज्ञानी महात्मा पुरुषकी पूजा, स्तुति, नमस्कार, दर्शन और अभिवादन करना चाहिये। प्रिय पुत्र ! जो सांसारिक दोषोंसे सर्वथा रहित हैं, उन जीवन्मुक्त आत्मज्ञानी सज्जनोंकी श्रद्धाभक्तिपूर्वक सेवा-पूजा करनेसे जो परम पवित्र पद प्राप्त होता है, वह न तो यज्ञों और तीर्थोंसे प्राप्त होता है एवं न तपस्याओं तथा दानोंसे ही।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं - श्रीराम ! यों कहकर मनु-भगवान् ब्रह्मलोकको चले गये और इक्ष्वाकु भी उस बोधरूप दृष्टिका अवलम्बन करके स्थिर हो गये।

(सर्ग १२०-१२२)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता आदिका प्रतिपादन * ५०३


श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता, रागसे बन्धन और वैराग्यसे मुक्ति तथा तुर्यपद और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवन् ! ऐसा होनेपर श्रेष्ठबुद्धि आत्मज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुषमें अन्य सिद्धोंकी अपेक्षा कौन-सी विशेषता होती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जीवन्मुक्त ब्रह्मज्ञानी पुरुषकी बुद्धि सच्चिदानन्द परमात्मामें ही दृढ़रूपसे जम जाती है । यही कारण है कि वह नित्यतृप्त शान्तचित्त पुरुष परमात्म-स्वरूपमें ही स्थित रहता है । मन्त्र, तप एवं तन्त्रकी सिद्धिसे युक्त सिद्धोंके द्वारा प्राप्त की गयी जो आकाशगमन आदि सिद्धियाँ हैं, उनमें कौन-सी अपूर्व ( महत्त्वकी ) विशेषताकी बात है ? मन्त्रसिद्धि आदिसे युक्त उन सिद्धोंने प्रयत्नपूर्वक साधन कर जिन अणिमादि सिद्धियोंकी प्राप्ति की है, उनमें ब्रह्मज्ञानी पुरुष कोई विशेषता नहीं समझता । उस जीवन्मुक्त महात्मामें यही विशेषता है कि वह मूढ़बुद्धि अज्ञानी पुरुषोंके समान नहीं रहता । उस महाबुद्धिका मन सभी वस्तुओंमें आसक्तिके परित्यागके कारण रागरहित तथा निर्मल ही बना रहता है और वह कभी भी विषयभोगोंमें नहीं फँसता है । जिसका स्वरूप समस्त बाहरी चिह्नोंसे रहित है तथा तत्त्वज्ञानसे दीर्घकालिक सांसारिक भ्रमकी निवृत्ति हो जानेके कारण जो परम शान्तिको प्राप्त हो चुका है, उस ज्ञानी महापुरुषमें काम, क्रोध, विषाद, मोह, लोभ आदि आपत्तियोंका नित्य अत्यन्त अभाव ही रहता है ।

प्रिय श्रीराम ! महासर्गके आरम्भमें प्राणी उस परमात्मासे निकलकर अपने अपने कर्मोंके अनुसार अनेक प्रकारके जन्मोंका अनुभव करते हैं । परमात्मासे निकलनेके बाद उन जीवोंके अपने-अपने जो कर्म हैं वे ही सुख और दुःखके कारण होते हैं तथा अपनी-अपनी समझके अनुसार उत्पन्न हुआ जो संकल्प है वही शुभाशुभ कर्मोंका कारण होता है । निष्पाप श्रीराम ! ये इन्द्रियाँ जिस-जिस विषयकी ओर निरन्तर दौड़ती हैं, उस-उस विषयमें पुरुष रागके द्वारा बँध जाता है । इसलिये उन विषयोंमें राग न करनेवाला पुरुष ही मुक्त होता है । अतएव तृणसे लेकर देहादि शरीरतकके जितने स्थावर-जङ्गमस्वरूप विनाशशील पदार्थ हैं, उनमें तुमको रुचि नहीं करनी चाहिये । तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो और जो कुछ दान करते हो, उन सब क्रियाओंमें तुम वास्तवमें न कर्ता हो और न भोक्ता हो; क्योंकि तुम उन सबसे मुक्त और शान्तस्वरूप हो । जो महात्मा पुरुष हैं, वे न तो अतीतके विषयमें शोक करते हैं और न भविष्यके विषयमें चिन्ता ही करते हैं । वे तो वर्तमानकालमें जो कुछ न्याययुक्त कर्म प्राप्त हो जाता है, उसीका उचितरूपमें सम्पादन करते हैं । श्रीराम ! तृष्णा, मोह, मद आदि जितने त्याज्य भाव हैं वे सब मनमें ही स्थित रहते हैं, इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको अपने विवेक-विचारयुक्त मनके द्वारा ही मनसहित उनका विनाश कर देना चाहिये; क्योंकि जैसे अति तीक्ष्ण लोहेसे लोहा काटा जाता है, वैसे ही सब भ्रमोंकी शान्ति-के लिये अति तीक्ष्ण विवेक-विचारयुक्त मनसे दोषसहित मन काटा जाता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—मुनिनायक ! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंमें व्यापक और अनवच्छिन्न जो तुर्यरूप है, उसका विशेषरूपसे विवेचन करते हुए बतलाइये ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! जो असक्त, सम और स्वच्छ स्वरूपस्थित है वही तुर्य है । जिसमें जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्थिति है, जो स्वच्छ, समरूप और शान्त है तथा जो व्यवहारकालमे साक्षीरूप है, वही तुर्यावस्था कही

५०४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जाती है। संकल्पोंका अभाव रहनेके कारण यह अवस्था न जाग्रत् है, न स्वप्न है और अज्ञानका अभाव होनेसे यह न सुषुप्त ही है अर्थात् यह इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत है। ज्ञानके द्वारा सामने दिखायी देनेवाले इस जगत्की जो निवृत्ति है, परमात्मामें स्थित एवं भलीभाँति प्रबुद्ध हुए ज्ञानी पुरुषोंकी उसी अवस्थाको तुर्यपद कहते हैं। अहङ्कारका त्याग होनेपर और चित्तके विलीन हो जानेपर जब समताकी उत्पत्ति हो जाती है, तब उसे तुर्यावस्था कहते हैं।

श्रीराम ! इसके अनन्तर अब तुम्हें मैं एक दृष्टान्त बतला रहा हूँ, उसे सुनो। किसी एक विस्तृत घने जंगलमें महामौन धारण करके बैठे हुए किसी एक अद्भुत मुनिको देखकर एक व्याधने उनसे पूछा—'मुने मेरे बाणके द्वारा घायल एक मृग इधर आया था, वह कहाँ चला गया ? इस प्रकारका उस व्याधका प्रश्न सुनकर उस मुनिने उस व्याधको उत्तर दिया—'सखे ! हम जंगलके निवासी मुनि समता और शीलवान् होते हैं। व्यवहारका कारण जो अहंकार है, वह हमलोगोंमें नहीं है। सम्पूर्ण इन्द्रियोंका कार्य अकेला अहङ्काररूप मन ही करता है और वह मेरा मन निःसन्देह चिरकालसे विलीन हो चुका है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक किसी भी अवस्थाको मैं नहीं जानता। इन अवस्थाओंसे अतीत एकमात्र तुर्यपदमें ही, जहाँ दृश्यका अभाव है, मैं स्थित रहता हूँ।' रघुनन्दन ! उस मुनिश्रेष्ठके ऐसे वचन सुनकर वह व्याध उनके अर्थको न समझकर अपनी अभीष्ट दिशाकी ओर चला गया। इसीलिये मैं कहता हूँ कि महाबाहो ! तुर्यसे श्रेष्ठ अन्य कोई अवस्था नहीं है। कल्पनासे रहित सच्चिदानन्द परमात्मा ही तुर्य है और वही यहाँ विद्यमान है, उसके सिवा अन्य कुछ नहीं है;

क्योंकि जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ चित्तका ही विकार होनेसे उसका स्वरूप है। जाग्रत् अवस्थाका चित्त घोर है, स्वप्न अवस्थाका चित्त शान्त है और सुषुप्त अवस्थाका चित्त मूढ़ है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित हुआ चित्त 'मृत' है। जो 'मृत' चित्त है, उसमें एकमात्र सत्त्व ही सम-रूपसे स्थित रहता है। इसीका समस्त योगीजन बड़े यत्नके साथ सम्पादन करते हैं और मुक्त हो जाते हैं।

समस्त दृश्य-जगत्का बाध करना ही सम्पूर्ण अध्यात्मशास्त्रोंका परम सिद्धान्त है। वहाँ न तो अविद्या है और न माया ही है; किंतु एक अद्वितीय, क्रियारहित शान्त विज्ञानानन्दघन परब्रह्म ही है। जो शान्त, चेतन, स्वच्छ, सर्वत्र एकरूपसे विद्यमान तथा सर्वशक्तिसम्पन्न 'ब्रह्म' नामसे कहा गया है, उसे अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार निर्णय करके कोई शून्य, कोई विज्ञानमात्र और कोई ईश्वररूप कहते हुए आपसमें विवाद किया करते हैं। मनुष्यको रमणीय या अरमणीय वस्तुको देखकर उनमें समभावसे स्थित रहना चाहिये। बस, इतने ही अपने साधनसे यह संसार जीत लिया जाता है। सुख या दुःख अथवा सुख-दुःख-मिश्रित पदार्थके प्राप्त होनेपर उनकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिये। बस, इतने ही अपने साधनसे वास्तविक अक्षय अनन्त सुखरूप परमात्मा-की प्राप्ति हो जाती है। जिसने तीनो लोकोंकी सभी वस्तुओंके साररूप परमात्माका ज्ञान कर लिया है, जो शोभायमान तथा अमृतमय है और जिसका अन्तःकरण पूर्ण चन्द्रमण्डलके सदृश शान्त है, ऐसा परमपदमें स्थित ज्ञानी महात्मा पुरुष विज्ञानानन्दघन परमात्माको प्राप्त करता है। वह कर्मोंको करता हुआ भी कुछ नहीं करता।

(सर्ग १२३—१२५)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण * ५०५

योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण, योगभ्रष्ट पुरुषकी गति एवं महान् अनर्थकारिणी हथिनिरूप इच्छाके स्वरूप और उसके नाशके उपाय

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा— मुने ! सातों योगभूमिकाओंका अभ्यास कैसे किया जाता है तथा प्रत्येक भूमिकामें योगीके चिह्न किस तरहके होते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! जीव चौरासी लाख योनियोंमें घूमता हुआ अन्तमें मनुष्य-जन्ममें भाग्योदय होनेपर विवेकी बन जाता है । 'अहो ! संसारकी यह व्यवस्था बिल्कुल असार है । इस व्यवस्थासे मुझे क्या प्रयोजन है ? इन व्यर्थ कर्मोंसे ही मैं अपना दिन क्यों बिता रहा हूँ ? मैं वैराग्यवान् बनकर किस तरह संसार-सागरको तैर जाऊँ'—इस प्रकारके विचारमें जब सद्बुद्धि प्राणी तत्पर होता है, तब उसके हृदयमें भोगों और सांसारिक सङ्कल्पोंमें हर समय वैराग्य रहता है । वह सत्सङ्ग, स्वाध्याय, ईश्वरोपासना आदि उत्तम क्रियाओंका अनुष्ठान करता है और उन्हींमें प्रसन्न रहता है । तुच्छ व्यर्थ चेष्टाओंमें उसे निरन्तर वैराग्य रहता है । वह दूसरोंके दोषोंको प्रकट नहीं करता और स्वयं यज्ञ, दान, तप, सेवा-पूजा आदि पुण्य कर्मोंका ही सेवन करता है । वह किसीके भी मनमें उद्वेग न पहुँचानेवाले शास्त्रविहित विनययुक्त कर्मोंका आचरण करता है, शास्त्रविपरीत कर्मसे सदा डरता रहता है और सांसारिक विषयभोगोंकी कभी अभिलाषा नहीं करता । वह स्नेह और प्रणयसे पूर्ण, कोमल, सत्य, प्रिय और हितकारक तथा देश-कालोचित वचन बोलता है । वह मन, कर्म एवं वाणीसे सत्पुरुषोंका संग और सेवा करता है । जिस-किसी जगहसे ज्ञानदायक शास्त्रोंको प्राप्त करके उनका विवेक-विचारपूर्वक स्वाध्याय करता है । संसार-सागरको तैर जानेके लिये इस प्रकारके विचारसे सम्पन्न पुरुष प्रथम 'शुभेच्छा' नामक भूमिकाको प्राप्त होता है । इसमें उसे आत्मोद्धारके सिवा और कोई भी इच्छा नहीं रह जाती । इसीको 'श्रवण' भूमिका भी कहते हैं ।

इसके बाद अधिकारकी प्राप्ति होनेपर वह 'विचार' नामक दूसरी योगभूमिकामें प्रवेश करता है । उस समय वह श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा, ध्यान और कर्मोंमें तत्पर रहनेवाले पुरुषोंमेंसे, जिन्होंने अध्यात्म-शास्त्रोंकी प्रशस्त व्याख्या करनेके कारण अच्छी ख्याति प्राप्त कर ली है, उन श्रेष्ठ विद्वानोंका आश्रय लेकर उनके उपदेशानुसार साधन करता है । वह आगमशास्त्रका श्रवण करके कार्य और अकार्यके स्वरूपको तत्त्वतः जान लेता है । वह मद, अभिमान, मात्सर्य, मोह और लोभको उसी तरह छोड़ देता है, जिस तरह साँप केंचुलको । उपर्युक्त यथार्थ निश्चयसे युक्त पुरुष सत् शास्त्र, गुरु और सज्जनोंकी सेवासे ब्रह्मविषयक रहस्यको विवेक-विचार-पूर्वक यथार्थरूपसे पूर्णतया जान लेता है और उसके अनुसार मनन करता है । वह अध्यात्मविषयक शास्त्रोंके वाक्यार्थमें अपनी बुद्धिको निश्चलतापूर्वक स्थापित करता है, तपस्वियोंके आश्रमोंमें निवास करता है, अध्यात्मशास्त्रोंकी कथाओंका मनन करता है तथा निन्दनीय संसारके विषय-भोगरूप पदार्थोंसे वैराग्य करके पत्थरकी चट्टानरूपी शय्यापर आसीन हो अपनी आयु बिताता है । अध्यात्म-विषयक सत्-शास्त्रोंके अध्ययन-मननरूप अभ्याससे तथा निष्काम पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे उस पुरुषको अध्यात्मविषयक यथार्थ दृष्टि प्राप्त हो जाती है । इस भूमिकाका नाम 'विचारणा' है । इसीको 'मनन' भी कहते हैं ।

तीसरी भूमिकामें पहुँचकर विवेकी पुरुष दो प्रकारके असङ्गका अनुभव करता है । श्रीराम ! तुम उसके इस भेदको सुनो । यह असङ्ग दो तरहका है--एक सामान्य और दूसरा श्रेष्ठ (विशेष) । 'मैं न कर्ता हूँ और न भोक्ता ही; मैं सांसारिक कर्मोंके लिये बाध्य नहीं हूँ और न दूसरोंके लिये बाधक हूँ।' इस प्रकारके निश्चयसे

५०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विषयभोगोंकी आसक्तिसे रहित होना ही सामान्य असङ्ग है। 'सुख या दुःखकी प्राप्ति पूर्वकर्मके अनुसार निश्चित और ईश्वरके अधीन है अर्थात् ईश्वरके विधानके अनुसार होती है । इसमें मेरा कर्तृत्व कैसा ? ये विस्तृत विषयभोग अन्तमें संताप देनेवाले होनेके कारण महारोग हैं तथा ये सांसारिक सारी सम्पत्तियाँ परम आपत्तियाँ हैं । संयोगका अन्तमें वियोग निश्चित है और ये मनके सारे विकार बुद्धिकी व्याधियाँ हैं। सब पदार्थोंको ग्रास बना लेनेके लिये काल सदा तैयार रहता है।' इस तरह अध्यात्मविषयक वचनोंके अर्थमें संलग्र चित्तवाले पुरुषकी सम्पूर्ण पदार्थोंमें जो आन्तरिक मिथ्यात्वकी भावना है, वह भी सामान्य असङ्ग कहलाता है । इस पूर्वोक्त अभ्यासयोगसे, महापुरुषोंकी संगतिसे, दुर्जनोंकी संगतिके त्यागसे, आत्मज्ञानके प्रयोगसे तथा लगातार अभ्यासयोगद्वारा अपने पुरुष-प्रयत्नसे संसारसागरके पार, सबके सार, परम कारणभूत परमात्माके ध्यानकी स्थिति हस्तामलकवत् दृढ़रूपसे खूब स्पष्ट हो जानेपर जो नाम-रूपकी भावनासे रहित होकर 'न मैं कर्ता हूँ, न ईश्वर कर्ता है, न प्रारब्ध कर्ता है'—यों शान्त और मौनरूपसे स्थित रहना है वही श्रेष्ठ (विशेष) असङ्ग कहलाता है। तथा जो शान्त, आदि-अन्तसे रहित सुन्दर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है वही श्रेष्ठ असङ्ग कहा जाता है । यही श्रेष्ठ असङ्ग नामक तीसरी भूमिका है। इसीको 'निदिध्यासन' भी कहते हैं। इस भूमिकामें स्थित पुरुष सम्पूर्ण संकल्पोंकी कल्पनाओंसे शून्य होकर परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! असत्कुलमें उत्पन्न, कामोपभोगमें ही प्रवृत्त, अधम तथा योगी महात्माके सङ्गसे रहित मूढ़ मनुष्यका उद्धार कैसे होगा ? तथा पहली, दूसरी, तीसरी भूमिकामें आरूढ होकर मरे हुए प्राणीकी कैसी गति होती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! प्रवृद्ध रागादि दोषों-वाले मूढ़ पुरुषको सैकड़ों जन्मोंके बाद जबतक काकतालीय न्यायसे या महापुरुषोंके सङ्गसे वैराग्य उत्पन्न नहीं हो जाता, तबतक उसका यह विस्तृत संसार रहता ही है अर्थात् बिना वैराग्यके उसका उद्धार होना कठिन है। वैराग्य उत्पन्न हो जानेपर प्रथम भूमिकाका उदय प्राणीको अवश्य होता है और तदनन्तर उसका संसार नष्ट हो जाता है, यही शास्त्रोंका परम सिद्धान्त है ! प्रथम आदि भूमिकाओंमें पहुँचकर मरनेवाले प्राणीका भूमिकाओंके अनुसार ही पूर्वजन्मका दुष्कृत नष्ट हो जाता है। तदनन्तर वह योगी देवताओंके विमानोंमें, लोकपालोंके नगरोंमें तथा सुमेरु पर्वतके वन-कुञ्जोंमें, अप्सराओंके साथ रमण करता है। उसके बाद पूर्वजन्ममें किये गये पुण्यों और पापोंका भोगसमूहोंके द्वारा नाश हो जानेपर वे योगी लोग पृथ्वीपर पवित्र, गुणवान् और लक्ष्मीवान् सज्जनोंके घरमें जन्म लेते हैं और वहाँ जन्म लेकर वे लोग पूर्वजन्मके योग-साधनके संस्कारोंके अनुसार योगका ही साधन करते हैं। वहाँपर पूर्व जन्ममें की गयी भावनाओंसे अभ्यस्त हुए योगभूमिकाओंके क्रमका स्मरण करके वे बुद्धिमान् लोग आगेके भूमिका-क्रमका भलीभाँति अभ्यास करने लग जाते हैं।

श्रीराम ! ये पूर्वोक्त तीनों भूमिकाएँ जाग्रत् कही गयी हैं; क्योंकि इन भूमिकाओंमें यथार्थ भेदबुद्धि रहनेसे यह सम्पूर्ण दृश्यसमूह उस जाग्रत्कालकी तरह ही दिखायी पडता है। इन तीनों भूमिकाओंमें योगयुक्त पुरुषोंमें केवल आर्यता (श्रेष्ठता) का उदय होता है, जिसे देखकर मूढ़बुद्धि पुरुषोंको भी मुक्त होनेकी अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंका भलीभाँति सम्पादन करता है तथा शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको सर्वथा नहीं करता है एवं सदाचारमें स्थित रहता है, वह आर्य कहा गया है । श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा आचरित, शास्त्रोक्त तथा मनको प्रिय और हितकर यथोचित व्यवहारोंको जो ग्रहण करता है, वह आर्य कहा गया है।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण * ५०३

योगीकी वही आर्यता प्रथम भूमिकामें अङ्कुरित, द्वितीय भूमिकामें विवेकके द्वारा विकसित तथा तृतीय भूमिकामें संसारके असङ्ग और परमात्माके ध्यानरूप फलसे फलित होती है । इस तीसरी भूमिका (आर्यता) की प्राप्तिके बीचमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ योगी पुरुष शुभ संकल्पयुक्त भोगोंका चिरकालतक उपभोगकर पुनः योगी ही होता है। क्रमशः तीनों भूमिकाओंका अभ्यास करनेसे अज्ञानके नष्ट हो जानेपर वास्तविक ज्ञानका उदय होनेके बाद जब चित्त पूर्ण-चन्द्रोदयके सदृश हो जाता है, तब चौथी भूमिकामें पहुँचे हुए युक्तचित्त योगीलोग सम्पूर्ण जगत्‌में विभागसे तथा आदि और अन्तसे रहित समभावसे परिपूर्ण सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही अनुभव करते हैं। द्वैतके सर्वथा शान्त हो जानेपर जब अद्वैत ही अचल रह जाता है तब चौथी भूमिकामें गये हुए योगीलोग समस्त संसारको स्वप्नके समान अनुभव करते हैं । इसलिये पूर्वोक्त तीन भूमिकाओंको तो जाग्रत् कहते हैं और चौथी भूमिकाको स्वप्न कहते हैं।

जो पुरुष पञ्चम भूमिकामें पहुँच गया है, वह केवल सत्स्वरूप ब्रह्म बनकर रहता है। इस अर्धसुषुप्त पञ्चम भूमिकाको प्राप्त करके पुरुष समस्त विकारोंसे मुक्त हो जाता है और अद्वैत परब्रह्मरूप तत्त्वमें नित्य स्थित हो जाता है। पाँचवीं भूमिकामें स्थित पुरुष अन्तर्मुख वृत्तिसे रहता है। बाह्य व्यापारमें लगा हुआ भी निरन्तर चारों ओरसे शान्त होनेके कारण तन्द्रामें स्थितके सदृश दिखायी देता है। वह कभी तो बाहरी व्यवहार करता है और कभी अटल समाधिमें स्थित रहता है। इस भूमिकामें वासनाशून्य होकर अभ्यास करता हुआ पुरुष क्रमशः तुर्या नामकी छठी भूमिकामें चला जाता है। उस भूमिकामें निर्विकल्प होनेके कारण योगी द्वैत और अद्वैतकी भावनासे रहित हो जाता है। वह चिज्जड-ग्रन्थिसे और संदेहसे रहित हो जाता है। वह वासनाओंसे रहित जीवन्मुक्त योगी चित्रलिखित प्रदीपकी भाँति निर्वाणको न प्राप्त हुआ भी निर्वाणको प्राप्त हुआ-सा स्थित रहता है। (उसको बाहरी ज्ञान नहीं रहता। किंतु दूसरोंके चेष्टा करनेपर बाह्य ज्ञान हो सकता है।) वह जीवन्मुक्त योगी बाहर और भीतरसे शून्य आकाशमें स्थित घटकी तरह बाहर-भीतर संसारसे रहित रहता है तथा सागरमें परिपूर्ण घटके समान बाहर-भीतर ब्रह्मसे परिपूर्ण रहता है। तदनन्तर छठी भूमिकामें स्थित हुआ वह योगी सातवीं भूमिकामें पहुँचता है। सातवीं योग-भूमिका विदेहमुक्ता कही गयी है। वह शान्तस्वरूप, वाणीसे अगम्य और सभी भूमिकाओंकी सीमा है।

शैव उसे शिव कहते हैं, वेदान्ती उसे ब्रह्म कहते हैं और साङ्ख्यवादी उसे प्रकृति और पुरुषका यथार्थ ज्ञान कहते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न लोगोंने अपनी बुद्धिके अनुसार अनेक रूपोंसे सप्तम भूमिकाकी भावना की है। यद्यपि यह भूमिका सर्वथा उपदेशयोग्य नहीं है, तथापि किसी तरह इसका उपदेश किया ही जाता है। (इस भूमिकामें स्थित योगीको दूसरोंके द्वारा चेष्टा करनेपर भी संसारका ज्ञान नहीं होता।) श्रीराम ! ये सातों भूमिकाएँ मैंने तुमसे कह दीं। इनके अभ्यासयोगसे मनुष्य सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जाता है। धीरे-धीरे चलनेवाली अत्यन्त मदोन्मत्त, लड़ाई करनेमें सदा तत्पर, अपने बड़े-बड़े दाँतोंमें ख्यातिको प्राप्त करनेवाली तथा अनन्त अनर्थोंको पैदा करनेवाली एक हथिनी है। उसे यदि किसी तरह मार दिया जाय तो मनुष्य इन उपर्युक्त समस्त भूमिकाओंमें विजयी बन सकता है। वह मदोन्मत्त हथिनी जबतक पराक्रमसे जीत नहीं ली जाती, तबतक कौन ऐसा धीर योद्धा है, जो उपर्युक्त भूमिका-पङ्क्तिरूपी समरभूमियोंमें प्रवेश करनेमें भी समर्थ हो !

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! वह प्रमत्त हथिनी कौन है, वे समरभूमियाँ कौन हैं, वह कैसे मारी जाती है तथा वह चिरकालतक कहाँ रमण करती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! 'मुझसेयह मिट जाय,'

५०८* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ऐसी जो 'इच्छा' है, उसीका नाम हथिनी है। वह शरीर-रूपी जंगलमें रहती है और मत्त होकर अनेक तरहके शोक, मोह आदि विकारोंको उत्पन्न करनेमें लगी रहती है। मत्तवाले इन्द्रियोंके समूह ही उसके उग्र प्रकृतिके बच्चे हैं। वह जीभसे मनोहर भाषण करती है, शुभाशुभ कर्मरूपी दो दाँतोंसे युक्त वह मनरूपी गहन स्थानमें लीन रहती है। चारों ओर दूरतक फैले हुए वासनाओं-का समूह ही इस हथिनीका मद है। और श्रीराम ! संसार-की स्मृतियाँ इसकी युद्धभूमियाँ हैं। यहाँपर पुरुष बार-बार जय और पराजयका अनुभव करता है। यह इच्छा नामवाली हथिनी लोभी मनुष्योंको मारती है। वासना, इच्छा, मनन, चिन्तन, सङ्कल्प, भावना और स्पृहा इत्यादि इसके नाम हैं। यह अन्तःकरणरूपी कोशके अंदर रहती है। बहुत दूरतक फैली हुई तथा सब पदार्थोंमें निवास करनेवाली इस इच्छारूपी हथिनीपर अवहेलनापूर्वक 'धैर्य' नामक सर्वश्रेष्ठ अस्त्रसे प्रहार करके सब प्रकारसे विजय प्राप्त कर लेनी चाहिये।

'यह वस्तु मुझे इस प्रकार प्राप्त हो जाय !' यह इच्छा जबतक अन्तःकरणके भीतर प्रकट रहती है, तभीतक यह महाभयंकर कुत्सित संसार रूपी महाविषसे उत्पन्न विषूचिकादूपी महामारी बनी रहती है। 'यह मुझे मिल जाय' यह जो संकल्परूप इच्छा है, बस, यही संसार है तथा इसका शान्त हो जाना ही मोक्ष है, यही ज्ञानका सार है। इच्छारहित विशुद्ध अन्तःकरणमें महापुरुषोंके पवित्र और सात्त्विक प्रसन्नता पैदा करनेवाले हितमय उपदेश दर्पणमें तैल-बिन्दु की भाँति जम जाते हैं। एकमात्र विषयोंके स्मरणका परित्याग कर देनेसे इच्छारूपी संसारका अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता। विषके तुल्य अनेक प्रकारका अनर्थ पैदा करनेवाली इस इच्छाको तनिक-सी बढ़ते ही विषयोंके विस्मरणरूप शस्त्रसे काट डालना चाहिये। इच्छासे युक्त जीवात्मा दीनताको कभी भी नहीं छोड़ सकता। सुन्दर असंवेदनमें यानी उत्तम रूपसे विषयोंका स्मरण न होनेमें श्रेष्ठ प्रयत्न यही है कि चित्त अपने अंदर संकल्पोंसे रहित होकर मृतककी तरह स्थित रहे।

'यह मुझे मिल जाय' इस तीव्र इच्छाको ही उत्तम पुरुष 'संकल्प' कहते हैं और जो संसारके पदार्थोंकी भावना से रहित होना है, उसीको 'संकल्पका त्याग' कहते हैं। श्रीराम ! सङ्कल्पको ही तुम स्मरण समझो। और विस्मरण (संकल्पके अभाव) को विद्वान्लोग कल्याण-रूप समझते हैं। सङ्कल्पमें पहलेके अनुभव किये हुए पदार्थोंकी तथा भविष्यमें होनेवाले पदार्थोंकी भी भावना की जाती है। मै ऊपर हाथ उठाकर बार-बार ऊँचे स्वरसे चिल्लाकर यह कह रहा हूँ, किंतु इसे कोई सुनता नहीं कि संकल्पत्याग ही परम श्रेयका सम्पादक है। इसकी भावना लोग अपने हृदयमें क्यों नहीं करते ?

श्रीराम ! सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके व्यापारोंसे रहित और ध्यान-समाधिमें लीन वेश हुआ पुरुष उस परम पदको प्राप्त करता है, जहाँ एकच्छत्र साम्राज्य भी तृणके सदृश तुच्छ है। इस विषयमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता है ? संक्षेपसे मैं इतना ही कहता हूँ कि संसारका सङ्कल्प ही सबसे बढ़कर बन्धन है और उस संकल्पका अभाव ही मोक्ष है। संसारके स्मरणके अभावको ही स्वाभाविक 'चित्त-विनाशस्वरूप योग' कहते हैं और वह अक्षय योग शान्तरूपसे नित्य स्थित है। श्रीराम ! शिव, सर्वव्यापी, शान्तिमय, चिन्मय, अज और कल्याणरूप ब्रह्मके साथ जो जीव-ब्रह्मके एकत्वका निश्चय है, वही वास्तविक सर्वत्याग है। श्रीराम ! अहंता-ममताकी भावना रखनेवाला मनुष्य दुःखसे कभी छुटकारा नही पाता; किंतु अहंता-ममताकी भावना से रहित हुआ मनुष्य मुक्त हो जाता है।

(सर्ग १२६)

निर्वाण-प्रकरण पू०] * भरद्वाज मुनिके प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा उपदेश * ५०९


भरद्वाज मुनिके उत्कण्ठापूर्वक प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा जगत्की असत्ता और परमात्माकी सत्ताका प्रतिपादन करते हुए कल्याणकारक उपदेश

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—गुरो ! निश्चय ही श्रीरामभद्र तो परम योगी, सबके वन्दनीय, देवताओंके भी ईश्वर, जन्म-मरणसे रहित, विशुद्ध ज्ञानमय, समस्त उत्तम गुणोंकी खान, समस्त ऐश्वर्योंके आधार तथा तीनों लोकोंके उत्पादन, रक्षण एवं अनुग्रह करनेवाले थे । उन ब्रह्मानन्दसे परिपूर्ण पूर्णज्ञानी और विशुद्धबुद्धि रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामभद्रने मुनिवर वसिष्ठजीके द्वारा उपदिष्ट इस अति प्राचीन समस्त ज्ञानरूपी सारका श्रवण कर क्या और भी कुछ पूछा था ?

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! वसिष्ठ मुनिके वेदान्तशास्त्रके सङ्ग्रहरूप वचनोंका श्रवण कर अखिल विज्ञानोंके ज्ञाता कमललोचन श्रीरामभद्र अपने चिन्मय आनन्द-स्वरूपमें स्थित रहे । उस समय वे प्रश्न, उत्तर और विभाग आदि करनेकी पद्धतिसे उपरत हो गये थे । उनका चित्त आनन्दरूप अमृतसे पूर्ण था । वे चिन्मय और सर्वव्यापी होनेके कारण अपने मङ्गलमय स्वरूपमें ही समभावसे नित्य स्थित थे । अतः उन्होंने उस समय वसिष्ठजीसे कुछ भी नहीं पूछा ।

श्रीभरद्वाजजीने पूछा—मुनिनायक ! कहाँ तो मेरे-जैसे मूर्ख, स्तब्ध, अल्पज्ञ, पापी और कहाँ ब्रह्मा आदि देवता भी जिसकी आकाङ्क्षा करते हैं—उन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी अपने स्वरूपमें स्थिति ! मुनीश्वर ! अहो ! मैं किस प्रकार परमात्मपदमें विश्राम पा सकूँगा और इस दुस्तर संसाररूपी महासागरके मोहरूपी जलसे किस प्रकार पार हो सकूँगा ? यह शीघ्र मुझसे कहिये ।

श्रीवाल्मीकिजी बोले—शिष्य ! श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कथित आरम्भसे अन्ततक सम्पूर्ण राम-वृत्तान्त, मैंने तुमको सुना दिया, अब तुम अपनी बुद्धिसे पहले विवेकपूर्वक विचारकर पीछे उसका मनन करो । मैं भी इस विषयमें तुमसे जो वर्णन करने योग्य रहस्य है, उसे कहता हूँ, सुनो । भद्र ! यह जो यहाँ संसाररूप अविद्या-प्रपञ्च दीख रहा है, वह तनिक भी सत्य नहीं है। अर्थात् समस्त संसाररूप प्रपञ्च सर्वथा मिथ्या ही है । विवेकी पुरुष वास्तविक तत्त्वको विवेचनपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं, किंतु अविवेकी मनुष्य वाद-विवाद करते रहते हैं । प्रिय मित्र ! वास्तवमें सच्चिदानन्द परमात्मासे अतिरिक्त कोई वस्तु ही नहीं है अतः प्रपञ्चसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? मैं तुमसे आगे जो वेदान्तशास्त्रोंके रहस्य बतलाता हूँ, उनके अभ्याससे तुम अपने चित्तको परम विशुद्ध बना डालो।

मित्र ! यह जो संसाररूप प्रपञ्च दीखता है, इसके मूलमें भी सत्ताका अभाव ही है और इसके अन्तमें भी सत्ताका अभाव ही है । मध्यकालमें भी विचार करनेपर इसकी कोई सत्ता न होनेके कारण केवल प्रतीतिमात्र ही है । अतः विवेकी पुरुष इस संसारमें किसी तरहका विश्वास नहीं करते; क्योंकि अनादि वासनाके दोषसे ही यह असत् संसार दिखायी देता है । इसका गन्धर्वनगरके सदृश मिथ्या स्वरूप है और यह अनेक प्रकारके भ्रमोंसे भरा है। भद्र ! तुम चिन्मय कल्याणरूपी अमृत-लताका अभ्यास न कर विषय-वासनारूपी विषलताका आश्रय कर क्यों व्यर्थ मोहमें फँसे हो ? सखे ! यह समस्त जगत् न तो आरम्भमें है और न अन्तमें ही है । इसलिये तुम यह भी समझ लो कि मध्यमें भी यह है ही नहीं । इस जगत्का सारा वृत्तान्त स्वप्न-जैसा है। अज्ञानमूलक ये सारे भेद जलमें बुद्बुदोंकी तरह क्षण-क्षणमें उत्पन्न होते रहते हैं; और अज्ञानका नाश होते ही एकमात्र ज्ञानरूप समुद्रमें विलीन हो जाते हैं । अकेला अज्ञानरूपी समुद्र ही समस्त जगत्को व्याप्त करके स्थित है। इस समुद्रमें

५१० * अविच्छिन्नसंविदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अविद्यारूप वायुसे उत्पन्न सबसे बड़ा यह 'अहम्' नामक तरङ्ग है। उन-उन विषयोंमें चित्तके गिरनेके जो नाना प्रकार हैं, उनके हेतुभूत राग आदि दोष इस समुद्रके छोटे-छोटे कल्पित तरङ्ग हैं। ममता ही इसमें आवर्त है, जो स्वतः ही इच्छानुसार प्रवृत्त होता रहता है। इस समुद्रमें राग और द्वेष बड़े-बड़े मगर हैं, उन्हीं दो मगरोंसे मनुष्य पकड़ लिया जाता है और उसका निश्चय ही अनर्थरूपी पातालमें प्रवेश हो जाता है। यह प्रवेश किसीसे भी रोका नहीं जा सकता। भद्र ! प्रशान्त तथा अमृतरूप तरङ्गोंसे पूर्ण केवल आनन्दामृतके समुद्रमें ही प्रवेश करना चाहिये। व्यर्थ द्वैतरूप मकरोंसे पूर्ण लवणसागरके तरङ्गोंमें क्यों प्रवेश करते हो ?

प्रसिद्ध परमात्माका जो सूक्ष्म तत्त्व है, वह अज्ञानी लोगोंके लिये अज्ञानसे आवृत रहता है। इसलिये जैसे साधारण मनुष्यको जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी मनुष्योंको अनात्मामें आत्माका और आत्मामें अनात्माका भ्रम हो जाता है। मित्र ! वास्तवमें न तो असद् वस्तुकी उत्पत्ति होती है और न सद् वस्तुका कभी अभाव होता है। केवल मायाद्वारा रचित चित्र-विचित्र रचनाओंके ये आविर्भाव और तिरोभाव होते रहते हैं। इसलिये प्रचण्ड बने हुए अज्ञानकी इस व्यामोह-शक्तिको विशुद्ध सत्त्वके बलसे जीतकर विश्वासयुक्त मनसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि साधनोंका अनुष्ठान करो। इसके अनन्तर ध्यान-समाधिके द्वारा अपने-आप ही परमात्माके शुद्ध स्वरूपका अनुभव करो, जिसके द्वारा अज्ञानसे आच्छादित तुम्हारी बुद्धिरूपी रात्रि दिनके रूपमें परिणत हो जाय। केवल पुरुष-प्रयत्नरूप कर्मोंसे महेश्वरकी कृपा प्राप्त होनेपर ही मनुष्य प्राप्तव्य वस्तु परमपदरूपी परमात्माकी प्राप्ति कर लेते हैं। भरद्वाज ! तुम अपने विवेकसे इस मोहका स्पष्टरूपसे त्याग कर दो। फिर तो तुम असाधारण परमात्माके यथार्थ ज्ञानको प्राप्त कर लोगे। इसमें संदेह नहीं है। पुत्र ! कामना और आसक्ति होनेपर शत्रुरूप हुए जिस पुण्यकर्मसे तुम्हें इस प्रकारका बन्धन प्राप्त हुआ है, कामना और आसक्तिसे रहित होनेपर मित्ररूप हुए उसी पुण्यकर्मसे ज्ञानके द्वारा तुम मोक्ष पा जाओगे; क्योंकि रागादि दोषोंसे रहित सज्जनोंका यह सत्कर्मोंका संवेग प्राणियोंके पूर्वजन्मके पापोंको नष्ट करता हुआ उनके त्रिविध तापोंको वैसे ही शान्त कर देता है, जैसे वर्षाका जलसमूह दावानलको ।

मित्र ! संसारचक्रके आवर्तरूपी भ्रममें यदि तुम भ्रमण करना नहीं चाहते तो सारे काम्य-कर्मोंको छोड़कर केवल ब्रह्ममें आसक्त हो जाओ । ब्रह्ममें प्रीति न होकर जबतक बाह्य विषयोंमें आसक्ति है, तभीतक विकल्पसे उत्पन्न हुआ यह सब जगत् दिखायी देता है। जैसे जलके तरङ्गयुक्त होनेपर ही समुद्र अपने तटकी ओर जाकर उससे टक्कर खा करके विक्षिप्त होता है, जलके निश्चल रहनेपर तो वह केवल जलरूप ही दिखायी देता है। इसी प्रकार ब्रह्ममें चित्तकी स्थिरता होनेपर केवल ब्रह्म ही दिखायी देता है। किंतु जैसे समुद्रकी तरङ्गोंसे तृण विचलित रहते हैं, वैसे ही जो हर्ष और शोकसे विचलित हो जाते हैं, वे लोग श्रेष्ठ नहीं माने जाते । सखे ! वह सारा जीवसमूह हर्ष-विषाद आदि अवस्थारूप झूलेपर निरन्तर आरूढ़ है। इसे राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह आदि रूप छः झूलोंमें झुलाकर काल क्रीडा करता है। अतः इसमें तुम खिन्न क्यों हो रहे हो ? इस तरह क्रीडा करनेवाला काल ही अनेक उपायोंसे एकके पीछे एक अनेक सृष्टियोंको उत्पन्न करता है, विनाश करता है, फिर तत्काल ही उत्पन्न करता है और फिर विनाश करता है। जब देवगण भी दुष्ट कालके पिण्डसे छुटकारा नहीं पाते, तब क्षणभङ्गुर विनाशशील शरीरोंकी तो बात ही क्या ! इसीलिये भरद्वाज ! अनेक तरङ्गोंसे युक्त इस जगत्को क्षणभङ्गुर देखकर ज्ञानी पुरुष तनिक भी

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५११


शोक नहीं करता। अतः तुम अमङ्गलस्वरूप शोकको छोड़ दो, कल्याणकारी वस्तुओंका विचार करो और विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करो। जो पुरुष देव, द्विज और गुरुओंके ऊपर परिपूर्ण श्रद्धा रखकर निर्मल चित्तवाले हो गये हैं और जो वेदादि सत्-शास्त्रोंमें विश्वासपूर्वक प्रामाण्य बुद्धि रखते हैं, उन पुरुषोंके ऊपर परमात्माका परम अनुग्रह होता है।

भरद्वाजजीने कहा—भगवन् ! आपके प्रसादसे मैंने पूर्णरूपसे ब्रह्म और जगत्का सारा तत्त्व जान लिया। वैराग्यरूप साधनसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है और संसारकी प्रीतिसे बढ़कर दूसरा कोई शत्रु नहीं है। अब मैं महाराज वसिष्ठजीद्वारा समस्त ग्रन्थमें कहे गये ज्ञानरूपी रहस्यका सम्पूर्ण निचोड़ थोड़े शब्दोंमें सुनना चाहता हूँ। कृपाकर कहिये।

श्रीवाल्मीकिजी बोले—भरद्वाज ! मुक्ति देनेवाले इस महान् ज्ञानको तुम सुनो। इसके केवल सुननेसे ही तुम फिर संसाररूपी सागरमें नहीं डूबोगे। जो देव वास्तवमें एक होता हुआ भी ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि भेदोंसे अनेक प्रकारका होकर स्थित है, उस सच्चिदानन्द-रूप परमात्माको नमस्कार है। जब सारे प्रपञ्चका अपने कारणमें लय किया जाता है, तब जिस उपायसे परम तत्त्व प्रकाशित होता है, उस उपायको तुम्हें संक्षेपमें भूमिके अनुसार कहता हूँ। अपने अन्तःकरणमे तरङ्गरूपसे ही विचार करना चाहिये। इसीसे वह परमात्मा प्राप्त किया जा सकता है। उसके प्राप्त होनेपर पुरुष फिर शोक नहीं करता। सत्सङ्ग और सत्-शास्त्रसे प्राप्त विवेक-से वैराग्ययुक्त होकर पुरुषको उसी तत्त्वका बार-बार चिन्तन करना चाहिये। ( सर्ग १२७ )


श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका और भरद्वाजजीके द्वारा अपनी स्थितिका वर्णन, वाल्मीकिजी-द्वारा मुक्तिके उपायोंका कथन, श्रीविश्वामित्रजीद्वारा भगवान् श्रीरामके अवतार ग्रहण करनेका प्रतिपादन एवं ग्रन्थश्रवणकी महिमा

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! निषिद्ध कर्म, सकाम कर्म तथा विषयोंके साथ इन्द्रियोंके सम्बन्धसे जनित सुख-भोगसे रहित शम, दम और श्रद्धासे युक्त पुरुष कोमल आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको जीत करके तबतक ॐकारका उच्चारण करता रहे, जब-तक मन पवित्र और प्रसन्न न हो जाय। तदनन्तर अपने अन्तःकरणकी विशुद्धिके लिये प्राणायाम करे और उसके बाद विषयोंसे इन्द्रियोंको धीरे-धीरे खींच ले। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और क्षेत्रज्ञ इनमें जिस-जिसकी जिस-जिससे उत्पत्ति हुई है, उस-उसको जानकर उन-उनके उपादानकारणमें उन सबको विलीन कर दे। पहले अपने-आपको चराचर विश्वमें अनुभव करे। इसके बाद सारे विश्वको अपने आत्माके अंदर अनुभव करे; फिर विवेकके द्वारा इसका भी अभाव करके केवल आत्मामें ही

सं० यो० व० अं० १८—

स्थित रहे। तदनन्तर प्रकृतिसहित जगत्के स्वरूपमें आत्मभावना करे। इसके पश्चात् परम कारणरूप चैतन्य निर्विशेष निराकार शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मामें आत्मभावना करे।

(अब देह, इन्द्रिय आदिमें जिसकी जिससे उत्पत्ति हुई है, उसका उसमें लय करनेका प्रकार बतलाते हैं—) अपने स्थूल देहके मांस आदि, जो पार्थिव भाग हैं उनका पृथिवीमें, रक्त आदि जो जलीय भाग हैं उनका जलमें तथा जो तैजस भाग हैं उनका अग्निमें विवेकके द्वारा विलय कर दे। व्यष्टि प्राणवायुका महावायु-में और आकाश-अंशका आकाशमें लय कर दे। अपने श्रोत्रेन्द्रियका दिशाओंमें और त्वगिन्द्रियका विद्युत्में लय कर दे। चक्षुरिन्द्रियका सूर्यमें तथा रसनेन्द्रियका उसके देवता वरुणमें (एवं घ्राणेन्द्रियका अश्विनीकुमारोंमें) लय

५१२* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कर दे। समष्टि प्राणका वायुमें, वाणीका अग्निमें और हस्तेन्द्रियका इन्द्रमें लय कर दे। अपने पादेन्द्रियका विष्णुमें तथा गुदा-इन्द्रियका मित्रमें लय कर दे। उपस्थेन्द्रियका कश्यपमें लय करके मनका चन्द्रमामें लय कर दे। बुद्धिका ब्रह्मामें लय कर दे। मित्र ! इन्द्रियोंके रूपमें देवता ही स्थित हैं। इनका मैं तुम्हें तत्त्वोपदेश-द्वारा लय करनेका आदेश श्रुति-वाक्यको प्रमाण मानकर ही दे रहा हूँ। मैंने अपने मनसे किसी तरहकी कोई कल्पना करके इन अर्थोंको तुम्हारे सामने प्रकट नहीं किया है। इस तरह अपनी देहको उसके कारणमें विलीन करके 'मैं विराट् हूँ' ऐसा चिन्तन करे। (इसके बाद पूर्वोक्त क्रमसे परमात्मामें आत्मभावना करे।) सारे ब्रह्माण्डके भीतर जो यह सदाशिवरूप परमात्मा व्यापक है, वही सम्पूर्ण भूतोंका आधार तथा कारण कहा गया है। वही परमात्मा जगत्‌के व्यवहारमें यज्ञके रूपमें स्थित है।

(अब पृथ्वी आदि भूतोंके लयका क्रम बतलाते हैं—) योगीको चाहिये कि वह पृथ्वीका जलमें लय करके उस जलको फिर तेजमें लीन कर दे। तेजको वायुमें विलीन करके उस वायुको फिर आकाशमें विलीन कर दे और आकाशका समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारणभूत महाकाशमें लय कर दे। योगी उस महाकाशमें एकमात्र लिङ्गशरीर धारण किये हुए स्थित रहे। वासनाएँ, सूक्ष्मभूत, कर्म, अविद्या, दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इन सबको पण्डितलोग लिङ्गशरीर कहते हैं।* तदनन्तर वह योगी बाहर निकलकर वहाँ 'मैं शुद्ध आत्मा हूँ' यों चिन्तन करे। फिर वह बुद्धिमान् योगी सूक्ष्म और निराकार अव्याकृत प्रकृतिमें अपने लिङ्गशरीरको भी विलीन करके स्थित रहे। जिसमें यह समस्त जगत् रहता है वह अव्यक्त अव्याकृत (माया) नाम और रूपसे रहित है। उसीको कोई प्रकृति, कोई माया तथा कोई परमाणु एवं कोई अविद्या कहते हैं। उस अव्याकृतमें प्रलयकालमें सभी प्राणीपदार्थ लयको प्राप्त होकर अव्यक्त-रूपसे अवस्थित रहते हैं। जबतक दूसरी सृष्टि नहीं होती तबतक वे सभी प्राणी-पदार्थ परस्परके सम्बन्धसे शून्य तथा आस्वादसे रहित होकर उस अव्याकृत (प्रकृति) स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं और प्रलयके अनन्तर सृष्टिकालमें फिर उसी प्रकृतिभूत अव्याकृतसे सब उत्पन्न हो जाते हैं। सर्गके आदिमें प्रकृतिसे अनुलोम-क्रमसे सृष्टि होती है और प्रलयके आरम्भमें प्रतिलोम-क्रमसे प्रकृतिमें सारी सृष्टि विलीन हो जाती है। इसलिये जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनो अवस्थाओंसे रहित होकर अविनाशी तुरीय पदकी प्राप्तिके लिये ब्रह्मका ध्यान करे। पूर्वोक्त प्रकारसे लिङ्गशरीरको भी कारणमें विलीन करके स्वयं सच्चिदानन्द परमात्मामें प्रविष्ट हो जाय।

श्रीभरद्वाजजीने कहा—महाराज ! मैं अब लिङ्गशरीर-रूपी बेड़ीके बन्धनसे सर्वथा मुक्त हो गया हूँ और सच्चिदानन्दका अंश होनेसे सच्चिदानन्द ब्रह्ममें प्रविष्ट हो गया हूँ। अंश और अंशीका वस्तुतः अभेद होनेके कारण अब मैं समस्त उपाधियोंसे रहित परब्रह्म परमात्मा ही हूँ। मैं कूटस्थ, शुद्ध और व्यापक हूँ। जैसे जलमें छोड़ा हुआ जल, दूधमें छोड़ा हुआ दूध और घीमें छोड़ा हुआ घी—सब-के-सब विनष्ट न होते हुए ही तद्रूप हो जाते हैं, किसी पृथक्‌रूपसे गृहीत नहीं होते, वैसे ही सर्वभावसे नित्य आनन्दस्वरूप सर्वसाक्षी, परम कारण चेतन परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट होकर मैं तद्रूप ही हो गया हूँ। नित्य, सर्वव्यापी, शान्त, सर्वदोषरहित, अक्रिय, शुद्ध, परब्रह्म परमात्मा मैं ही हूँ। पुण्य और पापसे रहित, जगत्‌का परम कारण अद्वितीय, आनन्दमय, अविनाशी और चिन्मयस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही मैं हूँ। इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त, प्रकृतिके सत्त्व, रज, तम—तीनों गुणोंसे अतीत, सर्वव्यापक और


* वासना भूतसूक्ष्माश्च कर्माविद्ये तथैव च ॥
दशेन्द्रियमनोबुद्धिरेतल्लिङ्ग विदुर्बुधाः।
(नि० पू० १२८ । १८-१९)

८-त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास और उनके गृह, नगर, देश, लोक एवं त्रिलोकके साम्राज्यकी कल्पनाका विस्तार

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५१३

सर्वस्वरूप ब्रह्मका निष्काम भावसे अपने कर्त्तव्यका पालन करते हुए सदा ध्यान करना चाहिये । इस रीतिसे परब्रह्मविषयक अभ्यास करनेवाले पुरुषका मन ब्रह्ममें विलीन हो जाता है और मनके विलीन हो जानेपर उसे स्वयं ही अपने आत्मस्वरूपका अनुभव हो जाता है । आत्माका अनुभव होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका अन्त होकर आत्मामें आनन्दका अनुभव होने लगता है तथा आत्मा स्वयं ही अपने-आप अपने परमानन्द परमात्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तदनन्तर 'मुझसे अतिरिक्त कोई दूसरा सच्चिदानन्दमय परमात्मा नहीं है। मैं ही अद्वितीय परब्रह्म हूँ'—इस प्रकार हृदयमें परमात्माका अनुभव हो जाता है । गुरो ! आपके द्वारा कहा गया यह सब ज्ञान मुझे अवगत हो गया। मेरी बुद्धि सर्वथा निर्मल हो गयी । अब मेरा यह संसार चिरकाल-तक स्थिर नहीं रह सकता । भगवन् ! अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि ज्ञानियोंके लिये कौन-सा कर्म विहित है ? क्या उन्हें कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये और यदि करना चाहिये तो क्या केवल प्रवृत्तिरूप कर्मोंका ही अनुष्ठान करना चाहिये या निवृत्तिरूप कर्मोंका भी ?'

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—मुमुक्षु पुरुषोंको वही कर्म करना चाहिये, जिसमें कोई दोष नहीं हो, विशेष करके मुमुक्षुको काम्य और निषिद्ध कर्म कभी नहीं करना चाहिये । संकल्पोंसे रहित होकर जब जीवात्मा ब्रह्मके लक्षणोंसे युक्त हो जाता है, तब उसकी सभी इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं और वह सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मस्वरूप बन जाता है। 'देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे परे जो जीवात्मा है उससे भी परे जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है, वही मैं हूँ' इस प्रकार निश्चयपूर्वक जब जीवात्मा एकत्वभावसे ध्यान करता है, तब वह सदाके लिये मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है । जब जीवात्मा कर्तृत्व, भोक्तृत्व और ज्ञातृत्वसे तथा सम्पूर्ण देहादि उपाधियोंसे एवं सुख और दुःखोंसे रहित होता है, तब वह सर्वथा मुक्त समझा जाता है । जब जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंमें आत्माको तथा आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंको अभेदरूपसे देखने लगता है, तब यह जीवात्मा संसारसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित होकर जब जीवात्मा तुरीय आत्मानन्द-रूपमें प्रवेश करता है, तब वह सर्वथा मुक्त समझा जाता है; क्योंकि शास्त्रोंके विवेकपूर्वक विचारसे, गुरुके वाक्योंका अर्थ और भाव यथार्थ समझनेसे तथा श्रवण, मनन, निदिध्यासनके अभ्याससे सब प्रकारसे सिद्धि प्राप्त होती है अर्थात् वह सदाके लिये मुक्त हो जाता है, यह वेदोंका आदेश है। इसलिये भरद्वाज ! तुम सब कुछ छोड़कर केवल ध्यान समाधिके लिये अभ्यासमें अपना मन तत्परतापूर्वक स्थिर करो । जब महामना साधु-स्वभाव श्रीरामचन्द्रजी अपने ब्रह्मरूपमें समाधिरथ थे, उस समय ऋषियोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजीसे श्रीविश्वामित्रजी कहने लगे ।

श्रीविश्वामित्रजीने कहा — ब्रह्मपुत्र महाभाग वसिष्ठजी! आप महान् हैं । आपने अपना गुरुत्व शीघ्र ही हमलोगोंको दिखला दिया; क्योंकि अपने दर्शन, स्पर्श और वाक्यप्रयोगसे जो कृपा करके शिष्यके शरीरमें शिव-स्वरूप परमात्मभावका समावेश करा दे, वही सच्चा गुरु है । गुरुवाक्य-श्रवणसे होनेवाले ज्ञानमें शिष्यकी श्रद्धा-पूर्वक पवित्र बुद्धि ही कारण है । यह ज्ञानकी प्राप्ति ही गुरु और शिष्यके समागमका वास्तविक प्रयोजन है । विभो ! आप तो परमपदमें स्थित हैं, परंतु हमलोग अभीतक यज्ञादि कार्योंमें लगे हुए हैं । बड़े कष्टके साथ जिसके लिये मैंने स्वयं राजा दशरथसे प्रार्थना की है और जिस उद्देश्यसे मैं यहाँ आपके पास आया हूँ, उस मेरे निर्विघ्न यज्ञसिद्धिरूप कार्यका स्मरण करते हुए आप श्रीरामचन्द्रजीको अब समाधिसे उठानेकी कृपा कीजिये । मुने ! मेरे उस समस्त कार्यको आप अपने शुद्ध मनसे व्यर्थ

५१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


न बनाइये, क्योंकि भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समाधिसे उठनेपर उनके अवतारके जो अन्य प्रयोजन, देवताओं और ऋषियोंके कार्य हैं, उनका भी हमलोग सम्पादन कर लेंगे। जब मैं श्रीरामचन्द्रजीको अपने आश्रममें ले जाऊँगा, तब वे राक्षसोंका नाश करेंगे और उसके बाद अहल्याको शापसे मुक्त करेंगे। तदनन्तर निश्चयपूर्वक भगवान् शङ्करका धनुष तोड़कर जनकदुलारी सीताके साथ अपना विवाह करेंगे। इस संसारमें पिता-पितामहके राज्यका त्यागकर वनवासके निमित्त वनमें पहुँचकर अभय और निःस्पृह श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंका वध करके दण्डकारण्यके निवासी मुनियो, अनेक तीर्थों तथा अन्यान्य प्राणियोंका उद्धार करेंगे। सीताहरणके निमित्त रावण आदिका वध करके श्रीरामचन्द्रजी इन्द्रके वरदानद्वारा युद्धमें मरे हुए वानर आदिको पुनर्जीवित हुए दिखलायेंगे। तदनन्तर साध्वी सीताकी अग्निमें प्रवेशके द्वारा शुद्धिके उद्देश्यसे भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अपने चरित्रकी आदर्शता दिखलायेंगे। जो लोग भगवान् श्रीरामका दर्शन करेंगे, उनके चरित्रका स्मरण तथा श्रवण करेंगे एवं जो लोग भगवान्‌के स्वरूपका दूसरोंको बोध करायेंगे, उन सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित अपने भक्तोंको भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जीवन्मुक्ति प्रदान करेंगे। इस प्रकार तीनों लोकोंका तथा मेरा भी हित इन महापुरुष भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा सम्पूर्णरूपसे सम्पन्न होगा। सज्जनो! आप सब लोग इन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार कीजिये। इनके नमस्कारसे ही आपलोग सारे संसारको जीत लेंगे अर्थात् आपलोगोंको किसी दूसरे साधनकी आवश्यकता न होगी। आपलोग चिरकालतक बढ़ते रहें।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज ! इस प्रकारका विश्वामित्रजीका भाषणरूप श्रीरामचन्द्रजीकी भावी चरित्ररूप दुर्लभ कथा सुनकर श्रीवसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ योगीन्द्र तथा सिद्ध पुनः भगवान् श्रीरामकी चरणकमलरजके आदरमें यानी नमस्कारमें तथा उनके स्मरण में स्थित हो गये। जानकीपति श्रीरामकी भावी कथा सुननेसे भगवान् वसिष्ठजी तथा और दूसरे महर्षि भी तृप्त नहीं हो सके। इसलिये उन सबने दूसरोंके द्वारा 'कहे गये उन गुणसागर भगवान्‌के गुणोंका पुनः श्रवण किया तथा सुने हुए गुणोंका दूसरोंसे वर्णन किया। तदनन्तर महर्षि भगवान् वसिष्ठजी मुनिवर विश्वामित्रजीसे कहने लगे।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—मुनि विश्वामित्रजी ! इन श्रोताओंको आप साफ-साफ बतला दीजिये कि ये राजीवलोचन रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पूर्वमें देव या मनुष्य क्या थे।

श्रीविश्वामित्रजीने कहा—सज्जनो! आप सब लोग इन्हीं श्रीरामचन्द्रजीमें विश्वास कीजिये कि परमपुरुष परब्रह्म परमात्मा ये ही हैं। इन्होंने ही विश्वके कल्याणके लिये विष्णुरूपसे क्षीरसागरका मन्थन किया था। गूढ़ अभिप्रायसे भरे उपनिषदादि शास्त्रोंके तत्त्वगोचर साक्षात् परब्रह्म ये ही हैं। परिपूर्णपरमानन्द, समस्वरूप, श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित भगवान् विष्णुरूप यही श्रीरामचन्द्रजी जब भक्तिसे भलीभाँति प्रसन्न होते हैं, तब सब प्राणियोंको परम पुरुषार्थरूप मोक्ष देते हैं। कुपित होकर यही श्रीरामचन्द्रजी शिवरूपसे संसारका संहार करते हैं और यही ब्रह्मारूपसे विनाशशील संसारकी रचना करते हैं। यही विश्वके आदि, विश्वके उत्पादक, विश्वके धाता, पालनकर्ता तथा महासखा भी हैं। यही भगवान् ऋक्, यजु., सामवेदमय हैं, तीनों गुणोंसे परे अति गहन यही हैं और शिक्षा, कल्प आदि छः अङ्गोंसे समन्वित वेदात्मा अद्भुत पुरुष भी यही हैं। विश्वका पालन करनेवाले चतुर्भुज विष्णुभगवान् यही हैं, विश्वके रचयिता चतुर्मुख ब्रह्मा यही हैं और सारे संसारका संहार करनेवाले त्रिलोचन भगवान् शिव भी यही हैं। ये अजन्मा होते हुए भी

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका वर्णन * ५१५


अपनी योगमायाके सम्बन्धसे अवतार लेते हैं। ये सबसे महान् हैं। ये सदा जागते रहते हैं और रूपरहित हुए भी ये विश्वरूप हैं। ये भगवान् ही इस विश्वको अपने संकल्पसे धारण करते हैं। ये राजा दशरथजी धन्य हैं, जिनके पुत्र परमपुरुष परमात्मा हुए। वह दशग्रीव रावण भी धन्य है, जिसका ये अपने चित्तसे चिन्तन करेंगे। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले विष्णुभगवान् ही श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। ये ही श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दघन अविनाशी परमात्मा हैं। अपनी इन्द्रियोंको रोक रखनेवाले योगीलोग ही श्रीरामचन्द्रजीको वस्तुतः जानते हैं। हमलोग तो इनके इस सगुण साकार स्वरूपका ही निरूपण या दर्शन करनेमें समर्थ हैं। वसिष्ठजी! हमलोगोंने ऐसा सुना है कि ये ही भगवान् श्रीरामचन्द्रजी रघुवंशके पापोंका सर्वथा विनाश करनेवाले हैं। अब आप कृपाकर इन्हें व्यवहारमें लगाइये।

श्रीवाल्मीकिजीने कहा—भरद्वाज! यों कहकर महामुनि विश्वामित्रजी चुपचाप बैठ गये। तदनन्तर महातेजस्वी वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीसे कहने लगे।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—चिन्मय महापुरुष महाबाहु श्रीराम! यह विश्रामका समय नहीं है। उठो और इस संसारके लिये आनन्दकारक बनो। पुत्र! विनाशशील राज्य कार्योंका अवलोकन करके देवताओं और मुनियोंको संकटसे उद्धार करनेके भारका वहन करो और सुखी रहो।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! गुरु वसिष्ठजीके उपर्युक्त वचनोंको सुनकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी समाधिसे सचेत हो गये और सावधान होकर कहने लगे।

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—महामुने! वेदों, आगमों, पुराणों और स्मृतियोंमें भी गुरु-वाक्यका पालन करना ही विधि कहा गया है और उसके विरुद्ध आचरण करना निषेध कहा गया है। यों कहकर उन महात्मा वसिष्ठजीके चरणोंमें अपने सिरसे नमस्कार कर सबके आत्मस्वरूप करुणासागर श्रीरामचन्द्रजी सबसे बोले—'सभ्य पुरुषो! आप सब लोग हमारे इस निर्णयको अच्छी तरह सुन लीजिये। इससे आपलोगोंका बड़ा कल्याण होगा। कल्याणकामी पुरुषके लिये इस संसारमें परमात्मज्ञान तथा परमात्मज्ञानी गुरुसे बढ़कर कुछ भी नहीं है।'

सिद्ध आदि सब लोगोंने कहा—श्रीरामचन्द्रजी! आप जैसा कह रहे हैं, वैसा ही आपकी दयासे हमलोगोंके मनमें पहलेसे ही स्थित है और अब तो वह सब आपके इस संवादसे और भी विशेष दृढ़ हो गया है। महाराज श्रीरामचन्द्रजी! आप सुखी होइये, आपको नमस्कार है। अब हमलोग वसिष्ठजीसे भी अनुमति लेकर जहाँसे आये थे, वहीं जा रहे हैं।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! यों कहकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति करते हुए वे सब-के-सब चल दिये। श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी। श्रीरामचन्द्रजीकी यह सब कथा मैंने तुमसे कह सुनायी। इसी क्रमयोगसे तुम भी साधन करते हुए सुखी रहो। मुनिवर वसिष्ठजीकी वचन-पंक्तिरूपी रत्नमालासे विभूषित यह जो श्रीरामचन्द्रजीकी कथा मैंने तुमसे कही है, वह सम्पूर्ण कवियों और योगियोंके लिये सेवनयोग्य है तथा परम गुरुकी दयादृष्टिसे वह मुक्तिमार्गको देती है। जो कोई मनुष्य वसिष्ठजी और श्रीरामचन्द्रजीके इस संवादको प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक सुनेगा, वह किसी अवस्था में रहते हुए भी एकमात्र श्रवणसे ही मुक्त हो जायगा और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेगा।

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